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150 साल पुराना बलरामपुर का स्वयंसिद्ध हनुमान मंदिर, नेपाल तक है आस्था

बलरामपुर जहाँ एक तरफ गहरी नीरवता है और दूसरी तरफ सरोवर का अनंत विस्तार, ठीक उन दोनों के बीच एक पीपल की छांव तले विराजते हैं संकटमोचन हनुमान। न भव्य शिखर, न विशाल प्रांगण, फिर भी डेढ़ सदी से यहाँ आस्था का जो दीप जल रहा है, वह आज नेपाल की सीमाओं तक अपनी रोशनी…

150 साल पुराना बलरामपुर का स्वयंसिद्ध हनुमान मंदिर, नेपाल तक है आस्था

बलरामपुर
जहाँ एक तरफ गहरी नीरवता है और दूसरी तरफ सरोवर का अनंत विस्तार, ठीक उन दोनों के बीच एक पीपल की छांव तले विराजते हैं संकटमोचन हनुमान। न भव्य शिखर, न विशाल प्रांगण, फिर भी डेढ़ सदी से यहाँ आस्था का जो दीप जल रहा है, वह आज नेपाल की सीमाओं तक अपनी रोशनी बिखेर रहा है। यही है बलरामपुर के रानी तालाब स्थित वह हनुमान मंदिर, जिसे लोग चमत्कारी भी कहते हैं और स्वयंसिद्ध भी, क्योंकि यहाँ जो माँगा जाता है, वह मिलता जरूर है। उत्तर प्रदेश के बलरामपुर को छोटी काशी यूं ही नहीं कहा जाता। इस प्राचीन नगर की गलियों में इतिहास सांस लेता है। नीलबाग महल हो, राजा की ड्योढ़ी हो या सदियों पुराने शिवालय, हर ओर गौरवशाली अतीत की छाप है। लेकिन इन सबके बीच रानी तालाब का हनुमान मंदिर अपनी एक अलग ही पहचान रखता है, जहाँ धर्म, प्रकृति और आस्था का अनूठा त्रिभुज बनता है।

स्वयंसिद्ध है यह धाम
मंदिर की भौगोलिक स्थिति ही इसे असाधारण बनाती है। पूरब में एकांत भूमि, पश्चिम में शांत सरोवर और उन दोनों के मध्य एक विशाल पीपल वृक्ष, जिसके नीचे युगों से बजरंगबली विराजमान हैं। शास्त्रों और लोक परंपराओं के अनुसार ऐसा संयोग जहाँ भी बनता है, वह स्थान स्वयंसिद्ध हो जाता है। यानी वहाँ स्थापित देवता साक्षात जागृत अवस्था में होते हैं और भक्तों की पुकार सीधे उन तक पहुँचती है। रानी तालाब का यह मंदिर उसी दिव्य श्रेणी में आता है।

डेढ़ सदी की अटूट विरासत
मंदिर का इतिहास लगभग 150 वर्ष पुराना है। इसकी स्थापना स्थानीय निवासी शंभू नाथ ने की थी। शुरुआत में यह केवल पीपल के नीचे स्थापित एक मूर्ति थी, कोई दीवार नहीं, कोई छत नहीं। लेकिन जब भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होने लगीं तो मंदिर की महिमा स्वयं फैलती गई। लोग स्वेच्छा से जुड़ते गए, जनसहयोग से निर्माण होता गया और आज उसी स्थान पर एक सुंदर एवं सुव्यवस्थित मंदिर खड़ा है। भले ही वह केवल 100 वर्ग गज में समाया हो, पर उसकी आस्था का कोई आयाम नहीं। दशकों से इस मंदिर की सेवा और देखरेख पंडित रामदुलारे और उनका परिवार निःस्वार्थ भाव से करता आ रहा है।

पाँच मंगलवार की मन्नत और बाबा का वचन
मंदिर के पुजारी राम दुलारे के अनुसार यहाँ हनुमान जी को बेसन के लड्डू और सिंदूर अर्पित करने की विशेष परंपरा है। मान्यता है कि जो भक्त लगातार पाँच मंगलवार पूर्ण श्रद्धाभाव से यह प्रसाद चढ़ाते हुए मन्नत माँगता है, बाबा उसे कभी खाली हाथ नहीं लौटाते। कहते हैं कि उसकी नैया बजरंगी अवश्य पार लगाते हैं। मंदिर के ठीक सामने शिवलिंग स्थापित है और उसके पीछे पेड़ की ओट में शनिदेव की मूर्ति विराजमान है। तीनों देवशक्तियों का यह संगम इस स्थान को और भी पवित्र बनाता है। प्रत्येक मंगलवार और शनिवार को यहाँ भजन कीर्तन और सुंदरकांड का पाठ होता है, जो पूरे परिसर को एक अलौकिक ऊर्जा से भर देता है।

नेपाल तक फैली आस्था की लहर
इस मंदिर की ख्याति केवल बलरामपुर तक सीमित नहीं है। गोंडा, बहराइच, श्रावस्ती, बस्ती, सिद्धार्थनगर जैसे जिलों से हजारों श्रद्धालु यहाँ नियमित रूप से आते हैं। यहाँ तक कि पड़ोसी राष्ट्र नेपाल से भी भक्त मन्नत लेकर इस द्वार पर पहुँचते हैं। मनोकामना पूर्ण होने पर वे पुनः आभार व्यक्त करने लौटते हैं। यही इस मंदिर की सबसे बड़ी गवाही है।

बड़े मंगल पर उमड़ता है जनसैलाब
ज्येष्ठ मास के बड़े मंगल पर इस मंदिर का दृश्य अविस्मरणीय होता है। दूर-दूर से आए भक्त प्रसाद और ध्वजा लेकर उमड़ पड़ते हैं। हनुमान जयंती पर भव्य आयोजन होते हैं और पूरा परिसर जयकारों से गूंज उठता है। यह नजारा देखकर सहज ही अनुभव होता है कि रानी तालाब का यह हनुमान मंदिर महज एक धार्मिक स्थल नहीं, यह लाखों लोगों की श्रद्धा, आस्था और विश्वास की जीवंत त्रिवेणी है, जो डेढ़ सदी से बह रही है और आने वाली पीढ़ियों तक बहती रहेगी।

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