नई दिल्ली
आम आदमी पार्टी को राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा झटका दे चुके हैं. आम आदमी पार्टी में बगावत करने वाले राघव चड्ढा अब भाजपाई हो चुके हैं. उनके साथ छह अन्य सांसद भी आम आदमी पार्टी से नाता तोड़ चुके हैं. अब वे सभी भाजपा में हैं. राघव चड्ढा आज भले ही दल बदलकर भाजपा में जा चुके हैं. मगर राघव चड्ढा का ही लाया बिल पास हो गया होता तो वह आज आम आदमी पार्टी छोड़कर अलग नहीं हो पाते. न ही वह बगावत कर पाते. राघव चड्ढा की यह खबर सिर्फ एक नेता के पार्टी बदलने की नहीं है. इसमें एक बड़ी विडंबना छिपी है. चार साल पहले राघव चड्ढा ने खुद एक बिल लाया था, जो दल-बदल को बहुत सख्ती से रोकता. अगर वह बिल कानून बन गया होता तो आज राघव चड्ढा की कहानी कुछ और होती।
जी हां, चार साल पहले राघव चड्ढा राज्यसभा के सबसे युवा सदस्य थे. उन्होंने राज्यसभा के सबसे युवा सदस्य के तौर पर अगस्त 2022 में एक प्राइवेट मेंबर बिल लाया था. उस बिल का मकसद दल-बदल कानून को और सख्त बनाना था. वह कानून बन गया होता तो राघव चड्ढा आम आदमी पार्टी छोड़कर नहीं जा पाते. न ही वह सदन के अपने छह अन्य पार्टी सदस्यों के साथ मिलकर भाजपा में शामिल हो पाते. दो दिन पहले ही उन्होंने यह घोषणा की थी. जिसमें उन्होंने आम आदमी पार्टी की सदन में मौजूद 10 सदस्यों की कुल संख्या में से दो-तिहाई बहुमत होने का हवाला दिया था।
राघव चड्ढा ने चार साल पहले लाया था बिल
खबर के मुताबिक, अगर राघव चड्ढा का प्रस्तावित बिल कानून बन गया होता तो पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में जाने के लिए राघव चड्ढा को अपनी पार्टी के छह नहीं, बल्कि सात सदस्यों के समर्थन की जरूरत पड़ती. इतना ही नहीं पार्टी तोड़ने के आरोप में इस मौजूदा टीम पर छह साल तक चुनाव लड़ने पर रोक लग जाती।
उस बिल में क्या था?
ऐसा इसलिए, क्योंकि संविधान संशोधन बिल में दलबदल विरोधी कानून को और अधिक सख़्त बनाने की मांग की गई थी. यह बिल उन्होंने राज्यसभा में शामिल होने के तीन महीने बाद पेश किया था. इस बिल के तहत पार्टी में वैध रूप से टूट या विभाजन करने के लिए दो-तिहाई नहीं, बल्कि तीन-चौथाई बहुमत की जरूरत होती. इस बिल को राघव चड्ढा ने 5 अगस्त 2022 को एक ‘निजी सदस्य बिल’ के तौर पर सदन में पेश किया था. तब राघव आप चीफ अरविंद केजरीवाल के भरोसेमंद सहयोगी थे।
बिल में क्या मांग की गई थी?
‘विधायकों द्वारा पूरी तरह से लोकतांत्रिक जनादेश की अनदेखी करते हुए गलत इरादे से पार्टी बदलने’ का हवाला देते हुए राघव चड्ढा के प्रस्तावित बिल में संविधान की दसवीं अनुसूची के लिए और भी अधिक सख़्त प्रावधानों के जरिए दलबदल विरोधी नियमों को मजबूत करने की मांग की गई थी. गौरतलब है कि दसवीं अनुसूची में दलबदल के आधार पर चुने हुए प्रतिनिधियों को अयोग्य ठहराने से जुड़े नियम शामिल हैं।
दसवीं अनुसूची में क्या है
वर्तमान कानून (दसवीं अनुसूची) कहता है कि अगर किसी पार्टी के दो-तिहाई सदस्य मिलकर दूसरी पार्टी में चले जाएं तो उन्हें अयोग्य नहीं माना जाता. राघव चड्ढा के बिल ने इसे बढ़ाकर तीन-चौथाई (3/4) कर दिया था. मतलब 10 सदस्यों वाली पार्टी में कम से कम 8 सदस्यों का सहमत होना जरूरी होता. सिर्फ 7 से काम नहीं चलता।
जानिए बिल में क्या-क्या?
इस प्रस्तावित कानून का मकसद संविधान के अनुच्छेद 102 और 191 में संशोधन करके और दसवीं अनुसूची में बदलाव करके पार्टी के भीतर विलय के लिए ज़रूरी सदस्यों की संख्या को 2/3 से बढ़ाकर 3/4 करके लोकतंत्र को मज़बूत करना और जन प्रतिनिधियों को राजनीतिक पार्टी के कार्यकर्ताओं के बजाय जानकार कानून निर्माता बनने में मदद करना था।
बिल में यह भी लिखा था कि अगर कोई सांसद या विधायक चुनाव जीतने के बाद पार्टी बदलता है तो उसे छह साल तक कोई चुनाव लड़ने की इजाजत नहीं होगी. साथ ही ‘रिसॉर्ट पॉलिटिक्स’ रोकने के लिए अगर कोई सरकार से समर्थन वापस लेता है तो उसे सात दिन के अंदर स्पीकर या चेयरमैन के सामने हाजिर होना पड़ता. अगर वह नहीं करता तो उसे अयोग्य ठहराया जा सकता था।
बिल में साफ लिखा था कि दल-बदल कानून का मकसद विधायकों-सांसदों के खरीद-फरोख्त को रोकना था, लेकिन आज भी यह समस्या बदस्तूर जारी है. दसवीं अनुसूची का दुरुपयोग हो रहा है. यह हमारे लोकतंत्र पर कलंक है. बिल ने अनुच्छेद 102 और 191 में भी बदलाव का प्रस्ताव रखा था ताकि सांसद या विधायक अयोग्य होने पर सदन की सदस्यता चली जाए।
और यह विडंबना
तब राघव चड्ढा ने बिल पेश करते समय कहा था कि जनता ने जिस उम्मीद से विधायकों को चुना है, उसके खिलाफ फ्लोर क्रॉसिंग (दल-बदल) करना गलत है. लेकिन आज वही राघव चड्ढा आम आदमी पार्टी की दो-तिहाई बहुमत का हवाला देकर भाजपा में चले गए हैं. अगर उनका 2022 वाला बिल कानून बन जाता तो आज उन्हें सात सदस्यों (न कि छह) का समर्थन चाहिए होता और पूरी टीम को छह साल तक चुनाव लड़ने से रोक दिया जाता।
राघव चड्ढा का बिल अगर पास हो जाता, तो न BJP में जाते न AAP टूटती—4 साल पुरानी कहानी
नई दिल्ली आम आदमी पार्टी को राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा झटका दे चुके हैं. आम आदमी पार्टी में बगावत करने वाले राघव चड्ढा अब भाजपाई हो चुके हैं. उनके साथ छह अन्य सांसद भी आम आदमी पार्टी से नाता तोड़ चुके हैं. अब वे सभी भाजपा में हैं. राघव चड्ढा आज भले ही दल बदलकर…

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