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भूजल संकट बढ़ाने में 45 फैक्ट्रियां जिम्मेदार! नारनौल में रेन वाटर हार्वेस्टिंग की अनदेखी

नारनौल. भूजल स्तर में लगातार गिरावट को देखते हुए सरकार वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रही है। औद्योगिक क्षेत्रों, संस्थानों और बड़े भवनों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम स्थापित करना अनिवार्य किया गया है, लेकिन नारनौल का एकमात्र औद्योगिक क्षेत्र निजामपुर रोड इन दावों की जमीनी हकीकत बयान…

भूजल संकट बढ़ाने में 45 फैक्ट्रियां जिम्मेदार! नारनौल में रेन वाटर हार्वेस्टिंग की अनदेखी

नारनौल.

भूजल स्तर में लगातार गिरावट को देखते हुए सरकार वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रही है। औद्योगिक क्षेत्रों, संस्थानों और बड़े भवनों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम स्थापित करना अनिवार्य किया गया है, लेकिन नारनौल का एकमात्र औद्योगिक क्षेत्र निजामपुर रोड इन दावों की जमीनी हकीकत बयान कर रहा है।

नारनौल के औद्योगिक क्षेत्र में कुल 45 छोटी फैक्ट्रियां संचालित हैं। करीब दो दशक पहले विकसित किया गया यह औद्योगिक क्षेत्र आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा है। यहां कई स्थानों पर जल निकासी व्यवस्था कमजोर है। वर्षा के दौरान सड़कों पर पानी जमा होना आम बात है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब औद्योगिक क्षेत्र में ड्रेनेज व्यवस्था ही पूरी तरह व्यवस्थित नहीं है तो वर्षा जल संचयन के नियमों का पालन किस स्तर तक हो रहा होगा। कई इकाइयों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग से संबंधित कोई स्पष्ट संरचना दिखाई नहीं देती।

जल संचयन प्रणाली स्थापित करना आवश्यक
अधिकांश वर्षा जल सीधे सड़कों, खाली भूखंडों और नालियों में बह जाता है। जबकि हरियाणा सरकार और संबंधित विभागों के दिशा-निर्देशों के अनुसार निर्धारित क्षेत्रफल से अधिक भूखंडों पर स्थापित औद्योगिक इकाइयों, संस्थानों और व्यावसायिक भवनों में वर्षा जल संचयन प्रणाली स्थापित करना आवश्यक है। इसका उद्देश्य वर्षा के पानी को सीधे जमीन में पहुंचाकर भूजल स्तर को बढ़ाना है। कई मामलों में भवन नक्शा स्वीकृति और अन्य अनुमतियों के दौरान भी रेन वाटर हार्वेस्टिंग की शर्त शामिल रहती है।

भूजल संकट वाले जिले में बढ़ रही चिंता
महेंद्रगढ़ जिला लंबे समय से गिरते भूजल स्तर की चुनौती का सामना कर रहा है। कई क्षेत्रों में भूजल दोहन लगातार बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि औद्योगिक क्षेत्रों में प्रभावी वर्षा जल संचयन व्यवस्था विकसित की जाए तो हर वर्ष लाखों लीटर पानी भूगर्भ में पहुंचाया जा सकता है। औद्योगिक क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि क्षेत्र में कई मूलभूत समस्याएं वर्षों से बनी हुई हैं। जगह-जगह टूटी सड़कें, जल निकासी की समस्या और अधोसंरचना की कमी के बीच उद्योगों को संचालित करना आसान नहीं है। उनका तर्क है कि सरकार को वर्षा जल संचयन के नियमों के साथ-साथ औद्योगिक क्षेत्रों की आधारभूत सुविधाओं को भी मजबूत करना चाहिए।

जल संग्रहण व संरक्षण की अनूठी मिसाल
उधर, कनीना में जल संकट से उबरने के लिए गांव रामबास के युवाओं ने वर्षा जल संग्रहण एवं संरक्षण का एक प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत किया है। युवा पर्यावरण प्रेमी मनोज कुमार रामबास के नेतृत्व में गांव के युवाओं ने मिलकर वर्ष 2022 में एक ऐसे तालाब का निर्माण किया, जिसने न केवल वर्षा जल को संरक्षित किया बल्कि आसपास की गोचर भूमि को भी हरियाली से आच्छादित कर दिया।

35 फीट लंबा और 6 फीट गहरा तालाब तैयार
मनोज कुमार ने बताया कि लगातार गिरते भूजल स्तर और पानी की बढ़ती समस्या को देखते हुए उनके मन में वर्षा जल को संरक्षित कर उसका उपयोग पौधारोपण एवं पर्यावरण संरक्षण के लिए करने का विचार आया। इसके बाद गांव के युवाओं ने श्रमदान करते हुए लगभग 35 फीट लंबा और 6 फीट गहरा तालाब तैयार किया। तालाब का निर्माण कम लागत में करने के उद्देश्य से बेकार पड़े कंक्रीट, पुरानी ईंटों तथा अन्य अनुपयोगी निर्माण सामग्री का उपयोग किया गया।

पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे
तालाब तक वर्षा जल पहुंचाने के लिए विशेष रूप से जल निकासी मार्ग बनाए गए ताकि बारिश का अधिकतम पानी तालाब में एकत्रित हो सके। बरसात के मौसम में यह तालाब भर जाता है और इसमें संचित पानी लगभग तीन से चार महीने तक बना रहता है। इसी जल का उपयोग आसपास लगाए गए पौधों की सिंचाई के लिए किया जाता है। तालाब के चारों ओर सुरक्षा के लिए फेंसिंग की गई तथा पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य से बेलपत्र, जामुन, लेहसुआ, नीम, कचनार, अमलतास, करोंदा, पापड़ी और अर्जुन सहित अनेक प्रजातियों के पौधे लगाए गए। आज ये पौधे वृक्ष बनने की ओर अग्रसर हैं और क्षेत्र की सुंदरता बढ़ाने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

जल संकट जैसी बड़ी समस्या का समाधान स्थानीय स्तर पर
स्थानीय लोगों का कहना है कि इस पहल से आसपास की गोचर भूमि में हरियाली बढ़ी है और अनेक पौधे गर्मी के मौसम में भी सुरक्षित रह पाए हैं। वर्षा जल संरक्षण का यह माडल ग्रामीण क्षेत्रों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन रहा है। सीमित संसाधनों में युवाओं द्वारा किया गया यह कार्य दर्शाता है कि यदि सामूहिक प्रयास और सकारात्मक सोच हो तो जल संकट जैसी बड़ी समस्या का समाधान स्थानीय स्तर पर भी संभव है।

दूसरे गांव के लिए बनी प्रेरणा
पर्यावरण प्रेमी मनोज कुमार ने कहा कि जल संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। यदि हर गांव में वर्षा जल संग्रहण के ऐसे छोटे-छोटे प्रयास किए जाएं तो भूजल स्तर सुधारने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण को भी नई दिशा मिल सकती है। उन्होंने युवाओं से अधिक से अधिक पौधारोपण करने और वर्षा जल को व्यर्थ बहने से रोकने का आह्वान किया। गांव रामबास की यह पहल आज जल संरक्षण, पर्यावरण संवर्धन और सामुदायिक भागीदारी का एक उत्कृष्ट उदाहरण बनकर उभर रही है, जिससे अन्य गांव भी प्रेरणा ले रहे हैं।

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