फाइटर जेट इंजन में विदेशी निर्भरता बनी चुनौती, GE की कीमत बढ़ने से बढ़ी भारत की चिंता

 नई दिल्ली  भारत अपना खुद का पांचवीं पीढ़ी का अत्याधुनिक स्टील्थ लड़ाकू विमान (AMCA) बनाने के सपने पर तेजी से काम कर रहा है। लेकिन इस बीच देश के सामने एक पुरानी और बड़ी चुनौती फिर से खड़ी हो गई है और वह है, लड़ाकू विमान का इंजन बनाना। इस बात को ऐसे समझिए कि…

फाइटर जेट इंजन में विदेशी निर्भरता बनी चुनौती, GE की कीमत बढ़ने से बढ़ी भारत की चिंता

 नई दिल्ली
 भारत अपना खुद का पांचवीं पीढ़ी का अत्याधुनिक स्टील्थ लड़ाकू विमान (AMCA) बनाने के सपने पर तेजी से काम कर रहा है। लेकिन इस बीच देश के सामने एक पुरानी और बड़ी चुनौती फिर से खड़ी हो गई है और वह है, लड़ाकू विमान का इंजन बनाना।

इस बात को ऐसे समझिए कि भारत ने फाइटर जेट का ढांचा, रडार और हथियार तो खुद बना लिए हैं, लेकिन विमान का सबसे जरूरी हिस्सा यानी 'इंजन' के लिए हम आज भी विदेशों पर निर्भर हैं। ऐसे में अब अमेरिकी कंपनी द्वारा अचानक दाम बढ़ा दिए जाने से भारत के इस ड्रीम प्रोजेक्ट पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।

अब सवाल अमेरिकी कंपनी की जरूरत क्यों?
लड़ाकू विमान के इंजन की कीमतों में भारी उछाल के बाद यह सवाल दोबारा खड़ा हो गया है कि आखिर भारत को इस प्रोजेक्ट के लिए अमेरिकी बैसाखी की जरूरत क्यों पड़ रही है? अच्छा सवाल यह भी है कि क्या अमेरिकी कंपनी द्वारा बनाए गए इंजन की जरूरत केवल

भारत को है या फिर अन्य देशों को भी?
इस बात का जवाब है कि नहीं, सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि तुर्किए, दक्षिण कोरिया और स्वीडन जैसे देश भी अपने स्वदेशी लड़ाकू विमानों के लिए पूरी तरह अमेरिकी तकनीक पर निर्भर हैं। ऐसे में अब सवाल यह है कि भारत अपने लड़ाकू विमान के इंजन की बनावट को लेकर क्या कदम उठाने वाला है?

पहले समझिए क्या है पूरा विवाद
बता दें कि भारत के फाइटर जेट प्रोजेक्ट्स के लिए अमेरिका की मशहूर कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक (GE) से F414 इंजन खरीदने की बातचीत चल रही थी। लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यह बातचीत अब खटाई में पड़ती दिख रही है।

इसका कारण है कि DRDO के सूत्रों के मुताबिक, जिस F414 इंजन की कीमत पहले प्रति यूनिट 70 से 80 करोड़ रुपये तय की जा रही थी, अमेरिकी कंपनी GE ने अब उसके दाम करीब तीन गुना बढ़ाकर बताए हैं।

दाम बढ़ने के बाद बजट मुख्य चुनौती
अमेरिकी कंपनी की तरफ से दाम तीन गुणा बढ़ाने के दावों के बाद समझौता अब अधर में पड़ता दिख रहा है। इस बात को ऐसे समझिए कि भारत सरकार ने इस विमान के शुरुआती 5 मॉडल बनाने के लिए 15000 करोड़ रुपये का बजट रखा है। ऐसे में इंजन महंगा होने से यह पूरा बजट गड़बड़ा सकता है।

अब समझिए भारत के सामने क्या है मजबूरी?
दाम बढ़ाने के बाद अब डिजाइन को लेकर सबसे बड़ी समस्या भारत के सामने खड़ी हो रही है। इस बात को ऐसे समझिए कि भारत की वैमानिकी विकास एजेंसी (ADA) ने AMCA लड़ाकू विमान का पूरा ढांचा इसी अमेरिकी F414 इंजन के हिसाब से डिजाइन किया है। इस मोड़ पर आकर इंजन बदलना बिल्कुल भी आसान नहीं है।

दूसरी ओर प्रोजेक्ट में देरी की संभावना भी चिंता का विषय बन सकता है। कारण है कि भारत को शुरुआती टेस्टिंग के लिए 15 इंजनों की जरूरत है। अगर बातचीत में देरी हुई, तो विमान के आने का समय और आगे खिसक सकता है। हालांकि वैसे उम्मीद है कि यह विमान 2034 या 2035 तक भारतीय वायुसेना में शामिल हो पाएगा।

इसका असर तेजस विमानों पर भी होगा?
तो इस सवाल का जवाब है, हां शायद। रिपोर्ट की माने तो इंजनों के दाम बढ़ाने का असर सिर्फ लड़ाकू विमान AMCA ही नहीं, भारत का नया तेजस Mk2 विमान भी इसी इंजन पर चलने वाला है। वहीं, पुराने तेजस Mk1A के लिए भी अमेरिका से इंजनों की सप्लाई में देरी हो रही है, जिससे वायुसेना को विमान मिलने में लेट हो रहा है।

सिर्फ भारत नहीं, दुनिया के ये बड़े देश भी हैं मजबूर
अच्छा सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि इंजन के मामले में सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई और ताकतवर देश भी अमेरिका के भरोसे हैं। इस बात ऐसे समझिए कि तुर्किए का अपना पांचवीं पीढ़ी का विमान 'KAAN' भी शुरुआत में अमेरिकी GE F110 इंजन से ही उड़ेगा, क्योंकि उनका खुद का इंजन बनने में अभी कई साल लगेंगे।

दूसरी ओर दक्षिण कोरिया का नया 'KF-21' लड़ाकू विमान भी अमेरिकी F414 इंजन की मदद से ही उड़ रहा है। स्वीडन का मशहूर 'ग्रिपेन' (Gripen E) विमान भी अमेरिकी इंजन पर निर्भर है। इसका नुकसान यह है कि स्वीडन अपनी मर्जी से इसे किसी दूसरे देश को बेच नहीं सकता, क्योंकि इसके लिए अमेरिका की मंजूरी (ITAR नियम) जरूरी होती है।

अब सवाल- आखिर लड़ाकू विमान का इंजन बनाना इतना मुश्किल क्यों?
गौरतलब है कि फाइटर जेट का इंजन बनाना दुनिया की सबसे जटिल और कठिन तकनीकों में से एक है। इन इंजनों को बहुत कम वजन और कम ईंधन में आसमान चीरने वाली ताकत पैदा करनी होती है। कारण है कि इंजन के अंदर का तापमान इतना ज्यादा होता है कि आम धातुएं तुरंत पिघल जाएं। इसके लिए खास 'सिंगल-क्रिस्टल ब्लेड्स' और अत्याधुनिक धातुओं की जरूरत होती है।

ऐसे में फिलहाल दुनिया के सिर्फ 5 देश अमेरिका, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन और चीन के पास ही स्वतंत्र रूप से फाइटर जेट इंजन बनाने की तकनीक है। हालांकि इस बात में भी कोई दोहराई नहीं है कि भारत ने सालों पहले खुद का 'कावेरी इंजन' बनाने की कोशिश की थी, लेकिन वह लड़ाकू विमान को उड़ाने लायक ताकत नहीं दे पाया। अब उस इंजन के बदले हुए रूप का इस्तेमाल भारत के 'घातक' ड्रोन में किया जाएगा।

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