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सरदार सरोवर समझौते पर नर्मदा बचाओ आंदोलन के सवाल, MP के अधिकार और विस्थापितों के पुनर्वास की उठाई मांग

सरदार सरोवर समझौते पर उठे सवाल : मध्यप्रदेश के वैध अधिकारों और हजारों विस्थापितों के पुनर्वास से समझौता न हो – नर्मदा बचाओ आंदोलन बड़वानी,   सरदार सरोवर परियोजना के कारण मध्यप्रदेश में जलमग्न हुई वन भूमि, शासकीय भूमि तथा अन्य सार्वजनिक संसाधनों की भरपाई को लेकर वर्षों से चले आ रहे अंतर्राज्यीय विवाद के बीच…

सरदार सरोवर समझौते पर नर्मदा बचाओ आंदोलन के सवाल, MP के अधिकार और विस्थापितों के पुनर्वास की उठाई मांग

सरदार सरोवर समझौते पर उठे सवाल : मध्यप्रदेश के वैध अधिकारों और हजारों विस्थापितों के पुनर्वास से समझौता न हो – नर्मदा बचाओ आंदोलन

बड़वानी, 
 सरदार सरोवर परियोजना के कारण मध्यप्रदेश में जलमग्न हुई वन भूमि, शासकीय भूमि तथा अन्य सार्वजनिक संसाधनों की भरपाई को लेकर वर्षों से चले आ रहे अंतर्राज्यीय विवाद के बीच हाल ही में हुए समझौते पर नर्मदा बचाओ आंदोलन ने गंभीर प्रश्न उठाए हैं। आंदोलन का कहना है कि केंद्रीय गृहमंत्री और केंद्रीय जल संसाधन मंत्री की मध्यस्थता में हुए इस समझौते का अधिकृत विवरण अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है, जबकि विभिन्न माध्यमों से प्रसारित खबरों में कई विरोधाभास सामने आए हैं। ऐसे में पूरे समझौते की पारदर्शी जानकारी सार्वजनिक होना आवश्यक है, ताकि मध्यप्रदेश शासन तथा विस्थापित परिवारों के वैधानिक अधिकारों पर किसी प्रकार का प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।

बांध की ऊंचाई बढ़ने के साथ बढ़ी क्षति, बदला मुआवजे का दावा

नर्मदा बचाओ आंदोलन की मेधा पाटकर, राहुल यादव, राजकुमार सिन्हा, गोखरू मांगल्या, शोभाराम सोलंकी एवं ओमप्रकाश पाटीदार ने जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि जब वर्ष 2000 तक सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई 90 मीटर तक सीमित थी, तब मध्यप्रदेश सरकार ने परियोजना से होने वाली क्षति के लिए 281.46 करोड़ रुपये की भरपाई का दावा किया था। इस दावे में 112.51 करोड़ रुपये वन भूमि, 157.61 करोड़ रुपये शासकीय भूमि तथा 11.34 करोड़ रुपये जलमग्न वन क्षेत्र के प्रतिकर के रूप में शामिल थे।

इसके बाद बांध की ऊंचाई क्रमशः 110 मीटर, 121.92 मीटर और अंततः वर्ष 2017 में 138.68 मीटर तक बढ़ा दी गई। बांध की ऊंचाई बढ़ने के साथ मध्यप्रदेश का डूब क्षेत्र भी लगातार विस्तारित होता गया। इसके परिणामस्वरूप बड़ी मात्रा में वन भूमि, शासकीय भूमि, कृषि क्षेत्र तथा अन्य प्राकृतिक संसाधन जलमग्न हुए, जिससे राज्य को होने वाली वास्तविक क्षति पहले की तुलना में कई गुना बढ़ गई।

आंदोलन के अनुसार वर्ष 2019 तक नियोजन के अनुरूप 192 गांव और एक नगर प्रभावित घोषित हो चुके थे। वहीं वर्ष 2023 में पुनरीक्षित बैकवॉटर स्तर के आधार पर हजारों परिवारों को पुनर्वास के लिए अपात्र घोषित किए जाने से नई समस्याएँ उत्पन्न हुईं और अनेक परिवारों की आजीविका तथा पुनर्वास की स्थिति प्रभावित हुई।

पुनर्मूल्यांकन के बाद 7,669 करोड़ रुपये का दावा

बढ़े हुए डूब क्षेत्र तथा वर्तमान परिसंपत्ति मूल्य को ध्यान में रखते हुए मध्यप्रदेश सरकार ने वर्ष 2019-20 के आधार पर जलमग्न भूमि एवं अन्य प्रभावित परिसंपत्तियों का पुनर्मूल्यांकन कराया। इस पुनर्मूल्यांकन के आधार पर राज्य सरकार ने अपने भरपाई दावे को बढ़ाकर 7,669 करोड़ रुपये निर्धारित किया।

यह संशोधित दावा वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा तैयार कर 10 फरवरी 2022 को विधिवत गुजरात सरकार को भेजा गया। आंदोलन का कहना है कि यह दावा बढ़े हुए डूब क्षेत्र तथा वास्तविक क्षति के आधार पर तैयार किया गया था और इसका उद्देश्य राज्य को हुए नुकसान की न्यायसंगत भरपाई सुनिश्चित करना था।

गुजरात ने संशोधित दावा स्वीकार करने से किया इनकार

नर्मदा बचाओ आंदोलन के अनुसार लगभग दो वर्ष बाद 21 मार्च 2024 को गुजरात सरकार ने स्पष्ट किया कि वह केवल 281.46 करोड़ रुपये के मूल दावे पर ही विचार करेगी तथा 7,669 करोड़ रुपये के संशोधित दावे को स्वीकार नहीं करेगी।

आंदोलन का कहना है कि यह रुख मध्यप्रदेश शासन द्वारा आंकी गई वास्तविक क्षति की उपेक्षा करने वाला है तथा परियोजना से प्रभावित राज्य के वैधानिक अधिकारों के अनुरूप नहीं माना जा सकता। मध्यप्रदेश शासन ने भी इस रुख को स्वीकार नहीं किया और विवाद नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण की बैठकों में लगातार उठता रहा।

कानूनी प्रावधानों के अनुरूप भरपाई और पुनर्वास आवश्यक

आंदोलन ने कहा कि नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण के वर्ष 1979 से लागू प्रावधानों के अनुसार परियोजना से प्रभावित राज्यों के बीच वन भूमि, शासकीय भूमि तथा पुनर्वास से जुड़े दायित्वों का निर्वहन किया जाना अनिवार्य है। इसी प्रकार वर्ष 2000 से सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए विभिन्न निर्णयों में भी प्रभावित राज्यों तथा विस्थापित परिवारों के अधिकारों को संरक्षित करने पर बल दिया गया है।

इन प्रावधानों के अनुसार मध्यप्रदेश को उसके डूब क्षेत्र की वास्तविक क्षति के अनुरूप भरपाई मिलना तथा विस्थापन से प्रभावित प्रत्येक परिवार का न्यायपूर्ण पुनर्वास सुनिश्चित किया जाना आवश्यक था। आंदोलन का कहना है कि आज भी मध्यप्रदेश के हजारों विस्थापित परिवार पूर्ण पुनर्वास की प्रतीक्षा कर रहे हैं। अनेक परिवारों को भूमि, आजीविका तथा पुनर्वास से जुड़े वैधानिक अधिकार अभी तक पूरी तरह प्राप्त नहीं हुए हैं।

इसी कारण मध्यप्रदेश सरकार ने शेष पुनर्वास कार्यों को पूरा करने के लिए गुजरात सरकार से 2,900 करोड़ रुपये की अतिरिक्त वित्तीय सहायता की मांग भी की थी।

विवाद सुलझाने के लिए कई दौर की बैठकें

इस विवाद के समाधान के लिए मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच अनेक बैठकें आयोजित की गईं। विवाद के निराकरण हेतु एक मध्यस्थता समिति का भी गठन किया गया, जिसमें सेवानिवृत्त अधिकारियों को शामिल किया गया। समिति ने गुजरात के प्रतिनिधियों के साथ मध्यप्रदेश के डूब क्षेत्र का संयुक्त निरीक्षण भी किया।

इसी दौरान विभिन्न स्तरों पर समझौते को लेकर अलग-अलग जानकारियाँ सामने आती रहीं। प्रारंभिक खबरों में कहा गया कि मध्यप्रदेश और गुजरात के मुख्य सचिवों के बीच हुई बैठक में गुजरात द्वारा मध्यप्रदेश को 10 हजार करोड़ रुपये देने पर सहमति बनी है। बाद में प्रत्यक्ष वित्तीय लेन-देन नहीं हुआ।

इसके बाद 6 जून 2026 को पुनः समाचार सामने आए कि गुजरात द्वारा मध्यप्रदेश को 7,388 करोड़ रुपये देने का निर्णय लिया गया है तथा 30 जून 2026 तक इसे अंतिम रूप दिए जाने की बात भी कही गई।

‘वन टाइम सेटलमेंट‘ पर उठे गंभीर सवाल

नर्मदा बचाओ आंदोलन का कहना है कि हाल ही में दिल्ली में केंद्रीय गृहमंत्री तथा केंद्रीय जल संसाधन मंत्री की उपस्थिति में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान के मुख्यमंत्रियों की बैठक में सरदार सरोवर परियोजना से जुड़े लंबित विवादों के समाधान के लिए “वन टाइम सेटलमेंट” किया गया। इसे संघीय व्यवस्था के अंतर्गत राज्यों के बीच समन्वय की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया गया है, लेकिन आंदोलन का कहना है कि इस समझौते की वास्तविक शर्तें अब तक सार्वजनिक नहीं की गई हैं।

आंदोलन के अनुसार उपलब्ध खबरों के आधार पर यह जानकारी सामने आई है कि इस समझौते के तहत मध्यप्रदेश को गुजरात को 550 करोड़ रुपये तथा महाराष्ट्र को 27 करोड़ रुपये का भुगतान करना होगा। इस तथ्य ने अनेक गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं, क्योंकि अब तक मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र दोनों ही राज्य परियोजना से हुई क्षति, डूब क्षेत्र की भरपाई तथा पुनर्वास के लिए गुजरात से वित्तीय सहायता की मांग करते रहे हैं।

परियोजना लागत निर्धारण पर भी स्पष्टता आवश्यक

नर्मदा बचाओ आंदोलन का कहना है कि यदि यह निर्णय सरदार सरोवर परियोजना की संशोधित लागत और राज्यों की हिस्सेदारी के आधार पर लिया गया है, तो परियोजना की वास्तविक लागत और उसके निर्धारण की प्रक्रिया को भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए।

आंदोलन के अनुसार वर्ष 1983 में परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 4,200 करोड़ रुपये थी। योजना आयोग द्वारा 1988 में इसे लगभग 6,400 करोड़ रुपये के स्तर पर स्वीकृति दी गई। बाद के वर्षों में यही लागत बढ़ते-बढ़ते गुजरात सरकार के अनुसार 75 हजार करोड़ रुपये से अधिक तथा गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री एवं पूर्व जल संसाधन मंत्री सुरेश मेहता के अनुसार लगभग 90 हजार करोड़ रुपये तक पहुंचने की बात सामने आई।

आंदोलन का कहना है कि लागत में इतनी बड़ी वृद्धि के कारणों पर आज तक स्पष्ट और सार्वजनिक जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई है। मूल परियोजना नियोजन की कमियों का उल्लेख गुजरात में हुई विभिन्न समीक्षाओं, विश्व बैंक द्वारा नियुक्त अंतरराष्ट्रीय स्वतंत्र समीक्षा आयोग की रिपोर्ट तथा सर्वोच्च न्यायालय के 18 अक्टूबर 2000 के निर्णय में दिए गए अल्पमत निर्णय में भी किया गया था।

क्या स्टैच्यू ऑफ यूनिटी की लागत भी परियोजना में जोड़ी गई?

आंदोलन ने यह भी प्रश्न उठाया है कि गुजरात विधानसभा में विभिन्न वर्षों के बजट संबंधी चर्चाओं के दौरान स्टैच्यू ऑफ यूनिटी तथा उसके आसपास विकसित पर्यटन परियोजनाओं की लागत को भी कई बार सरदार सरोवर परियोजना की लागत के साथ जोड़े जाने की चर्चा सामने आई।

कभी 1,055 करोड़ रुपये तो कभी वर्ष 2015 में लगभग 915 करोड़ रुपये की राशि परियोजना लागत के संदर्भ में सामने आई। आंदोलन ने पूछा है कि क्या इन व्ययों को वास्तव में बांध परियोजना की लागत का हिस्सा माना गया है? यदि ऐसा है तो इसकी वैधता क्या है और क्या मध्यप्रदेश शासन ने इस विषय पर आवश्यक स्पष्टता प्राप्त की है?

हजारों विस्थापित परिवार आज भी पुनर्वास की प्रतीक्षा में

नर्मदा बचाओ आंदोलन का कहना है कि सबसे गंभीर प्रश्न आज भी हजारों विस्थापित परिवारों के अधूरे पुनर्वास का है। मध्यप्रदेश में अभी भी बड़ी संख्या में परिवारों को वैकल्पिक कृषि भूमि, पुनर्वास भूखंड, भूखंडों का पंजीयन, शेष भूखंडों का आवंटन तथा वर्ष 2017 से स्वीकृत आवास निर्माण सहायता उपलब्ध नहीं हो सकी है।

इसी प्रकार अनेक पुनर्वास स्थलों पर मूलभूत सुविधाओं का विकास भी अधूरा है। इन शेष कार्यों के लिए ही मध्यप्रदेश सरकार ने गुजरात से 2,900 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता की मांग की थी। आंदोलन का प्रश्न है कि यदि यह राशि उपलब्ध नहीं होती, तो अधूरे पुनर्वास कार्यों को किस प्रकार पूरा किया जाएगा?

आंदोलन ने यह भी स्मरण कराया कि वर्ष 2003 में सर्वोच्च न्यायालय में लंबित प्रकरण के दौरान तत्कालीन अटॉर्नी जनरल ने भी स्पष्ट किया था कि भूमि अर्जन और पुनर्वास पर होने वाला पूरा व्यय गुजरात सरकार द्वारा प्रभावित राज्यों को उपलब्ध कराया जाना चाहिए। यह व्यवस्था नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण के निर्णय पर आधारित थी और इसे किसी भी स्तर पर नकारा नहीं जा सकता।

महाराष्ट्र के दावे भी अब तक लंबित

आंदोलन के अनुसार महाराष्ट्र सरकार ने भी डूबग्रस्त 6,488 हेक्टेयर वन भूमि के बदले लगभग 1,313 करोड़ रुपये तथा शेष पुनर्वास कार्यों के लिए 300 करोड़ रुपये से अधिक की मांग गुजरात सरकार के समक्ष रखी है।

इसके अतिरिक्त सरदार सरोवर परियोजना से नियोजित विद्युत उत्पादन का पूरा लाभ नहीं मिलने के कारण मध्यप्रदेश ने लगभग 900 करोड़ रुपये तथा महाराष्ट्र ने लगभग 450 करोड़ रुपये की भरपाई की मांग भी समय-समय पर उठाई है। हालांकि जनवरी 2026 की बैठक में बिजली उत्पादन से जुड़े इन दावों को नई विद्युत योजना के संदर्भ में स्वीकार नहीं किए जाने का उल्लेख किया गया।

जल नियोजन और आदिवासी अधिकारों पर भी चिंता

नर्मदा बचाओ आंदोलन ने कहा कि महाराष्ट्र में नर्मदा जल के उपयोग तथा नई जल योजनाओं को लेकर भी अनेक गंभीर प्रश्न बने हुए हैं। आंदोलन के अनुसार घाटी के आदिवासी गांवों के जल अधिकार सुनिश्चित किए बिना नर्मदा के जल को आठ परियोजनाओं के माध्यम से तापी घाटी की ओर ले जाने की योजना का संबंधित ग्रामसभाओं ने वर्ष 2018 से लगातार विरोध किया है।

इसके बावजूद यदि ऐसी योजनाओं को पुनः आगे बढ़ाया जाता है, तो यह स्थानीय समुदायों के अधिकारों की अनदेखी होगी। महाराष्ट्र में भी अनेक पात्र आदिवासी परिवारों का पुनर्वास पर्याप्त वित्तीय सहायता के अभाव में वर्षों से लंबित है।

राज्य के अधिकारों से समझौता न करने की मांग

नर्मदा बचाओ आंदोलन का कहना है कि मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के वैध वित्तीय दावों तथा पुनर्वास संबंधी अधिकारों से किसी भी प्रकार का समझौता प्रभावित राज्यों और लाखों विस्थापित नागरिकों के हितों के प्रतिकूल नहीं होना चाहिए।

आंदोलन का मानना है कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर यह सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है कि हाल में हुआ समझौता किसी भी रूप में मध्यप्रदेश अथवा महाराष्ट्र के वैधानिक अधिकारों को प्रभावित न करे।

सरकार उपलब्ध सभी वैधानिक उपाय अपनाए

आंदोलन ने मध्यप्रदेश सरकार से मांग की है कि वह 7,669 करोड़ रुपये के वैध भरपाई दावे, वन एवं शासकीय भूमि के उचित प्रतिकर तथा हजारों वंचित विस्थापित परिवारों के पूर्ण और न्यायसंगत पुनर्वास के लिए अपने पक्ष को दृढ़ता से रखे।

साथ ही, यदि आवश्यक हो तो राज्य सरकार उपलब्ध सभी वैधानिक एवं संवैधानिक उपायों का उपयोग करते हुए राज्य और विस्थापितों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करे।

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