रोहतक
यह कहानी सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि समय के खिलाफ दौड़ती जिंदगी की एक सांस रोक देने वाली यात्रा है… जहां हर सेकंड की कीमत किसी की धड़कन तय कर रही थी. 9 अप्रैल की दोपहर हरियाणा के रोहतक स्थित पीजीआईएमएस में 37 वर्षीय व्यक्ति ब्रेन हेमरेज के बाद भर्ती हुआ था. उसने होश खो दिया था. डॉक्टरों ने तमाम कोशिशों के बाद उसे ब्रेन डेड घोषित कर दिया था. उसी दुख की घड़ी में एक उम्मीद जन्म ले रही थी.
एक ऐसा निर्णय, जो कई जिंदगियों को बचाने वाला था. परिवार ने गहरा दर्द सहते हुए ऑर्गन डोनेट के लिए सहमति दे दी. यह फैसला आसान नहीं था, लेकिन इंसानियत की मिसाल बन गया. कुछ ही घंटों में अस्पताल में सर्जिकल टीम एक्टिव हो गई. शरीर से अंगों को निकालने का काम शुरू हुआ- हार्ट, फेफड़े, लीवर, किडनी और कॉर्निया… हर ऑर्गन किसी न किसी अजनबी के लिए जीवन की नई किरण बनने वाला था.
एजेंसी के अनुसार, दिल्ली के ओखला स्थित फोर्टिस एस्कॉर्ट्स हार्ट इंस्टीट्यूट में एक 26 साल का युवक भर्ती था, उसे गंभीर डाइलेटेड कार्डियोमायोपैथी थी- एक ऐसी बीमारी जिसमें दिल धीरे-धीरे कमजोर होकर शरीर का साथ छोड़ देता है. डॉक्टरों ने पहले ही बता दिया था कि बिना ट्रांसप्लांट के जीवन ज्यादा लंबा नहीं है. उस दिन जैसे ही उसे मैचिंग हार्ट मिलने की सूचना मिली, अस्पताल में हलचल तेज हो गई.
दिल को रोहतक से दिल्ली तक पहुंचाने के लिए ग्रीन कॉरिडोर बनाया गया. दिल्ली पुलिस और रोहतक पुलिस ने मिलकर सड़कों को इस तरह खाली कराया जैसे समय खुद रास्ता दे रहा हो. एम्बुलेंस में सुरक्षित रखा गया वह दिल, जो अभी कुछ समय पहले तक किसी और शरीर में धड़क रहा था, अब एक नए जीवन की ओर बढ़ रहा था.
सायरन की आवाज के साथ एम्बुलेंस ने 2:50 बजे रोहतक से सफर शुरू किया. हर चौराहा पहले से खाली था, हर ट्रैफिक सिग्नल हरा. यह सिर्फ एक यात्रा नहीं थी, यह एक मानवीय कोशिश थी- जहां सिस्टम, डॉक्टर, पुलिस और आम लोग सभी एक साथ थे.
98 किलोमीटर की यह दूरी सामान्य दिनों में डेढ़ से दो घंटे लेती है, लेकिन उस दिन समय भी हार मान चुका था. मात्र 85 मिनट में एंबुलेंस दिल्ली के फोर्टिस एस्कॉर्ट्स अस्पताल पहुंच गई. जैसे ही हार्ट सर्जरी थिएटर में पहुंचा, डॉक्टरों की टीम तुरंत एक्टिव हो गई. हर सेकंड कीमती था. मशीनों की बीप, सर्जिकल उपकरणों की हल्की आवाज और डॉक्टरों की एकाग्रता- सब मिलकर उस कोशिश में थे, जहां दिल फिर से धड़कने वाला था.
ऑपरेशन सफल रहा.
26 वर्षीय मरीज, जो कुछ समय पहले तक जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा था, अब धीरे-धीरे नए दिल की धड़कन महसूस कर रहा था. ICU में उसकी हालत स्थिर बताई गई और डॉक्टरों की निगरानी जारी रही.
एक डोनर से कई जिंदगियां बचाई गईं. फेफड़े गुरुग्राम के अस्पताल भेजे गए, लीवर और पैंक्रियास एम्स दिल्ली को मिले, जबकि किडनी और कॉर्निया रोहतक में ही इस्तेमाल किए गए. यह मानवता की कहानी है. यह बताती है कि जब सिस्टम, तकनीक और इंसानियत साथ आते हैं, तो असंभव भी संभव हो जाता है.
सबसे महत्वपूर्ण उस परिवार का साहस है, जिसने अपने दर्द को दूसरों की उम्मीद में बदल दिया. 98 किलोमीटर की वह सड़क शायद आम दिनों में सिर्फ एक मार्ग है, लेकिन उस दिन वह जीवन की सबसे तेज दौड़ बन गई, जहां एक दिल ने हार मानने से इनकार कर दिया, और कई दिलों को जीने का मौका दे दिया.
रोहतक से दिल्ली तक जीवन की दौड,ग्रीन कॉरिडोर में 85 मिनट में पहुंचा हार्ट, बची एक जिंदगी
रोहतक यह कहानी सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि समय के खिलाफ दौड़ती जिंदगी की एक सांस रोक देने वाली यात्रा है… जहां हर सेकंड की कीमत किसी की धड़कन तय कर रही थी. 9 अप्रैल की दोपहर हरियाणा के रोहतक स्थित पीजीआईएमएस में 37 वर्षीय व्यक्ति ब्रेन हेमरेज के बाद भर्ती हुआ था. उसने होश…

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