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क्रॉस वोटिंग के बाद भाजपा का प्लान, कांग्रेस के गढ़ों में सेंध की तैयारी

चंडीगढ़  हरियाणा में राज्यसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस के पांच विधायकों की क्रास वोटिंग से शुरू हुई सियासी हलचल अब भाजपा की दीर्घकालिक चुनावी रणनीति का हिस्सा बनती दिखाई दे रही है। पार्टी ने तत्काल दलबदल की राजनीति की बजाय कांग्रेस के निलंबित विधायकों और उनके राजनीतिक प्रभाव वाले क्षेत्रों पर फोकस बढ़ा दिया है।…

क्रॉस वोटिंग के बाद भाजपा का प्लान, कांग्रेस के गढ़ों में सेंध की तैयारी

चंडीगढ़
 हरियाणा में राज्यसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस के पांच विधायकों की क्रास वोटिंग से शुरू हुई सियासी हलचल अब भाजपा की दीर्घकालिक चुनावी रणनीति का हिस्सा बनती दिखाई दे रही है।

पार्टी ने तत्काल दलबदल की राजनीति की बजाय कांग्रेस के निलंबित विधायकों और उनके राजनीतिक प्रभाव वाले क्षेत्रों पर फोकस बढ़ा दिया है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी द्वारा पुन्हाना से कांग्रेस विधायक मोहम्मद इलियास के बेटे जावेद खान को भाजपा की सदस्यता दिलाना इसी रणनीति का पहला बड़ा हिस्सा है।

भाजपा की कोशिश फिलहाल कांग्रेस के इन विधायकों को औपचारिक रूप से पार्टी में शामिल कराने की नहीं, बल्कि उनके सामाजिक और राजनीतिक नेटवर्क को अपने पक्ष में लाने की है।

सबसे बड़ी वजह दलबदल कानून
इसकी सबसे बड़ी वजह दलबदल कानून है। यदि विधायक सीधे भाजपा में आते हैं तो उनकी विधानसभा सदस्यता पर कानूनी विवाद खड़ा हो सकता है। इसलिए पार्टी परिजनों, समर्थकों और स्थानीय नेतृत्व को अपने साथ जोड़कर राजनीतिक संदेश भी दे रही है और भविष्य की जमीन भी तैयार कर रही है।

राज्यसभा चुनाव में क्रास वोटिंग के बाद कांग्रेस ने पुन्हाना के मोहम्मद इलियास, हथीन के मोहम्मद इसराइल, सढ़ोरा की रेणुबाला, नारायणगढ़ की शैली चौधरी और रतिया के जरनैल सिंह को पार्टी से निलंबित कर दिया था।

कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष राव नरेंद्र सिंह सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि इन्हें कांग्रेस का विधायक नहीं माना जाए, जबकि पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा इन विधायकों को इस्तीफा देकर जनता के बीच जाने की चुनौती दे चुके हैं। हालांकि संवैधानिक स्थिति यह है कि विधानसभा में ये सभी विधायक अभी भी कांग्रेस के सदस्य ही माने जाएंगे, क्योंकि राज्यसभा चुनाव में पार्टी व्हिप लागू नहीं होता।

भाजपा ने भी इन विधायकों को लगातार राजनीतिक महत्व देने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। सरकारी कार्यक्रमों में उन्हें मुख्य अतिथि के रूप में सम्मान देना और अब उनके परिवारों को पार्टी से जोड़ना इस बात का संकेत है कि भाजपा इन क्षेत्रों में अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता बढ़ाना चाहती है। इसके साथ ही इन विधानसभा क्षेत्रों में विकास कार्यों और सरकारी योजनाओं पर विशेष जोर देकर स्थानीय स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश भी की जा रही है।

साल 2024 के मुकाबले 2029 का गणित
इसके पीछे 2024 विधानसभा चुनाव का गणित भी अहम है। भाजपा को 46 सीटों पर जीत मिली थी, जबकि 44 सीटों पर हार का सामना करना पड़ा था। पार्टी का मानना है कि यदि हारे हुए क्षेत्रों में संगठन मजबूत किया जाए और स्थानीय प्रभावशाली चेहरों को अपने साथ जोड़ा जाए तो 2029 में चुनावी बढ़त हासिल की जा सकती है। कांग्रेस के निलंबित विधायकों वाले अधिकांश क्षेत्र भाजपा की इसी रणनीतिक सूची में शामिल हैं।

'सीधे दलबदल' की बजाय 'राजनीतिक घेराबंदी'
कांग्रेस से निलंबित किए जा चुके पांचों विधायकों को भाजपा फिलहाल दल बदल की राजनीति में नहीं फंसाना चाह रही है। भाजपा इन विधायकों का 'सीधे दलबदल' कराने की बजाय 'राजनीतिक घेराबंदी' की रणनीति पर काम कर रही है।

यानी विपक्ष के प्रभाव वाले क्षेत्रों में पहले सामाजिक और संगठनात्मक आधार तैयार किया जाए, फिर चुनाव के समय उसका राजनीतिक लाभ उठाया जाए। दूसरी ओर, कांग्रेस के लिए चुनौती केवल पांच निलंबित विधायकों तक सीमित नहीं है, बल्कि उन विधानसभा क्षेत्रों में अपने संगठन और कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखने की भी है, जहां भाजपा लगातार अपनी मौजूदगी मजबूत करने में जुटी है।

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