चंडीगढ़
पंजाब के बहुचर्चित सिंचाई घोटाले में पूर्व मुख्य सचिव सर्वेश कौशल समेत तीन सेवानिवृत्त आइएएस अधिकारियों को पंजाब विजिलेंस ब्यूरो ने क्लीन चिट दे दी है। विस्तृत जांच के बाद ब्यूरो ने कहा है कि तीनों अधिकारियों के खिलाफ आरोपों को साबित करने वाला कोई ठोस साक्ष्य नहीं मिला।
क्लीन चिट पाने वालों में पूर्व विशेष मुख्य सचिव केबीएस सिद्धू और पूर्व सिंचाई सचिव काहन सिंह पन्नू भी शामिल हैं। विजिलेंस ने पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में दाखिल स्टेटस रिपोर्ट में यह जानकारी दी है।
हाई कोर्ट ने 15 मई 2026 को विजिलेंस ब्यूरो को उन अधिकारियों के खिलाफ जांच 15 दिन में पूरी करने के निर्देश दिए थे, जिनके खिलाफ राज्यपाल से अभियोजन की मंजूरी ली गई थी। इसके अनुपालन में ब्यूरो ने जांच पूरी कर रिपोर्ट दाखिल की। रिपोर्ट के अनुसार तीनों अधिकारियों के खिलाफ जांच में रिश्वत या कथित अनियमितताओं से जुड़ा कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य सामने नहीं आया।
आरोपित के बयान को बनाया गया था आधार
विजिलेंस के अनुसार तीनों सेवानिवृत्त अधिकारियों के खिलाफ जांच मुख्य रूप से मामले के आरोपित ठेकेदार गुरिंदर सिंह के 21 दिसंबर 2017 के डिस्क्लोजर स्टेटमेंट के आधार पर शुरू हुई थी।
यह बयान 17 अगस्त 2017 को दर्ज एफआइआर की जांच के दौरान दिया गया था। एफआइआर में धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात, जालसाजी और आपराधिक साजिश समेत भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराएं लगाई गई थीं।
ब्यूरो ने जांच में पाया कि डिस्क्लोजर स्टेटमेंट में जिन रकम का उल्लेख किया गया था, उनकी कोई बरामदगी नहीं हुई। साथ ही यह बयान मूल एफआइआर के चालान का हिस्सा भी नहीं था। विजिलेंस ने रिपोर्ट में कहा कि किसी बरामदगी के अभाव में केवल इस बयान को तीनों अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई का पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता।
588 पन्नों की सामग्री की जांच
जांच के दौरान विजिलेंस ने मामले से संबंधित 588 पन्नों की जांच सामग्री, पुलिस फाइल, चालान और गवाहों के बयान खंगाले। ब्यूरो ने सिंचाई विभाग में टेंडर और भुगतान की पूरी प्रक्रिया की भी पड़ताल की।
इसमें परियोजनाओं की प्रशासनिक और तकनीकी मंजूरी, अनुमान तैयार करने, टेंडर दस्तावेज बनाने, ठेकेदार को काम आवंटित करने से लेकर भुगतान जारी करने तक की प्रक्रिया शामिल थी।
विजिलेंस के मुताबिक जांच में किसी गवाह ने तीनों अधिकारियों के खिलाफ रिश्वत के आरोपों का समर्थन नहीं किया। आरोपों को किसी विशेष तारीख, स्थान, समय या घटना से भी नहीं जोड़ा जा सका। विभागीय रिकार्ड और प्रक्रियाओं की जांच में भी तीनों अधिकारियों और कथित अनियमितताओं के बीच कोई स्पष्ट संबंध सामने नहीं आया।
32 आरोपितों के खिलाफ दाखिल हो चुके हैं चालान
यह घोटाला 2007 से 2017 के बीच अकाली-भाजपा सरकार के कार्यकाल में सिंचाई और ड्रेनेज परियोजनाओं के टेंडर में कथित अनियमितताओं से जुड़ा है। आरोप था कि टेंडर की शर्तें एक विशेष ठेकेदार को लाभ पहुंचाने के लिए तैयार की गईं और सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाया गया।
विजिलेंस ने मामले में नौ मुख्य और सात पूरक चालान दाखिल किए हैं। इन चालानों में कुल 32 आरोपित शामिल हैं, जिनमें 26 सरकारी कर्मचारी और छह निजी व्यक्ति हैं। मई 2023 में प्रवर्तन निदेशालय ने भी मामले से जुड़े कथित अपराध से अर्जित 70 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्तियां अटैच की थीं।
विजिलेंस ने तीनों सेवानिवृत्त अधिकारियों की भूमिका की जांच पूरी कर रिपोर्ट सचिव, विजिलेंस को भेज दी है। अब हाई कोर्ट में दाखिल स्टेटस रिपोर्ट के आधार पर मामले में आगे की कार्रवाई पर फैसला होगा।
क्या है पूरा मामला, विस्तार से पढ़िए…
सिंचाई प्रोजेक्ट में घोटाले का आरोप: मामला 2007 से 2017 के बीच अकाली-भाजपा सरकार के दौरान सिंचाई विभाग की जल परियोजनाओं के आवंटन से जुड़ा है। आरोप था कि करीब 1,000 से 1,200 करोड़ रुपए के प्रोजेक्टों के टेंडर इस तरह तैयार किए गए कि उनका फायदा मुख्य ठेकेदार गुरिंदर सिंह को मिल सके। शिकायत में विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों और राजनीतिक स्तर पर मिलीभगत का भी आरोप लगाया गया था। साथ ही, इससे सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचने की बात कही गई थी।
बयान के आधार पर शुरू हुई थी जांच: विजिलेंस ने 29 सितंबर 2022 को दर्ज विजिलेंस इंक्वायरी नंबर 08 के तहत मामले की जांच की। तीनों अधिकारियों के खिलाफ जांच की अनुमति तत्कालीन पंजाब चीफ सेक्रेटरी BK जंजुआ ने 2022 में दी थी। रिपोर्ट के मुताबिक, जांच मुख्य रूप से आरोपी गुरिंदर सिंह के 21 दिसंबर 2017 के डिस्क्लोजर स्टेटमेंट पर आधारित थी, जो 17 अगस्त 2017 को दर्ज FIR की जांच के दौरान दिया गया था। इस FIR में IPC की धारा 406, 409, 420, 467, 471, 477-A और 120-B के साथ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराएं भी लगाई गई थीं।
न रकम मिली, न गवाह: विजिलेंस ब्यूरो के अनुसार डिस्क्लोजर स्टेटमेंट में जिन रकमों का जिक्र किया गया था, उनमें से कोई रकम बरामद नहीं हुई। ब्यूरो ने यह भी स्पष्ट किया कि यह स्टेटमेंट मूल FIR के चालान का हिस्सा नहीं था। जांच के दौरान पुलिस फाइल, चालान और गवाहों के बयानों की भी जांच की गई। इनमें तीनों रिटायर्ड अधिकारियों को रिश्वत या अनियमितताओं से जोड़ने वाला कोई ठोस तथ्य नहीं मिला। आरोपों को किसी निश्चित समय, स्थान, तारीख, महीने या साल से भी नहीं जोड़ा जा सका। किसी गवाह ने भी तीनों रिटायर्ड अधिकारियों के खिलाफ रिश्वत के आरोपों की पुष्टि नहीं की।
588 पन्नों की जांच भी खंगाली: विजिलेंस ब्यूरो ने मामले से जुड़ी 588 पन्नों की जांच सामग्री की भी पड़ताल की। मूल FIR के आधार पर अदालत में कुल 16 चालान पेश किए गए थे, जिनमें 9 मुख्य और 7 सप्लीमेंट्री चालान शामिल थे। इन मामलों में 32 लोगों को आरोपी बनाया गया था। इनमें 26 सरकारी कर्मचारी और 6 निजी व्यक्ति शामिल थे।
भुगतान जारी करने तक के रिकॉर्ड की पड़ताल शामिल: विजिलेंस ने सिंचाई विभाग में प्रोजेक्ट के टेंडर और भुगतान से जुड़ी पूरी प्रक्रिया की भी जांच की। इसमें प्रशासनिक और तकनीकी मंजूरी, टेंडर दस्तावेज तैयार करने, चीफ इंजीनियर की स्वीकृति, मेडरमेंट बुक व बिलों के सत्यापन, प्री-ऑडिट और ठेकेदारों को भुगतान जारी करने तक के रिकॉर्ड की पड़ताल शामिल थी। जांच रिपोर्ट के अनुसार, इन प्रक्रियाओं और दस्तावेजों की जांच में भी तीनों रिटायर्ड IAS अधिकारियों को अनियमितताओं से जोड़ने वाला कोई ठोस सबूत नहीं मिला।
राजनीतिक और प्रशासनिक भूमिका भी जांची गई: जांच के दौरान सिंचाई विभाग के कामकाज के साथ वरिष्ठ अधिकारियों और राजनीतिक कार्यपालिका की भूमिका की भी पड़ताल की गई। इसके दायरे में विभाग के सचिव-चीफ सेक्रेटरी, संबंधित मंत्री और दो मंत्रियों के निजी सहायक भी शामिल थे। हालांकि, रिकॉर्ड और विभागीय प्रक्रियाओं की जांच में सर्वेश कौशल, KBS सिद्धू और कहान सिंह पन्नू को घोटाले से जोड़ने वाला पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिला।
अब अंतिम फैसला सरकार के स्तर पर
विजिलेंस ब्यूरो के जॉइंट डायरेक्टर (क्राइम) ने जांच रिपोर्ट तैयार कर इसे ब्यूरो के चीफ डायरेक्टर को भेजा। चीफ डायरेक्टर ने 27 मई को रिपोर्ट अंतिम निर्णय के लिए पंजाब सरकार के सचिव, विजिलेंस को भेज दी। इसके बाद ब्यूरो की ओर से हाईकोर्ट में स्टेटस रिपोर्ट दाखिल की गई। रिपोर्ट में कहा गया है कि तीनों रिटायर्ड IAS अधिकारियों के खिलाफ आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त ठोस साक्ष्य नहीं मिले।
















