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गांव में अब मनमाना निर्माण नहीं! बड़े मकान और बिल्डिंग के लिए नक्शा मंजूरी का नया सिस्टम

पटना  बिहार के ग्रामीण इलाकों में बड़े और बहुमंजिला मकानों के निर्माण को लेकर बड़ा बदलाव होने जा रहा है। अब गांवों में हर तरह का निर्माण पहले की तरह मनमाने तरीके से नहीं किया जा सकेगा। खासतौर पर बड़े प्रोजेक्ट और बहुमंजिला भवनों के लिए जिला स्तर पर निगरानी और नक्शा स्वीकृति की व्यवस्था…

गांव में अब मनमाना निर्माण नहीं! बड़े मकान और बिल्डिंग के लिए नक्शा मंजूरी का नया सिस्टम

पटना
 बिहार के ग्रामीण इलाकों में बड़े और बहुमंजिला मकानों के निर्माण को लेकर बड़ा बदलाव होने जा रहा है। अब गांवों में हर तरह का निर्माण पहले की तरह मनमाने तरीके से नहीं किया जा सकेगा।

खासतौर पर बड़े प्रोजेक्ट और बहुमंजिला भवनों के लिए जिला स्तर पर निगरानी और नक्शा स्वीकृति की व्यवस्था प्रस्तावित है।

गांव में बड़ा मकान बनाने से पहले अब क्या करना होगा?
नई व्यवस्था के तहत बड़े निर्माण के लिए जिला स्तर पर विशेष कमेटी की भूमिका तय की जाएगी। डीडीसी की अध्यक्षता में बनने वाली इस कमेटी में पंचायती राज, जिला परिषद, विधि और राजस्व विभाग से जुड़े अधिकारी शामिल होंगे।
यही व्यवस्था बड़े निर्माण प्रस्तावों की जांच और स्वीकृति में अहम भूमिका निभा सकती है।

500 वर्गमीटर पार करते ही बदल जाएगा नियम?
प्रस्तावित प्रावधानों के मुताबिक 500 वर्गमीटर से अधिक क्षेत्र में विकसित होने वाली रियल एस्टेट परियोजनाओं का पंजीकरण जरूरी होगा।

बिल्डर को लेआउट, स्वीकृतियां और निर्माण से जुड़ी जानकारी उपलब्ध करानी होगी। यानी बड़े ग्रामीण प्रोजेक्ट अब निगरानी के दायरे में आ सकते हैं।

बिल्डरों के लिए सबसे बड़ा बदलाव क्या है?
खरीदारों से मिलने वाली रकम को लेकर भी नई व्यवस्था प्रस्तावित है। परियोजना की राशि का 70 प्रतिशत अलग बैंक खाते में रखने का प्रावधान बताया गया है।

इस रकम का इस्तेमाल उसी परियोजना से जुड़े निर्धारित निर्माण और जमीन खर्च में किया जा सकेगा।

घर समय पर नहीं मिला तो क्या होगा?
अगर बिल्डर तय समय पर परियोजना पूरी नहीं करता है, तो खरीदार को राहत मिल सकती है। प्रस्तावित नियमों के तहत देरी की स्थिति में ब्याज और मुआवजे का प्रावधान हो सकता है। इससे ग्रामीण इलाकों में फ्लैट खरीदने वाले लोगों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।

पांच साल बाद भी बिल्डर की जिम्मेदारी!
निर्माण पूरा होने के बाद भी बिल्डर की जिम्मेदारी पूरी तरह खत्म नहीं होगी। प्रस्तावित व्यवस्था में पांच साल के भीतर गंभीर निर्माण या संरचनात्मक दोष सामने आने पर उसे बिना अतिरिक्त शुल्क ठीक करने की जिम्मेदारी बिल्डर की हो सकती है।

कार्पेट एरिया के नाम पर खेल भी होगा मुश्किल?
बिल्डरों को बिल्ट-अप एरिया और कार्पेट एरिया की जानकारी स्पष्ट रूप से देनी होगी। इससे खरीदारों को फ्लैट के वास्तविक उपयोगी क्षेत्र की जानकारी मिल सकेगी और क्षेत्रफल को लेकर होने वाले विवादों को कम किया जा सकेगा।

लेकिन हर गांव का मकान इस नियम में नहीं आएगा!
प्रस्तावित व्यवस्था में छोटे मकानों को राहत दी गई है। 500 वर्गमीटर तक की छोटी परियोजनाओं और सामान्य ग्राउंड प्लस दो मंजिला मकानों को अनिवार्य नक्शा स्वीकृति के दायरे से बाहर रखने का प्रावधान बताया गया है। बड़े या अधिक मंजिल वाले निर्माण पर नियम लागू हो सकते हैं।

आखिर सरकार को गांवों में ये कदम क्यों उठाना पड़ा?
शहरों से सटे ग्रामीण क्षेत्रों में अपार्टमेंट और बड़े भवनों का निर्माण तेजी से बढ़ा है। कई जगह सड़क, पार्किंग और जल निकासी जैसी सुविधाओं की पर्याप्त योजना के बिना निर्माण होने से समस्याएं सामने आई हैं। नई व्यवस्था का उद्देश्य ऐसे निर्माण को नियंत्रित करना है।

अभी सबसे बड़ा सवाल-कब से लागू होंगे ये नियम?
फिलहाल विस्तृत नियमावली और अंतिम अधिसूचना का इंतजार है। डीडीसी कमेटी, आवेदन प्रक्रिया और नक्शा स्वीकृति के अंतिम नियम उसी के बाद स्पष्ट होंगे।

यानी अभी बड़े निर्माण को लेकर प्रस्तावित व्यवस्था सामने है, लेकिन इसके जमीन पर लागू होने की पूरी तस्वीर आधिकारिक नियम जारी होने के बाद ही साफ होगी।

 

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