मेघालय में BJP का बढ़ सकता है कुनबा, UDP-TMC के 13 विधायकों के पार्टी में शामिल होने की चर्चा

शिलांग मेघालय में भाजपा का ‘ऑपरेशन लोटस’ जोर पकड़ता दिख रहा है। विधानसभा में फिलहाल सिर्फ दो विधायकों वाली पार्टी अचानक 15 के आंकड़े तक पहुंच सकती है। सूत्रों के मुताबिक यूडीपी के नौ और ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के चार समेत कुल 13 मौजूदा विधायक भगवा पार्टी में शामिल होने को तैयार…

मेघालय में BJP का बढ़ सकता है कुनबा, UDP-TMC के 13 विधायकों के पार्टी में शामिल होने की चर्चा

शिलांग
मेघालय में भाजपा का ‘ऑपरेशन लोटस’ जोर पकड़ता दिख रहा है। विधानसभा में फिलहाल सिर्फ दो विधायकों वाली पार्टी अचानक 15 के आंकड़े तक पहुंच सकती है। सूत्रों के मुताबिक यूडीपी के नौ और ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के चार समेत कुल 13 मौजूदा विधायक भगवा पार्टी में शामिल होने को तैयार हैं। राज्य भाजपा नेताओं ने पुष्टि की है कि इस संबंध में केंद्रीय स्तर पर बातचीत चल रही है। बताया जा रहा है कि टीएमसी गुट में पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. मुकुल संगमा भी शामिल हैं। 60 सदस्यीय विधानसभा में यूडीपी के 12 और टीएमसी के चार विधायक हैं। इनमें से कुछ ने हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की थी।

कैबिनेट फेरबदल से बढ़ा असंतोष
नेशनल पीपुल्स पार्टी (NPP) के नेतृत्व वाली मेघालय डेमोक्रेटिक अलायंस सरकार में सहयोगी यूडीपी के भीतर सितंबर 2025 के कैबिनेट फेरबदल के बाद असंतोष उभरा। पर्यटन मंत्री पॉल लिंगदोह की जगह पार्टी अध्यक्ष मेटबाह लिंगदोह को कैबिनेट में शामिल किए जाने से पार्टी में गुटीय संघर्ष गहरा गया। 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले यह दरार और साफ हो गई है। हालांकि यूडीपी सूत्रों ने ऐसे कदम की संभावना से इनकार नहीं किया। एक वरिष्ठ नेता ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि मैं इसकी पुष्टि या खंडन नहीं करना चाहता। अगर पार्टी का बंटवारा होना है तो होगा। दलबदल विरोधी कानून से बचने के लिए पर्याप्त संख्या हो तो कोई उन्हें रोक नहीं सकता। यहां बता दें कि पॉल लिंगदोह ने पहले अफवाहों की बात स्वीकार की थी, लेकिन कहा था कि उनके पास पर्याप्त जानकारी नहीं है।

भाजपा ने बातचीत की पुष्टि की
वहीं, मेघालय के एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने कहा कि राज्य इकाई के अध्यक्ष ने यूडीपी विधायकों को आमंत्रित किया था, लेकिन अब वे सीधे केंद्रीय नेताओं से बात कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस समय कोई अनुमान नहीं लगाना चाहते। नतीजे का इंतजार करेंगे। यहां बता दें कि वर्तमान में भाजपा के विधानसभा में दो विधायक हैं, अलेक्जेंडर लालू हेक और सनबोर शुल्लाई। शुल्लाई कैबिनेट मंत्री हैं। भाजपा नेता के अनुसार, 2028 के चुनाव में पार्टी का लक्ष्य राज्य में अपना नेतृत्व वाली सरकार बनाना है।

दो सप्ताह पहले शिक्षा मंत्री लाहकमेन रिम्बुई के नेतृत्व में यूडीपी के आठ सदस्यों के प्रतिनिधिमंडल ने अमित शाह से मुलाकात की थी। बैठक में पूर्वोत्तर प्रभारी सांसद संबित पात्रा भी मौजूद थे। आधिकारिक तौर पर एफसीआरए संशोधन विधेयक समेत इनर लाइन परमिट, निवासी सुरक्षा अधिनियम, खासी-गारो भाषाओं को आठवीं अनुसूची में शामिल करने, यूरेनियम खनन और मूल आस्थाओं की मान्यता जैसे मुद्दे उठाए गए। सूत्रों का दावा है कि संभावित विलय पर भी चर्चा हुई।

ऐसी चर्चाएं क्यों?
UDP विधायकों और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बीच हाल ही में हुई बैठक के बाद राजनीतिक सरगर्मी और बढ़ गई है. UDP का कहना था कि बातचीत मुख्य रूप से फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) एक्ट (FCRA) और मेघालय से जुड़े अन्य मुद्दों पर केंद्रित थी. हालांकि, सूत्रों ने कहा कि हालिया घटनाक्रमों को देखते हुए, इस बैठक का राजनीतिक महत्व काफी बढ़ गया है। 

अगर यह कदम असल में उठाया जाता है, तो इससे विधानसभा के गणित में बड़ा उलटफेर हो सकता है और सत्ताधारी खेमे में शक्ति का संतुलन बदल सकता है। 

हालांकि प्रस्तावित बदलाव और सबसे अहम बात यह कि यह कब होगा, इसकी पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन हाल के दिनों में राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं। 

अंदरूनी सूत्रों ने संकेत दिया है कि विधायक तुरंत पाला बदलने की तैयारी कर रहे हैं या अपने विकल्प खुले रख रहे हैं, यह गहन राजनीतिक अटकलों का विषय बना हुआ है. सूत्रों का कहना है कि अगर प्रस्तावित गठबंधन होता है, तो जिन मांगों पर चर्चा हो रही है, उनमें से एक बीजेपी के लिए ज्यादा मंत्री पद हासिल करना भी है। 

क्या बदल जाएगा पावर बैलेंस?
इस तरह की व्यवस्था मौजूदा सरकार में सत्ता-साझेदारी के समीकरण को काफी बदल सकती है और बीजेपी की मोल-भाव करने की स्थिति को मजबूत कर सकती है। 

ना तो संबंधित विधायकों और ना ही बीजेपी ने आधिकारिक तौर पर इस कदम की पुष्टि की है. फिर भी, UDP के भीतर राजनीतिक सरगर्मी तेजी से बढ़ गई है, क्योंकि एक बड़े गुट के अलग होने की संभावना से क्षेत्रीय पार्टी के भीतर गहरे मतभेद सामने आ सकते हैं। 

UDP के पास अभी 60 सदस्यों वाली विधानसभा में 12 विधायक हैं. अगर नौ सदस्यों वाला यह गुट बीजेपी की ओर जाता है, तो इसके दूरगामी परिणाम होंगे – न केवल UDP के लिए, बल्कि मेघालय के पूरे गठबंधन के समीकरण के लिए भी। 

UDP के भीतर बढ़ रही नाराजगी!
यह अटकलें UDP के भीतर बढ़ती नाराजगी की खबरों के बीच लगाई जा रही हैं. कई विधायक कथित तौर पर पार्टी अध्यक्ष मेटबाह लिंगदोह से नाखुश हैं, जिन्हें मुख्यमंत्री कॉनराड संगमा का करीबी माना जाता है। 

UDP सूत्रों ने बताया कि हाल ही में हुई केंद्रीय कार्यकारी समिति की बैठक में विधायकों ने पार्टी नेतृत्व के प्रति अपनी नाराजगी जाहिर की. कुछ विधायकों ने तीखी बहस के बाद बैठक से वॉकआउट भी किया। 

पता चला है कि पार्टी नेतृत्व ने लिंगदोह से बढ़ती बेचैनी के बीच संसदीय दल की बैठक बुलाने का आग्रह किया है। 

दल-बदल लागू नहीं होगा!
संख्याओं ने राजनीतिक समीकरण को और भी पेचीदा बना दिया है. UDP के 12 विधायकों में से, दलबदल विरोधी प्रावधानों के तहत विलय के लिए दो-तिहाई बहुमत की शर्त पूरी करने के लिए कम से कम आठ विधायकों की जरूरत होगी। 

अगर नौ सदस्यों वाला यह गुट औपचारिक रूप से बीजेपी में विलय करता है, तो UDP के पास केवल तीन विधायक रह जाएंगे, जबकि बीजेपी की ताकत दो से बढ़कर 11 हो सकती है। 

इससे मेघालय में बीजेपी की अब तक की सबसे बड़ी विधायी उपस्थिति हो सकती है और सत्ताधारी गठबंधन के भीतर उसकी राजनीतिक ताकत काफी बढ़ सकती है। 

बीजेपी के लिए यह एक बड़ी राजनीतिक उपलब्धि होगी, जिससे उसकी उपस्थिति का काफी विस्तार होगा और 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले उसकी स्थिति मजबूत हो सकती है। 

संख्या बल
बताया जा रहा है कि अगर यदि नौ यूडीपी और चार टीएमसी विधायक शामिल होते हैं तो भाजपा को 13 विधायकों का लाभ मिल सकता है। दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता से बचने के लिए विलय के रूप में कम से कम आठ यूडीपी और तीन टीएमसी विधायकों का जाना जरूरी होगा। ऐसा होने पर भाजपा की संख्या 15 हो जाएगी और वह गठबंधन में दूसरी सबसे बड़ी सहयोगी बन जाएगी। फिलहाल यह जगह यूडीपी के पास है।

गौरतलब है कि एनपीपी के पास 33 विधायक हैं और वह अकेले सरकार चला सकती है। मुख्यमंत्री कॉनराड संगमा 2028 के चुनावों को देखते हुए मौजूदा व्यवस्था में बदलाव से बच सकते हैं। एनपीपी केंद्र में एनडीए की सहयोगी भी है। हालांकि भाजपा के लिए चुनौतियां कम नहीं हैं। यूडीपी स्थानीय मुद्दों पर मुखर रही है। पार्टी इनर लाइन परमिट लागू करने की मांग करती रही है, जबकि केंद्र सरकार इसका विरोध कर रही है। शामिल होने वाले विधायकों को ऐसे कई मुद्दों पर भाजपा के रुख से तालमेल बैठाना होगा।

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