मंदसौर
भारत के महत्त्वाकांक्षी ‘प्रोजेक्ट चीता’ की सफलता की कहानी में एक और ऐतिहासिक पन्ना जुड़ गया है। दक्षिण अफ्रीका की धरती से आए दो चीता भाई प्रभास और पावक ने मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले में स्थित गांधीसागर वन्यजीव अभयारण्य में अपना एक साल यानी 365 दिन सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है। तारीखों की नजर से देखें 3 साल का गौरवशाली सफर
इन दोनों भाइयों का भारत में अब तक का सफर किसी रोमांचक फिल्म से कम नहीं रहा है:
-18 फरवरी 2023: दक्षिण अफ्रीका से उड़ान भरकर भारत की मिट्टी पर कदम रखा।
-2 साल (कूनो नेशनल पार्क): भारत की जलवायु, शिकार और वातावरण को समझने के लिए कूनो में लंबा समय बिताया।
-1 साल (गांधीसागर): आज गांधीसागर में इनका एक साल पूरा होना इस बात पर मुहर लगाता है कि यह अभयारण्य चीतों के लिए एक आदर्श और सुरक्षित घर है।
भाईचारे और शिकार का अनूठा तालमेल
इनकी साझेदारी ही गांधीसागर में इनकी सफलता का सबसे बड़ा राज है। फील्ड टीम की निगरानी में इनके गठबंधन की कुछ ऐसी बारीकियाँ सामने आई हैं जो हैरान कर देने वाली हैं।
-शिकार की रणनीति: जब ये शिकार पर निकलते हैं तो दोनों के बीच एक मूक संवाद होता है। एक भाई शिकार का पीछा कर उसे थकाता है तो दूसरा सटीक घात लगाकर उसे दबोच लेता है।
-सुरक्षा का पहरा: भोजन करते समय ये कभी लापरवाह नहीं होते। जब एक शिकार खाता है, तो दूसरा मुस्तैद होकर चारों तरफ पहरा देता है। आराम करते समय भी दोनों अपनी पीठ जोड़कर विपरीत दिशाओं में मुँह करके बैठते हैं, ताकि 360-डिग्री सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
-संकट में साथ: टीम ने देखा है कि अगर एक भाई सुस्त महसूस करता है, तो दूसरा उसे छोड़कर ओझल नहीं होता। वह उसके इर्द-गिर्द ही रहता है, मानो उसे हिम्मत दे रहा हो।
एलोग्रूमिंग (सामाजिक साफ़-सफ़ाई)
उद्देश्य: यह सामाजिक संबंधों को मज़बूत करता है, विशेष रूप से नर चीतों के समूहों (भाई या करीबी नर साथी) और कभी-कभी माँ और शावकों के बीच।
संदर्भ: यह अक्सर भोजन के बाद देखा जाता है, जिससे चेहरे जैसे कठिन स्थानों से खून और गंदगी को हटाने में मदद मिलती है।
व्यवहार: इसमें दूसरे चीते को चाटना, कुतरना और रगड़ना शामिल है, जो एक आरामदायक और जुड़ाव भरा अनुभव हो सकता है।
जुड़ी हुई आवाज़े: इन ग्रूमिंग सत्रों के दौरान अक्सर उनके ‘पुर्राने’ (Purring) की आवाज़ सुनी जा सकती है।
ऑटोग्रूमिंग (स्वयं की साफ़-सफ़ाई)
उद्देश्य: चीते अपने शरीर को साफ़ करने के लिए अपनी जीभ का उपयोग करते हैं, जो गंदगी और परजीवियों को हटाने और उनके फर (रौएं) के रखरखाव के लिए महत्वपूर्ण है।
प्रक्रिया: उनकी जीभ पर विशेष ‘केराटिनाइज्ड पैपिला’ (छोटी, खुरदरी, कंघी जैसी संरचनाएं) होती हैं, जो एक स्क्रबर की तरह काम करती हैं और गंदगी व ढीले बालों को हटाने में मदद करती हैं।
बेहद जरूरी: यह ग्रूमिंग व्यवहार चीतों के स्वास्थ्य, स्वच्छता और उनके समूहों में आपसी एकता बनाए रखने के लिए बहुत आवश्यक हैं।
मंदसौर में चीता संरक्षण की दिशा में ऐतिहासिक कदम, प्रभास और पावक ने पार किया बड़ा पड़ाव
मंदसौर भारत के महत्त्वाकांक्षी ‘प्रोजेक्ट चीता’ की सफलता की कहानी में एक और ऐतिहासिक पन्ना जुड़ गया है। दक्षिण अफ्रीका की धरती से आए दो चीता भाई प्रभास और पावक ने मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले में स्थित गांधीसागर वन्यजीव अभयारण्य में अपना एक साल यानी 365 दिन सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है। तारीखों की…

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