Saudi Economy पर दबाव! मोहम्मद बिन सलमान ने मांगा ₹75,876 करोड़ का कर्ज, जानें क्यों पड़ी जरूरत

दुबई  सऊदी अरब का जिक्र होते ही रियाल, तेल, ऐश और रईसी ही सबके जेहन में आता है। गगनचुंबी इमारतें और रॉकेट की रफ्तार से चलती लग्जरी कारों के देश की पहचान धनकुबेर वाले देशों के रूप में की जाती है। दुनियाभर के कई लोगों का सपना होता है कि वे सऊदी अरब में जाकर…

Saudi Economy पर दबाव! मोहम्मद बिन सलमान ने मांगा ₹75,876 करोड़ का कर्ज, जानें क्यों पड़ी जरूरत

दुबई 

सऊदी अरब का जिक्र होते ही रियाल, तेल, ऐश और रईसी ही सबके जेहन में आता है। गगनचुंबी इमारतें और रॉकेट की रफ्तार से चलती लग्जरी कारों के देश की पहचान धनकुबेर वाले देशों के रूप में की जाती है। दुनियाभर के कई लोगों का सपना होता है कि वे सऊदी अरब में जाकर काम करें और तगड़ा पैसा कमाकर वापस लौटें। इन सब के अलावा जब भी किसी देश को पैसे की जरूरत होती है तो ज्यादातर सऊदी अरब की तरफ रुख करते हैं। लेकिन इस बार तस्वीर थोड़ा उलट है। दुनिया के कई देशों को लोन की हेल्प करने वाले सऊदी को अब खुद लोन की जरूरत पड़ रही है।

सऊदी को पड़ी 8 अरब डॉलर की जरूरत
सऊदी अरब लंबे समय से दुनियाभर में तेल की सप्लाई करने और मध्य पूर्व का वित्तीय महाशक्ति रहा है। सॉवरेन वेल्थ फंड के जरिये सऊदी अरब दुनिया भर में पैसे निवेश करता रहा है और विकासशील देशों को मदद और लोन मुहैया कराता रहा है। लेकिन शेखों के देश में एक अलग मोड आ गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक इस वक्त सऊदी अरब का नेशनल डेट मैनेजमेंट सेंटर (NDMC) लगभग 8 अरब डॉलर के नए सिंडिकेटेड लोन के लिए बैंकों से चर्चा कर रहा है। इसे भारतीय मुद्रा में बदलने पर ₹7.6 खरब होते हैं। सऊदी की सरकारी तेल कंपनी अरामको भी इसी तरह के फाइनेंसिंग विकल्पों पर बातचीत कर रही है।

ईरान युद्ध से टूटी सऊदी के इकॉनमी की रफ्तार
अब सवाल ये है कि मिडिल ईस्ट में धाक रखने वाले सऊदी को आखिर इतने पैसों की जरूरत क्यों पड़ रही है? दरअसल ईरान में चल रहे युद्ध ने सऊदी अरब की इकोनॉमी पर तगड़ा असर डाला है। इस वॉर ने तेल के इंपोर्ट, सप्लाई के प्रमुख रास्तों और सप्लाई चेन पर बुरा असर पड़ा है, इसकी वजह से सऊदी अरब के तेल निर्यात में कमी आई है।

इसके अलावा तेहरान ने सऊदी अरब के एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाया है, जबकि ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने लाल सागर में जहाजों के लिए खतरा पैदा कर दिया है। एक तरफ स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से सऊदी तेल की ब्रिकी में कमी आई है तो वहीं दूसरी ओर हूती विद्रोहियों की वजह से बाब अल मंदेब भी बंद रहता है। इन हमलों की वजह से तेल सेक्टर में लगभग 25% की गिरावट आई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक कोरोना महामारी के बाद से दूसरी तिमाही में सऊदी अर्थव्यवस्था में सबसे बड़ी गिरावट देखी गई।

सऊदी को क्यों चाहिए इतने पैसे?
सऊदी अरब का जिक्र होते ही पैसे ही पैसे नजर आते हैं, लेकिन मिडिल ईस्ट में अमेरिकी और इजरायली हमलों के बाद तस्वीर कुछ और ही बन गई है है। दरअसल सऊदी अरब को इतने मोटे पैसे की जरूरत की वजह उसका विजन 2030 है। बता दें कि साल 2016 में MBS द्वारा शुरू की गई इस योजना का लक्ष्य तेल निर्भरता कम करके टूरिज्म, इंटरटेनमेंट, मैन्युफैक्चरिंग, लॉजिस्टिक्स और टेक्नोलॉजी सेक्टर के माध्यम से अर्थव्यवस्था को कई क्षेत्रों में ले जाना है।

क्राउन प्रिंस सलमान का मानना कि जब सऊदी का कच्चा तेल कम होगा या खत्म होने की कगार पर आएगा तो उसे अचानक आर्थिक समस्याओं का सामना ना करना पड़े। इसलिए अभी से ही देश की अर्थव्यवस्था को और क्षेत्रों के लिए खोलना चाहते हैं।

 

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