सचिन तेंदुलकर ने पिता को दी अनोखी श्रद्धांजलि, युवा डॉक्टरों के लिए शुरू की फेलोशिप

नई दिल्ली टीचर्स डे के खास मौके पर क्रिकेट के दिग्गज सचिन तेंदुलकर ने एक दिल छू लेने वाली पहल की है. अपने दिवंगत पिता और जिंदगी के पहले गुरु रमेश तेंदुलकर की याद में सचिन ने प्रोफेसर रमेश तेंदुलकर मेमोरियल फेलोशिप शुरू करने का ऐलान किया है l इस फेलोशिप का मकसद मेडिकल फील्ड…

सचिन तेंदुलकर ने पिता को दी अनोखी श्रद्धांजलि, युवा डॉक्टरों के लिए शुरू की फेलोशिप

नई दिल्ली
टीचर्स डे के खास मौके पर क्रिकेट के दिग्गज सचिन तेंदुलकर ने एक दिल छू लेने वाली पहल की है. अपने दिवंगत पिता और जिंदगी के पहले गुरु रमेश तेंदुलकर की याद में सचिन ने प्रोफेसर रमेश तेंदुलकर मेमोरियल फेलोशिप शुरू करने का ऐलान किया है l

इस फेलोशिप का मकसद मेडिकल फील्ड में युवा और होनहार डॉक्टरों की मदद करना है. इसके तहत हर साल एक युवा डॉक्टर (MD) को आर्थिक मदद दी जाएगी. यह मदद श्रीनगर में क्लिफ्ट और क्रैनियोफेशियल केयर की स्पेशल ट्रेनिंग के लिए होगी l

एक साल का यह खास प्रोग्राम पूरा होने पर डॉक्टर को सचिन तेंदुलकर फाउंडेशन की तरफ से एक सर्टिफिकेट भी दिया जाएगा. यह शानदार पहल इंगा हेल्थ फाउंडेशन के साथ मिलकर शुरू की गई है, जो लंबे समय से सचिन के फाउंडेशन का हेल्थ केयर पार्टनर है l
   
पिता को याद कर भावुक हुए सचिन
इस मौके पर सचिन अपने पिता को याद करते हुए काफी भावुक नजर आए. उनके पिता रमेश तेंदुलकर एक प्रोफेसर, लेखक और कवि थे. 1999 में उनका निधन हो गया था. सचिन ने कहा कि जब भी मैं अपने सफर के बारे में सोचता हूं, तो उसकी शुरुआत किसी क्रिकेट मैदान या कोच से नहीं, बल्कि मेरे घर से होती है. मेरे पिता ने ही सबसे पहले मेरे टैलेंट को पहचाना था. उन्होंने कभी मुझे यह नहीं बताया कि मुझे क्या बनना चाहिए, बल्कि मुझे अपने रास्ते खुद चुनने की पूरी आजादी दी l

पिता की वो सीख जो सचिन कभी नहीं भूले
सचिन ने बचपन का एक किस्सा शेयर करते हुए बताया कि उनके पिता ने उन्हें सफलता से ज्यादा अच्छे चरित्र की अहमियत सिखाई थी. सचिन ने बताया कि मेरे पिता की एक बात हमेशा मेरे साथ रही है- उन्होंने कहा था कि फेल होना ठीक है, लेकिन बेईमानी करना नहीं. जिंदगी में कभी शॉर्टकट मत लेना l

सचिन और उनकी पत्नी अंजलि का मानना है कि भारत में टैलेंट की कोई कमी नहीं है, बस बच्चों को सही गाइडेंस, कोच और स्वास्थ्य सुविधाएं मिलने की देरी है. इसी सोच के साथ उन्होंने अपना फाउंडेशन शुरू किया था l

अपनी नई फेलोशिप के बारे में बात करते हुए सचिन ने कहा कि मेरे लिए यह सिर्फ एक फेलोशिप नहीं है. यह मेरे पिता की उस सोच को आगे बढ़ाने का एक तरीका है, जिसमें वो मानते थे कि शिक्षा से मौके बनते हैं, और वो मौके तब सबसे ज्यादा मायने रखते हैं जब उनका इस्तेमाल दूसरों की मदद के लिए किया जाए l

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