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अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें 44% बढ़ीं, युद्ध के असर से उछाल; भारत में मिली राहत

वाशिंगटन/ नई दिल्ली ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से दुनियाभर में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भारी उथल-पुथल देखने को मिली है। लेटेस्ट..

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अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें 44% बढ़ीं, युद्ध के असर से उछाल; भारत में मिली राहत

वाशिंगटन/ नई दिल्ली
ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से दुनियाभर में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भारी उथल-पुथल देखने को मिली है। लेटेस्ट आंकड़ों के अनुसार, ब्रेंट क्रूड तेल की कीमत 71 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 107 डॉलर पर पहुंच गई, जिसका सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ा है।
ग्लोबल पेट्र्रोल प्राइस डॉट कॉम के ताजा अपडेट के मुताबिक लाओस में डीजल 149.7% और पेट्रोल की कीमतों में 35.8% की उछाल दर्ज की गई है। म्यांमार में पेट्रोल की कीमतें 89.7% और डीजल 112.7% तक बढ़ गईं।
न्यूजीलैंड में डीजल 88.6 प्रतिशत और पेट्रोल 30.7 प्रतिशत महंगा हुआ है। यूएई में पेट्रोल में 52.4% और डीजल में 86 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। ग्लोबल पेट्र्रोल प्राइस डॉट कॉम के ताजा अपडेट के मुताबिक दुनिया में सबसे महंगा पेट्रोल हांगकांग में 394.95 रुपये लीटर है। वहीं, इजरायल में 269.19 रुपये।
अमेरिका और यूरोप में भी बढ़ी तेल की कीमतें
जिन देशों में फ्यूल मार्केट पूरी तरह से खुला है, वहां कीमतें आसमान छू रही हैं। अमेरिका में पेट्रोल की कीमत में 44.5% की भारी बढ़ोतरी हुई है। यहां एक लीटर पेट्रोल की कीमत 119.55 रुपये है।
यूरोपीय देशों में फ्रांस (20.9%), बेल्जियम (25.3%) और यूके (19.2%) में बढ़ोतरी हुई है। यूके में 1 लीटर पेट्रोल की कीमत 202.15 रुपये है। एक लीटर पेट्रोल की कीमत आयरलैंड में 202.35 रुपये, इटली में 213.49 रुपये, फ्रांस में 223.36 रुपये, जर्मनी में 223.67 रुपये लीटर है।
भारत में क्यों नहीं बढ़े पेट्रोल-डीजल के दाम
पाकिस्तान में भी पेट्रोल 54.9% और श्रीलंका में 38.2% महंगा हुआ है। जहां दुनिया जल रही है, वहीं भारत में स्थिति बिल्कुल विपरीत रही। भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है। भारत में कीमतें स्थिर रहने के पीछे सरकार का हस्तक्षेप है। केंद्र सरकार ने साफ कहा है कि देश में पेट्रोल, डीजल और घरेलू एलपीजी सिलेंडरों के दाम फिलहाल नहीं बढ़ाए जाएंगे।
आमतौर पर भारत में कीमतें युद्ध या संकट के तुरंत बाद नहीं बढ़ाई जातीं। सरकार और तेल कंपनियां कुछ हफ्तों तक इंतजार करती हैं कि कहीं कीमतें वापस गिर तो नहीं रही हैं। इसके अलावा, चुनाव या जनता के दबाव में सरकारें एक्साइज ड्यूटी में कटौती करके कीमतों को नियंत्रित रखती हैं। हालांकि, अगर क्रूड की कीमतें 110 डॉलर पर टिकी रहीं, तो यह राहत लंबे समय तक नहीं टिकेगी।
आगे का रास्ता
एक्सपर्ट्स का कहना है कि ईरान युद्ध जारी रहने तक तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव बना रहेगा। अमेरिका और यूरोप में महंगाई बढ़ना तय है। जिन देशों ने अब तक कीमतें नहीं बढ़ाई हैं (जैसे भारत), वहां सरकारों के पास दो विकल्प हैं या तो सब्सिडी देकर खजाना खाली करें, या फिर कीमतें बढ़ाकर जनता पर बोझ डालें।

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