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झज्जर सेक्टर-6 के जमीन मालिकों को बड़ी राहत, हाई कोर्ट ने योजना का लाभ देने के दिए निर्देश

 चंडीगढ़  पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने हरियाणा की वर्ष 2012 की लैंड पूलिंग योजना के तहत जमीन मालिकों के अधिकार को बरकरार रखते हुए स्पष्ट किया है कि अधिग्रहित जमीन के मालिकों को राज्य के आश्वासन के बाद योजना का लाभ देने से इन्कार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने झज्जर के सेक्टर-6 पार्ट…

झज्जर सेक्टर-6 के जमीन मालिकों को बड़ी राहत, हाई कोर्ट ने योजना का लाभ देने के दिए निर्देश

 चंडीगढ़
 पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने हरियाणा की वर्ष 2012 की लैंड पूलिंग योजना के तहत जमीन मालिकों के अधिकार को बरकरार रखते हुए स्पष्ट किया है कि अधिग्रहित जमीन के मालिकों को राज्य के आश्वासन के बाद योजना का लाभ देने से इन्कार नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने झज्जर के सेक्टर-6 पार्ट के लिए अनिवार्य रूप से अधिग्रहित जमीन के मालिकों को योजना के तहत पात्र मानते हुए निर्देश दिया कि सेक्टर के पहली बार विकसित होने पर उन्हें उनकी पात्रता के अनुसार विकसित प्लॉट आवंटित किए जाएं या योजना के प्रविधानों के अनुसार राशि दी जाए।

जस्टिस विकास बहल और जस्टिस दिव्या शर्मा की खंडपीठ ने आठ याचिकाओं का निपटारा करते हुए यह आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि भूमि पूलिंग योजना का उद्देश्य अधिग्रहण के कारण अपनी जमीन खोने वाले भू-स्वामियों को विकास प्रक्रिया में भागीदार बनाना था।

मामले में कोर्ट ने पाया कि अधिकारियों ने पात्र जमीन मालिकों को विकसित जमीन देने का स्पष्ट आश्वासन दिया था। इसी भरोसे पर याचिकाकर्ताओं ने वर्ष 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून के तहत मिलने वाला मुआवजा और अन्य वैधानिक लाभ नहीं लिए। कुछ याचिकाकर्ताओं को 23 अगस्त 2013 के अवार्ड के बाद योजना के तहत 42 लाख रुपये प्रत्येक अग्रिम राशि के रूप में भी दिए गए थे।

कोर्ट ने कहा कि जब जमीन मालिकों ने राज्य के स्पष्ट आश्वासन पर अपनी स्थिति बदल ली और दूसरे लाभ नहीं लिए तो बाद में सरकार अपने वादे से पीछे नहीं हट सकती। अधिकारियों की ओर से यह तर्क दिया गया कि कुछ याचिकाकर्ताओं ने निर्धारित समय सीमा में आवेदन नहीं किया था। हाई कोर्ट ने मूल रिकार्ड देखने के बाद इस दलील को स्वीकार नहीं किया।

पांच याचिकाओं के मामले में रिकार्ड से स्पष्ट हुआ कि आवेदन निर्धारित 60 दिन की अवधि के भीतर जमा किए गए थे और अधिकारियों ने उन्हें सत्यापित कर स्वीकार भी किया था।

इसलिए आवेदन में देरी के आधार पर योजना का लाभ न देना गलत बताया गया।अन्य याचिकाओं में भी कोर्ट ने पाया कि जमीन मालिकों ने राज्य के आश्वासन पर अपनी स्थिति बदली थी। उन्होंने न तो अनिवार्य अधिग्रहण का मुआवजा लिया और न 33 वर्ष की वार्षिकी अथवा पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन योजना के लाभ प्राप्त किए। ऐसे में राज्य उन्हें भूमि पूलिंग योजना से बाहर नहीं कर सकता।

पहली बार सेक्टर फ्लोट होने पर मिलेगा लाभ
हाई कोर्ट ने याचिकाएं स्वीकार करते हुए निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं को 10 सितंबर 2012 की भूमि पूलिंग योजना के अनुसार विकसित सेक्टर में पहली बार फ्लोटेशन के समय उनकी पात्रता के अनुरूप प्लॉट आवंटित किए जाएं अथवा योजना के प्रावधानों के अनुसार राशि का भुगतान किया जाए।

जिन याचिकाकर्ताओं ने पहले मिली अग्रिम राशि लौटानी है, वे 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ राशि लौटाने के लिए आवेदन कर सकेंगे। सक्षम अधिकारी को ऐसा आवेदन मिलने के चार सप्ताह के भीतर उसका निपटारा करना होगा। राशि लौटाने के बाद भी उनके विकसित प्लॉट पाने के अधिकार पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

13 साल बाद जल्द फ्लोटेशन के निर्देश
खंडपीठ ने कहा कि अवार्ड की घोषणा को 13 वर्ष से अधिक समय बीत चुका है। इसलिए अधिकारियों को सेक्टर की फ्लोटेशन प्रक्रिया जल्द पूरी करने का प्रयास करना चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि अग्रिम राशि लौटाने से जमीन मालिकों का पहली बार सेक्टर फ्लोट होने पर विकसित प्लॉट पाने का अधिकार किसी तरह प्रभावित नहीं होगा।

 

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