चंडीगढ़
पाकिस्तान एक बार फिर अपनी दोहरी नीति का शिकार नजर आ रहा है. भारत के ब्रह्मोस मिसाइल हमलों से हुए घावों को ढकने के लिए आर्मी चीफ जनरल आसिम मुनीर ने जो रणनीति अपनाई, वह अब उल्टी पड़ रही है. नूर खान एयरबेस पर ईरानी सैन्य विमानों को छिपाने की रिपोर्ट्स ने पाकिस्तान को बुरी तरह फंसा दिया है. सोचिए, अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वैंस का प्लेन उसी रनवे पर उतारा गया, जहां ईरान के जेट छिपे हुए थे. ये रिपोर्ट सच निकली तो यह घटनाक्रम पाकिस्तान को महागद्दार साबित करने वाला है. वैसे पहले भी पाकिस्तान ऐसा ही कर चुका है लेकिन डोनाल्ड ट्रंप की पुचकार पर पहली बार इस देश ने उन्हें अपनी औकात दिखाई है।
CBS न्यूज की हालिया रिपोर्ट के बताती है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा अप्रैल में ईरान के साथ सीजफायर की घोषणा के कुछ दिन बाद ही ईरान ने अपने सैन्य विमानों को पाकिस्तान में छिपाया. जिन विमानों को पाकिस्तान के नूर खान एयरबेस पर पार्क करवा दिया, उनमें RC-130 टोही विमान भी शामिल है. ईरान अमेरिकी या इजरायली हमलों से अपने एसेट्स को बचाना चाहता था और इसमें उसका साथ दिया पाकिस्तान ने. ये वही पाकिस्तान है, जो खुद को वाशिंगटन और तेहरान के बीच मध्यस्थ बता रहा था, वो हौले से ईरानी खेमे में सरक गया।
पाकिस्तान की गद्दारी तो देखिए
पाकिस्तानी अधिकारियों ने इन रिपोर्ट्स को खारिज करते हुए इसे डेलिगेशन लॉजिस्टिक्स बताया, लेकिन तथ्य कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं. इस बीच आसिम मुनीर की दोहरी छवि भी चर्चा में रही. ईरानी डेलिगेशन का स्वागत करते समय वे कॉम्बैट गियर में थे, जबकि जेडी वैंस के आने पर सूट-बूट में. नूर खान एयरबेस, जो पिछले साल भारत के ऑपरेशन सिंदूर में ब्रह्मोस हमलों से क्षतिग्रस्त हुआ था, एक बार फिर सुर्खियों में है. मुनीर ने इस बेस को ढाल बनाने की कोशिश की, लेकिन यह अब पाकिस्तान की कमजोरी का प्रतीक बन गया है. ये पाकिस्तान के दोहरे चेहरे का सिंबल बन गया है, जो कभी भी पाला बदल सकता है।
अमेरिकी सीनेटर ने उठाए सवाल
अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने पाकिस्तान की इस भूमिका पर सवाल उठाए हैं. उन्होंने मध्यस्थ की भूमिका पर पुनर्विचार की मांग की और कहा कि पाकिस्तान की निष्पक्षता पर संदेह है. ग्राहम की टिप्पणियों ने वाशिंगटन में पाकिस्तान के प्रति बढ़ते अविश्वास को रेखांकित किया. ईरान के साथ पाकिस्तान के संबंध लंबे समय से चले आ रहे हैं- साझा सीमा, ऊर्जा सहयोग और क्षेत्रीय संतुलन के नाम पर. साल 1979 की ईरानी क्रांति के बाद भी दोनों देशों ने एक-दूसरे को समर्थन दिया, लेकिन अमेरिका, पाकिस्तान का प्रमुख सहयोगी रहा है. वो उससे अरबों डॉलर की सैन्य और आर्थिक मदद, F-16 जैसे हथियार और आतंकवाद के खिलाफ साझा अभियान चलाता रहा है. बावजूद इसके पाकिस्तान ईरान को शरण दे रहा है. ये उसकी नीयत पर सवाल उठाता है।
कूटनीति या दोगलापन?
पाकिस्तान न तो पूर्ण रूप से अमेरिकी ब्लॉक में है और न ही चीनी-ईरानी धुरी में. चीन के साथ CPEC और सैन्य सहयोग और ईरान के साथ गुप्त संबंध बनाए रखना उसे अमेरिका की नजर में अविश्वसनीय बनाता है।
ब्रह्मोस हमलों के बाद पाकिस्तान ने अपनी वायु रक्षा को मजबूत करने का दावा किया, लेकिन ईरानी जेट छिपाने से उसकी क्षमता और विश्वसनीयता दोनों पर सवाल उठ गए हैं।
पाकिस्तान अब बुरी तरह फंस गया है. एक तरफ अमेरिका से सहायता की उम्मीद, दूसरी तरफ ईरान और चीन के साथ पुराने गठजोड़ उसे कठघरे में खड़ा करता है. जेडी वेंस का प्लेन उसी एयरबेस पर उतरा, जो संकेत देता है कि अमेरिका की भी नजर उसकी हर चाल पर है।
फिलहाल, पाकिस्तान सिर्फ अपना स्वार्थ देख रहा है, यही वजह है कि उसने सऊदी अरब के साथ अपने पैक्ट के तहत सेनाएं न भेजने के लिए ईरान से भी समझौता कर लिया. भले ही इससे वो अमेरिका की आंखों में धूल झोंक रहा है।
ब्रह्मोस के खौफ में पाकिस्तान! मुनीर ने हैंगर में छिपाए ईरानी फाइटर जेट, रनवे पर उतारा जेडी वेंस का विमान
चंडीगढ़ पाकिस्तान एक बार फिर अपनी दोहरी नीति का शिकार नजर आ रहा है. भारत के ब्रह्मोस मिसाइल हमलों से हुए घावों को ढकने के..

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