13 देशों के 101 संगठनों पर बड़ा दावा, फ्रांस से भारत तक प्रदर्शनों के नेटवर्क की चर्चा

नई दिल्ली दुनिया भर में भड़कने वाले हिंसक विरोध-प्रदर्शनों और जनांदोलनों के पीछे काम कर रहे एक अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट का सनसनीखेज पर्दाफाश हुआ है. फॉक्स न्यूज डिजिटल की एक विस्तृत खोजी रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 13 देशों के 101 संगठन मिलकर एक सुनियोजित ‘ग्लोबल प्रोटेस्ट इकोसिस्टम’ चला रहे हैं. इस खुलासे के…

13 देशों के 101 संगठनों पर बड़ा दावा, फ्रांस से भारत तक प्रदर्शनों के नेटवर्क की चर्चा

नई दिल्ली
दुनिया भर में भड़कने वाले हिंसक विरोध-प्रदर्शनों और जनांदोलनों के पीछे काम कर रहे एक अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट का सनसनीखेज पर्दाफाश हुआ है. फॉक्स न्यूज डिजिटल की एक विस्तृत खोजी रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 13 देशों के 101 संगठन मिलकर एक सुनियोजित ‘ग्लोबल प्रोटेस्ट इकोसिस्टम’ चला रहे हैं. इस खुलासे के मुताबिक फ्रांस की सड़कों पर मचे बवाल से लेकर भारत और अन्य मुल्कों में युवाओं के नेतृत्व में होने वाले बड़े आंदोलनों के तार आपस में सीधे जुड़े हुए हैं. यह नेटवर्क स्थानीय मुद्दों और जनआक्रोश को हवा देकर सीमाओं के पार अराजकता फैलाने और उसका दायरा बढ़ाने का काम कर रहा है। 

कम्युनिस्ट गुटों से मीडिया तक फैला जाल
फॉक्स न्यूज की खोजी पत्रकार असरा क्यू नोमानी की इस पड़ताल में उस अदृश्य तंत्र की परतें खोली गई हैं, जो पर्दे के पीछे से वैश्विक अशांति की स्क्रिप्ट तैयार करता है. इस सिंडिकेट में वामपंथी और समाजवादी संगठन, ट्रेड यूनियनें, छात्र गुट, एडवोकेसी नेटवर्क और कुछ मीडिया संस्थान सक्रिय रूप से शामिल हैं. यह नेटवर्क अलग-अलग देशों के स्थानीय असंतोष को एक मंच पर लाकर उसे अंतरराष्ट्रीय रंग देने की रणनीति अपनाता है. रिपोर्ट के अनुसार, एक देश में शुरू होने वाले विरोध-प्रदर्शन के संदेशों, नारों और एजेंडे को दूसरे देशों में तेजी से वायरल और संगठित करने में ये संगठन अहम भूमिका निभाते हैं। 

सीमाओं के पार ‘टूलकिट’ की तरह काम कर रहा तंत्र
जांच में यह भी रेखांकित किया गया है कि अलग-अलग देशों की समस्याएं भले ही भिन्न हों, लेकिन उनके विरोध का तरीका, नैरेटिव और टाइमिंग बिल्कुल एक जैसी नजर आती है. यह पूरा ढांचा किसी सीमा में बंधा नहीं है, बल्कि एक अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क की तरह काम करता है जो दुनिया भर में सरकारों के खिलाफ असंतोष भड़काने और विरोध को खाद-पानी देने के लिए तालमेल बिठाता है. वैश्विक सुरक्षा और आंतरिक शांति के लिहाज से इस रिपोर्ट ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में नई बहस छेड़ दी है। 

‘ग्लोबल ‘केओस इंक’ (Chaos Inc) बढ़कर 101 समूहों का हो गया है और ये नए सिरे से प्रदर्शन करने की योजना बना रहे हैं.’ यह रिपोर्ट फॉक्स न्यूज़ की एक पुरानी जांच पर आधारित है, जिसमें फ्रांस के छात्र विरोध-प्रदर्शनों से जुड़े 50 संगठनों की पहचान की गई थी. 19 अक्टूबर तक यह संख्या बढ़कर 54 हो गई थी, और अब ताज़ा जांच में यह आंकड़ा 101 तक पहुंच गया है। 

भारत और फ्रांस कैसे जुड़े हैं?
फॉक्स न्यूज़ की जांच में ‘इंडियन अलायंस पेरिस’ (IAP) का ज़िक्र है. यह फ्रांस में स्थित छात्रों, शोधकर्ताओं और पेशेवरों का एक संगठन है, जो फ्रांस और भारत के विरोध-प्रदर्शनों के संदेशों को आपस में जोड़ने का काम कर रहा है. रिपोर्ट के अनुसार, इस संगठन ने फ्रांस में हो रहे प्रदर्शनों को बढ़ावा दिया है और इनकी तुलना भारत में युवाओं द्वारा किए जा रहे विरोध-प्रदर्शनों से की है. फॉक्स न्यूज़ द्वारा उद्धृत एक सोशल मीडिया पोस्ट में, इस संगठन ने दोनों देशों के युवा प्रदर्शनकारियों का समर्थन करते हुए लिखा: “जेन ज़ी (Gen Z) के लिए: फ्रांस में. भारत में. आज के लिए बहुत बढ़िया (Bravo) । 

रिपोर्ट में ‘प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल’ की भूमिका पर भी प्रकाश डाला गया है. यह एक अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक संगठन है, जिसने 16 अक्टूबर की एक ब्रीफिंग में फ्रांस, स्पेन, भारत और अल्बानिया में हो रहे विरोध-प्रदर्शनों को एक मंच पर लाने का काम किया. रिपोर्ट में यह सवाल उठाया गया है कि क्या ये उभरते हुए विद्रोह एक संगठित राजनीतिक शक्ति का रूप ले सकते हैं, ताकि उन हालात को बदला जा सके जिनकी वजह से ये विद्रोह पैदा हुए हैं. भारत में हो रहे विरोध-प्रदर्शनों में चुनाव आयोग के खिलाफ भी प्रदर्शन शामिल हैं, जहां प्रदर्शनकारी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। 

नेविल रॉय सिंघम कनेक्शन
फॉक्स न्यूज़ की जांच का एक बड़ा हिस्सा उन संगठनों पर केंद्रित है, जिनका संबंध नेविल रॉय सिंघम से बताया गया है. अमेरिका में जन्मे टेक्नोलॉजी उद्यमी सिंघम शंघाई में रहते हैं और उनका नाता कम्युनिस्ट और समाजवादी समूहों के एक नेटवर्क से जोड़ा जाता है. जिन संगठनों का जिक्र किया गया है, उनमें ‘ब्रेकथ्रू न्यूज़’, ‘कोडपिंक’ और ‘पार्टी फॉर सोशलिज्म एंड लिबरेशन’ शामिल हैं. फॉक्स न्यूज़ का आरोप है कि इन समूहों ने रिपोर्टिंग, सोशल मीडिया अभियानों और राजनीतिक संदेशों के जरिए विरोध प्रदर्शनों को और व्यापक बनाने में मदद की है.खास तौर पर ‘ब्रेकथ्रू न्यूज़’ ने फ्रांस और भारत में हुए विरोध प्रदर्शनों को कवर किया है, और इन्हें सरकारी नीतियों और मितव्ययिता (Austerity) के खिलाफ चल रहे एक बड़े अंतरराष्ट्रीय आंदोलन के हिस्से के रूप में पेश किया है। 

इस जांच में ‘ट्राइकॉन्टिनेंटल’ नामक एक रिसर्च इंस्टीट्यूट का भी जिक्र है, जिसका नेतृत्व विजय प्रशांत करते हैं. साथ ही, व्यापक एक्टिविस्ट नेटवर्क के साथ इसके संबंधों की ओर भी इशारा किया गया है. विजय प्रशांत ने 18 अक्टूबर को ‘X’ (ट्विटर) पर एक पोस्ट में पेरिस, नई दिल्ली और ब्यूनस आयर्स में हो रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच समानताएं बताईं. उन्होंने लिखा: “पेरिस-नई दिल्ली-ब्यूनस आयर्स” और आगे जोड़ा, “गुस्से को अपना समय लेने दें, क्योंकि गुस्सा एक ताकत बन सकता है। 

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