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दीपावली पर बस्तर के परचनपाल की हस्तकला का जलवा

रायपुर  शोभा बघेल के सीसल शिल्प से रोशन हो रहे सैकड़ों घर, बढ़ी स्थानीय उत्पादों की मांग आगामी दीपावली और अन्य प्रमुख त्योहारों की आहट के साथ ही बाजारों में स्थानीय कला और पर्यावरण-अनुकूल (इको-फ्रेंडली) हस्तनिर्मित उत्पादों की रौनक देखते ही बन रही है। इस त्योहारी माहौल में बस्तर जिले के बस्तर के परचनपाल गांव…

दीपावली पर बस्तर के परचनपाल की हस्तकला का जलवा

रायपुर

 शोभा बघेल के सीसल शिल्प से रोशन हो रहे सैकड़ों घर, बढ़ी स्थानीय उत्पादों की मांग

आगामी दीपावली और अन्य प्रमुख त्योहारों की आहट के साथ ही बाजारों में स्थानीय कला और पर्यावरण-अनुकूल (इको-फ्रेंडली) हस्तनिर्मित उत्पादों की रौनक देखते ही बन रही है। इस त्योहारी माहौल में बस्तर जिले के बस्तर के परचनपाल गांव की ख्यातिप्राप्त हस्तशिल्प कलाकार  शोभा बघेल द्वारा सीसल के प्राकृतिक रेशों से तैयार किए गए कलात्मक बैग और आकर्षक सजावटी उत्पाद आमजन की पहली पसंद बनकर उभरे हैं। घरों की साज-सज्जा और उपहारों के आदान-प्रदान के लिए इन कलाकृतियों की बढ़ती मांग ने त्योहारों के उत्साह को और बढ़ा दिया है।

वोकल फॉर लोकल की भावुक अपील- उत्सवों में लाएं स्थानीय कारीगरों की खुशहाली

त्योहारी सीजन में अपने उत्पादों की बढ़ती मांग के बीच शिल्पकार शोभा बघेल ने नागरिकों से स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता देने की भावुक अपील की है। उनका कहना है कि पर्व-त्योहारों पर बाजार के सामान्य सामानों के बजाय यदि लोग हमारे स्थानीय कारीगरों के हस्तशिल्प को अपनाएं, तो उत्सवों की खुशियां और अधिक दोगुनी हो जाती हैं। इससे न केवल हमारी पारंपरिक कला को सम्मान मिलता है, बल्कि दिन-रात पसीना बहाकर इन अनुपम कृतियों को तराशने वाले स्थानीय शिल्पकारों के परिवारों के जीवन में भी वास्तविक आर्थिक समृद्धि का उजाला फैलता है।

संघर्ष से सफलता तक- 2004 के प्रशिक्षण से शुरू हुआ सफर

 शोभा बघेल की यह सफलता उनकी अटूट इच्छाशक्ति, अथक परिश्रम और पारंपरिक हुनर के अनूठे संगम की जीवंत मिसाल है। उनके इस प्रेरणादायी सफर की शुरुआत वर्ष 2004 में हुई थी, जब उन्होंने हस्तशिल्प विकास बोर्ड से सीसल के रेशों से हस्तशिल्प तैयार करने का विशेष प्रशिक्षण हासिल किया था।

प्रशिक्षण के बाद उन्होंने सीसल के मजबूत और प्राकृतिक रेशों को बारीक गूंथकर बैग, दीवार सज्जा, टेबल मैट और उपहार योग्य करीब 40 से 50 प्रकार की बेहद आकर्षक व टिकाऊ कलाकृतियां बनाना शुरू किया। समय के साथ उनकी इस अनूठी कला को व्यापक पहचान मिली। आज उनके उत्पादों की मांग चित्रकोट, शबरी एम्पोरियम, राज्योत्सव और सरस मेलों जैसे प्रतिष्ठित मंचों पर बड़े पैमाने पर है। बड़ी संख्या में लोग सीधे उनके घर पहुंचकर भी खरीदारी करना पसंद कर रहे हैं, जिससे उन्हें प्रतिमाह 15 हजार से 20 हजार रुपये तक की नियमित और सम्मानजनक आय हो रही है।

एक हजार से अधिक ग्रामीण महिलाओं को बनाया आत्मनिर्भर

अपनी पारिवारिक आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाने के साथ-साथ शोभा बघेल ने समाज के प्रति अपने दायित्व को भी पूरी निष्ठा से निभाया है। उन्होंने अपने हुनर को अपने तक सीमित रखने के बजाय ग्रामीण अंचल की एक हजार से अधिक महिलाओं को प्रशिक्षित कर उन्हें स्वरोजगार से जोड़ा है और स्वावलंबन का एक नया मार्ग प्रशस्त किया है।

त्योहारों के इस पावन अवसर पर पर्यावरण-अनुकूल सीसल उत्पादों की यह गूंज प्रधानमंत्री के वोकल फॉर लोकल के संकल्प को तो सशक्त कर ही रही है, साथ ही महिला सशक्तीकरण और जमीनी स्तर पर आत्मनिर्भरता की एक अनूठी और प्रेरणादायी मिसाल भी पेश कर रही है।

वोकल फॉर लोकल की भावुक अपील- उत्सवों में लाएं स्थानीय कारीगरों की खुशहाली

त्योहारी सीजन में अपने उत्पादों की बढ़ती मांग के बीच शिल्पकार शोभा बघेल ने नागरिकों से स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता देने की भावुक अपील की है। उनका कहना है कि पर्व-त्योहारों पर बाजार के सामान्य सामानों के बजाय यदि लोग हमारे स्थानीय कारीगरों के हस्तशिल्प को अपनाएं, तो उत्सवों की खुशियां और अधिक दोगुनी हो जाती हैं। इससे न केवल हमारी पारंपरिक कला को सम्मान मिलता है, बल्कि दिन-रात पसीना बहाकर इन अनुपम कृतियों को तराशने वाले स्थानीय शिल्पकारों के परिवारों के जीवन में भी वास्तविक आर्थिक समृद्धि का उजाला फैलता है।

संघर्ष से सफलता तक- 2004 के प्रशिक्षण से शुरू हुआ सफर

 शोभा बघेल की यह सफलता उनकी अटूट इच्छाशक्ति, अथक परिश्रम और पारंपरिक हुनर के अनूठे संगम की जीवंत मिसाल है। उनके इस प्रेरणादायी सफर की शुरुआत वर्ष 2004 में हुई थी, जब उन्होंने हस्तशिल्प विकास बोर्ड से सीसल के रेशों से हस्तशिल्प तैयार करने का विशेष प्रशिक्षण हासिल किया था।

प्रशिक्षण के बाद उन्होंने सीसल के मजबूत और प्राकृतिक रेशों को बारीक गूंथकर बैग, दीवार सज्जा, टेबल मैट और उपहार योग्य करीब 40 से 50 प्रकार की बेहद आकर्षक व टिकाऊ कलाकृतियां बनाना शुरू किया। समय के साथ उनकी इस अनूठी कला को व्यापक पहचान मिली। आज उनके उत्पादों की मांग चित्रकोट, शबरी एम्पोरियम, राज्योत्सव और सरस मेलों जैसे प्रतिष्ठित मंचों पर बड़े पैमाने पर है। बड़ी संख्या में लोग सीधे उनके घर पहुंचकर भी खरीदारी करना पसंद कर रहे हैं, जिससे उन्हें प्रतिमाह 15 हजार से 20 हजार रुपये तक की नियमित और सम्मानजनक आय हो रही है।

एक हजार से अधिक ग्रामीण महिलाओं को बनाया आत्मनिर्भर

अपनी पारिवारिक आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाने के साथ-साथ शोभा बघेल ने समाज के प्रति अपने दायित्व को भी पूरी निष्ठा से निभाया है। उन्होंने अपने हुनर को अपने तक सीमित रखने के बजाय ग्रामीण अंचल की एक हजार से अधिक महिलाओं को प्रशिक्षित कर उन्हें स्वरोजगार से जोड़ा है और स्वावलंबन का एक नया मार्ग प्रशस्त किया है।

प्रधानमंत्री के वोकल फॉर लोकल के संकल्प को तो सशक्त कर ही रही है, साथ ही महिला सशक्तीकरण और जमीनी स्तर पर आत्मनिर्भरता की एक अनूठी और प्रेरणादायी मिसाल भी पेश कर रही है।

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