कांटों का ताज पहनेंगे डीके शिवकुमार? अगले 24 महीने तय करेंगे कांग्रेस का भविष्य

बेंगलुरु कर्नाटक की राजनीति में सत्ता परिवर्तन सिर्फ चेहरा बदलने की कहानी नहीं है, यह कांग्रेस के भविष्य की सबसे बड़ी परीक्षा बन चुकी है. सिद्धारमैया के इस्तीफे के बाद डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री की कुर्सी मिलने जा रही है. लेकिन यह ताज फूलों का नहीं बल्कि कांटों का माना जा रहा है. कांग्रेस हाईकमान…

कांटों का ताज पहनेंगे डीके शिवकुमार? अगले 24 महीने तय करेंगे कांग्रेस का भविष्य

बेंगलुरु

कर्नाटक की राजनीति में सत्ता परिवर्तन सिर्फ चेहरा बदलने की कहानी नहीं है, यह कांग्रेस के भविष्य की सबसे बड़ी परीक्षा बन चुकी है. सिद्धारमैया के इस्तीफे के बाद डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री की कुर्सी मिलने जा रही है. लेकिन यह ताज फूलों का नहीं बल्कि कांटों का माना जा रहा है. कांग्रेस हाईकमान ने यह फैसला ऐसे वक्त में लिया है, जब पार्टी दक्षिण भारत में अपनी सबसे मजबूत सरकार को किसी भी कीमत पर बचाए रखना चाहती है. राहुल गांधी की रणनीति साफ है. कर्नाटक को 2028 चुनाव तक कांग्रेस का मॉडल राज्य बनाना है. लेकिन मुश्किल यह है कि पिछले चार दशक में यहां कोई भी सत्ताधारी दल लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी नहीं कर पाया है. ऐसे में शिवकुमार के सामने सिर्फ सरकार चलाने की चुनौती नहीं होगी, बल्कि उन्हें इतिहास बदलने की जिम्मेदारी भी निभानी होगी. यही वजह है कि दिल्ली से लेकर बेंगलुरु तक इस बदलाव को कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक दांव माना जा रहा है। 

डीके शिवकुमार को संगठन का मजबूत खिलाड़ी माना जाता है. संकट के समय विधायकों को संभालने से लेकर पार्टी को टूटने से बचाने तक उन्होंने कई बार अपनी उपयोगिता साबित की है. लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद समीकरण पूरी तरह बदल जाएंगे. अब उन्हें विपक्ष के साथ-साथ अपनी ही पार्टी के भीतर असंतोष को भी साधना होगा. सिद्धारमैया भले ही कुर्सी छोड़ चुके हों, लेकिन उन्होंने राज्यसभा जाने से इनकार कर यह संकेत दे दिया है कि वह अभी भी कर्नाटक की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाएंगे. इसका मतलब साफ है कि शिवकुमार को हर फैसले में राजनीतिक संतुलन बनाकर चलना होगा. कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चिंता यह भी है कि अगर जातीय समीकरण बिगड़े तो भाजपा और जेडीएस इसका बड़ा फायदा उठा सकते हैं। 

40 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़ने की चुनौती
    कर्नाटक में पिछले 40 सालों से कोई भी सरकार लगातार दूसरी बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में नहीं लौटी है. कांग्रेस चाहती है कि डीके शिवकुमार इस मिथक को तोड़ें. पार्टी का मानना है कि उनकी आक्रामक शैली और संगठन पर पकड़ आगामी चुनावों में फायदा दिला सकती है. लेकिन यह राह आसान नहीं होगी, क्योंकि सत्ता विरोधी लहर को रोकना सबसे मुश्किल काम माना जाता है। 

    सिद्धारमैया के हटने से कुरुबा समुदाय में नाराजगी की संभावना जताई जा रही है. कांग्रेस इसे संतुलित करने के लिए उनके बेटे यतींद्र को बड़ी जिम्मेदारी दे सकती है. दूसरी ओर, वोक्कालिगा समुदाय में डीके शिवकुमार की मजबूत पकड़ पार्टी के लिए बड़ा राजनीतिक लाभ बन सकती है. कांग्रेस को उम्मीद है कि जेडीएस का पारंपरिक वोट बैंक धीरे-धीरे उसकी तरफ शिफ्ट होगा। 

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शिवकुमार की सबसे बड़ी ताकत उनकी ‘फाइटर’ वाली छवि है. वह जमीनी नेता माने जाते हैं और गांधी परिवार के बेहद करीबी भी हैं. यही कारण है कि राहुल गांधी उन्हें भविष्य के बड़े चेहरे के रूप में देख रहे हैं. हालांकि भाजपा पहले ही कांग्रेस के भीतर संभावित खींचतान को मुद्दा बनाना शुरू कर चुकी है। 

सिद्धारमैया की मौजूदगी बनेगी दबाव?
सिद्धारमैया का दिल्ली राजनीति से दूरी बनाना कई संकेत देता है. वह बेंगलुरु में रहकर अपनी राजनीतिक पकड़ कमजोर नहीं होने देना चाहते. इससे डीके शिवकुमार पर लगातार दबाव बना रहेगा. कांग्रेस नेतृत्व भले इसे सहज परिवर्तन बता रहा हो, लेकिन अंदरखाने दोनों खेमों के बीच संतुलन बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती होगी। 

डीके शिवकुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या होगी?
डीके शिवकुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती 2028 विधानसभा चुनाव से पहले एंटी-इंकंबेंसी को नियंत्रित करना होगी. कर्नाटक में पिछले चार दशक से कोई भी सरकार दोबारा सत्ता में नहीं लौटी है. ऐसे में उन्हें विकास, संगठन और जातीय संतुलन तीनों मोर्चों पर सफल होना पड़ेगा. अगर सरकार के खिलाफ माहौल बनता है तो इसका सीधा असर कांग्रेस के राष्ट्रीय अभियान पर भी पड़ेगा। 

सिद्धारमैया का सक्रिय रहना कांग्रेस के लिए फायदा है या नुकसान?
यह दोनों तरह से असर डाल सकता है. सिद्धारमैया का अनुभव और AHINDA वोट बैंक कांग्रेस के लिए बड़ी ताकत है. लेकिन अगर उनके समर्थकों में असंतोष बढ़ता है तो डीके शिवकुमार के लिए फैसले लेना मुश्किल हो सकता है. इसलिए हाईकमान को दोनों नेताओं के बीच संतुलन बनाकर रखना होगा। 

राहुल गांधी के लिए कर्नाटक इतना अहम क्यों है?
कर्नाटक इस समय दक्षिण भारत में कांग्रेस का सबसे मजबूत गढ़ है. पार्टी इसे 2029 लोकसभा चुनाव से पहले ‘गवर्नेंस मॉडल’ के तौर पर पेश करना चाहती है. अगर कांग्रेस यहां दोबारा सत्ता में लौटती है तो राहुल गांधी की राजनीतिक रणनीति को बड़ी मजबूती मिलेगी. इसलिए मुख्यमंत्री परिवर्तन को भविष्य की बड़ी चुनावी तैयारी के तौर पर देखा जा रहा है। 

वोक्कालिगा समीकरण से कांग्रेस को उम्मीद
डीके शिवकुमार वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं. कांग्रेस को भरोसा है कि इससे जेडीएस का प्रभाव कमजोर होगा. दक्षिण कर्नाटक की कई सीटों पर इसका सीधा असर पड़ सकता है. यही वजह है कि पार्टी इस बदलाव को सिर्फ नेतृत्व परिवर्तन नहीं बल्कि सामाजिक समीकरणों के पुनर्गठन के रूप में भी देख रही है 

भाजपा की नजर कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान पर
भाजपा पहले ही कांग्रेस के भीतर संभावित गुटबाजी को मुद्दा बनाने की तैयारी में है. पार्टी का मानना है कि सत्ता परिवर्तन के बाद असंतोष बढ़ सकता है. अगर कांग्रेस अंदरूनी संतुलन नहीं संभाल पाई तो भाजपा इसे अगले चुनाव में बड़ा हथियार बना सकती है। 

 

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