नई दिल्ली
भारत ने पनडुब्बी क्षमता में अपने पड़ोसी देशों को मात देने के लिए लगातार ठोस कदम उठा रहा है। इसी क्रम में भारतीय नौसेना ने जर्मनी के साथ एक डील को लेकर अच्छी खबर दी है। भारतीय नौसेना के मुताबिक भारत और जर्मर्नी के बीच 6 नए कन्वेंशनल सबमरीन के निर्माण के लिए अब कुछ ही महीनों में कॉन्ट्रैक्ट की सारी प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी। इस दौरान टेक्नोलॉजी का भी ट्रांसफर किया जाएगा। इस डील के फाइनल होने से चीन और पाकिस्तान जैसे देशों पर निगरानी रखने में मदद मिलेगी।
पूर्व नौसेना प्रमुख के मुताबिक भारत के मजगांव डॉक और जर्मनी की थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स के बीच अनुबंध को पूरा होने में बस कुछ और महीने ही लगेंगे। पहली पनडुब्बी के 2033 में शामिल होने की उम्मीद है, जिसके बाद 2038 तक हर साल एक पनडुब्बी शामिल की जाएगी। इस मामले पर अब पूर्व नौसेना प्रमुख रहे एडमिरल दिनेश कुमार त्रिपाठी ने बयान दिया है। उन्होंने इस डील की पूरी कहानी बताई है।
सबसे पहले इस पनडुब्बी की खासियत
इन पनडुब्बियों की सबसे बड़ी खासियत इनकी AIP तकनीक है, जिसके कारण इन्हें बैटरी चार्ज करने के लिए बार-बार पानी की सतह पर नहीं आना पड़ेगा।
ये पनडुब्बी 2 से 3 सप्ताह तक लगातार पानी के भीतर छिपी रह सकती हैं।
इन्हें आधुनिक टॉरपीडो और भारी मारक क्षमता वाली मिसाइलों (जैसे ब्रह्मोस-एनजी) से लैस किया जाएगा।
ये खामोश और अत्याधुनिक पनडुब्बियां हिंद महासागर में चीन और पाकिस्तान की समुद्री चुनौतियों का मुकाबला करने में भारतीय नौसेना को एक बड़ी रणनीतिक बढ़त देंगी।
होर्मुज जैसे संकट के लिए तैयार रहना जरूरी: नौसेना प्रमुख
पूर्व नौसेना प्रमुख दिनेश कुमार त्रिपाठी ने टाइम्स ऑफ इंडिया को इंटरव्यू देते हुए कहा कि भारत की आर्थिक वृद्धि और ऊर्जा सुरक्षा समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा और संरक्षा से घनिष्ठ रूप से जुड़ी हुई है।
नौसेना की तात्कालिक प्राथमिकता होर्मुज जलडमरूमध्य और व्यापक अरब सागर में उपस्थिति, निगरानी और आवश्यकता पड़ने पर सुरक्षा प्रदान करके सुरक्षित आवागमन सुनिश्चित करना रही है।
इन समुद्री व्यापार मार्गों को सुरक्षित करने की हमारी दीर्घकालिक योजना किसी एक निश्चित समाधान पर निर्भर रहने के बजाय समुद्री क्षेत्र की जागरूकता, परिचालन क्षमता और साझेदारी को मजबूत करना है।
हम महत्वपूर्ण जहाजरानी मार्गों पर निरंतर उपस्थिति बनाए रखते हैं, जैसे कि 2008 से समुद्री डाकुओं से बचाव के लिए अदन की खाड़ी में एक जहाज की निरंतर तैनाती।
हमारे सूचना संलयन केंद्र-हिंद महासागर क्षेत्र (आईएफसी-आईओआर) ने परिचालन प्रतिक्रियाओं के समन्वय के लिए सहयोगी देशों के साथ संबंध स्थापित किए हैं।
नौसेना प्रमुख बोले- हमारा लक्ष्य भारत के समुद्री हितों की पूर्ण सुरक्षा करना
पूर्व नौसेना प्रमुख ने कहा कि भारतीय नौसेना के प्रयास किसी विशिष्ट राष्ट्र को लक्षित नहीं करते, न ही हम अपने उद्देश्यों को केवल क्षेत्र पर "वर्चस्व" स्थापित करने तक सीमित रखते हैं। हमारा सर्वोपरि लक्ष्य भारत के समुद्री हितों की पूर्ण सुरक्षा सुनिश्चित करना और एक स्थिर, स्वतंत्र, खुले और समावेशी हिंद-प्रशांत क्षेत्र में योगदान देना है। हम कई रणनीतिक कदमों पर ध्यान केंद्रित करते हैं – पहला, हम अपनी सैन्य शक्ति बढ़ा रहे हैं और 2035 तक 200 से अधिक जहाजों वाली नौसेना बनने की दिशा में दृढ़ता से अग्रसर हैं।
दूसरा, हमने मिशन-आधारित तैनाती और समुद्री क्षेत्र की जागरूकता के माध्यम से निरंतर परिचालन पहुंच बनाए रखी है, महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों और हिंद महासागर क्षेत्र में अपने जहाजों और विमानों की लगभग निरंतर उपस्थिति सुनिश्चित की है; और अंत में, भारत ने महासागर की परिकल्पना के तहत क्षेत्रीय समुद्री सहयोग को काफी मजबूत किया है।
















