मुंबई
ईरान जंग की शुरुआत के साथ ही पूरी दुनिया नई समस्या से रूबरू होने लगी. ईरान ने एनर्जी कॉरिडोर होर्मुज स्ट्रेट को बार्गेनिंग चिप की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया. इससे यूरोप से लेकर एशिया तक में एनर्जी क्राइसिस का दौर शुरू हो गया. प्रभावित देशों को अपने ऊर्जा स्रोतों के बारे में सोचने के लिए मजबूर कर दिया. भारत भी पश्चिम एशिया संकट से अछूता नहीं है. ऐसे में देश में किसी तरह का ऊर्जा संकट न आए, इसको लेकर कई तरह के कदम उठाए गए हैं. पूर्व में लिए गए फैसलों का असर अब दिखने लगा है. सौर ऊर्जा के बाद अब भारत ने पवन ऊर्जा यानी विंड एनर्जी के क्षेत्र में नया इतिहास रचा है. अक्षय ऊर्जा से जुड़ी परियोजनाओं पर यदि इसी तरह गंभीरता से काम किया जाता रहा तो LPG और तेल के बिना भी भारत विकास की पटरी पर सरपट भागता रहेगा।
ईरान जंग के चलते दुनियाभर में एनर्जी क्राइसिस गहरा गई है. भारत भी इससे अछूता नहीं है. खाड़ी देश से आने वाले तेल और गैस पर निर्भरता को कम करने की कोशिशें भी तेज हो गई हैं. भारत भी इसमें पीछे नहीं है. भारत पिछले कुछ सालों में रिन्यूवेबल यानी अक्षय ऊर्जा पर मिशन मोड में काम रहा है. उसका परिणाम सामने आने लगा है. पिछले दिनों सौर ऊर्जा के जरिये रिकॉर्ड एनर्जी प्रोडक्शन किया गया था. भारत ने सोलर एनर्जी के जरिये 45 गीगावाट बिजली पैदा किया था. अब भारत ने पवन ऊर्जा के सेक्टर में जबरदस्त सफलता हासिल की है. यह उपलब्धि ऐसे समय में सामने आई है, जब दुनिया के तमाम देश ईरान युद्ध और होर्मुज सट्रेट संकट से दो-चार हो रही है. तेल और गैस की सप्लाई बुरी तरह से प्रभावित हुई है. ऐसे में भारत की यह उपलब्धि दिल को सुकून देने वाला है।
भारत ने स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में एक नया कीर्तिमान स्थापित करते हुए वर्ष 2025-26 के दौरान पवन ऊर्जा क्षमता में 6.1 गीगावाट (GW) की रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज की है. केंद्रीय नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रह्लाद जोशी ने इसकी जानकारी देते हुए कहा कि यह अब तक की सबसे बड़ी सालाना बढ़ोतरी है, जो देश की ऊर्जा सुरक्षा और ग्रीन एनर्जी फ्यूचर की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. विंड इंडिपेंडेंट पावर प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन (WIPPA) के स्थापना दिवस कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रह्लाद जोशी ने बताया कि भारत इस समय वैश्विक स्तर पर पवन ऊर्जा क्षमता के मामले में चौथे स्थान पर है. देश में वर्तमान में 56.1 गीगावाट से अधिक स्थापित पवन ऊर्जा क्षमता है, जबकि करीब 28 गीगावाट की परियोजनाएं विभिन्न चरणों में कार्यान्वयन के अधीन हैं।
केंद्रीय मंत्री ने इस क्षेत्र में मौजूद अपार संभावनाओं पर जोर देते हुए कहा कि 150 मीटर हब ऊंचाई पर भारत की पवन ऊर्जा क्षमता लगभग 1,164 गीगावाट आंकी गई है, जो देश को ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने में बड़ी भूमिका निभा सकती है. उन्होंने विश्वास जताया कि मौजूदा प्रयासों की गति बरकरार रही तो भारत 2030 तक 100 गीगावाट और 2036 तक 156 गीगावाट पवन ऊर्जा क्षमता हासिल कर सकता है. यह लक्ष्य वर्ष 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन के राष्ट्रीय संकल्प को पूरा करने में भी अहम योगदान देगा।
पवन ऊर्जा भारत के एनर्जी सिस्टम को स्थिर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. प्रह्लाद जोशी ने कहा कि पवन ऊर्जा का उत्पादन मुख्य रूप से शाम और रात के समय अधिक होता है, जो बिजली की अधिक मांग वाले समय के साथ मेल खाता है. आंकड़ों के अनुसार, लगभग 45 प्रतिशत पवन ऊर्जा उत्पादन पीक डिमांड के समय होता है, जिससे यह सौर ऊर्जा का एक मजबूत पूरक बन जाती है. नीतिगत सुधारों का उल्लेख करते हुए मंत्री ने बताया कि केंद्र सरकार ने नवीकरणीय खरीद दायित्व (Renewable Purchase Obligations) के तहत पवन ऊर्जा के लिए एक विशेष घटक जोड़ा है, जिससे इस क्षेत्र में निरंतर मांग सुनिश्चित हो सके. इसके अलावा लेट पेमेंट सरचार्ज नियमों का सख्ती से पालन, पारदर्शी बोली प्रक्रिया और अप्रूव्ड लिस्ट ऑफ मॉडल्स एंड मैन्युफैक्चरर्स (ALMM) जैसी व्यवस्थाओं ने निवेशकों का भरोसा बढ़ाया है और घरेलू निर्माण को बढ़ावा दिया है।
भारत ने पवन ऊर्जा के क्षेत्र में मजबूत घरेलू विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र भी विकसित किया है. देश की सालाना उत्पादन क्षमता 24 गीगावाट से अधिक है, जबकि स्वदेशीकरण का स्तर 70 से 80 प्रतिशत तक पहुंच चुका है. ब्लेड, टावर, गियरबॉक्स और अन्य महत्वपूर्ण उपकरणों के निर्माण में भारत ने मजबूत सप्लाई चेन तैयार की है, जो इसे वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बनाती है।
उद्योग से जुड़ी चुनौतियों पर बात करते हुए प्रह्लाद जोशी ने कहा कि सरकार अतिरिक्त पवन ऊर्जा टेंडर जारी करने पर विचार कर रही है. साथ ही हाइब्रिड और राउंड-द-क्लॉक (RTC) परियोजनाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे ग्रिड की दक्षता और विश्वसनीयता में सुधार होगा. डिविएशन सेटलमेंट मैकेनिज्म (DSM) जुर्माने, पावर कर्टेलमेंट और ट्रांसमिशन में देरी जैसे मुद्दों पर भी सरकार गंभीरता से काम कर रही है और इनके व्यावहारिक समाधान तलाशे जा रहे हैं।
हाल ही में शुरू किए गए 500 मेगावाट के ‘कॉन्ट्रैक्ट्स फॉर डिफरेंस’ (CfD) मॉडल पायलट को बाजार में स्थिरता और राजस्व सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल बताया गया. जोशी ने कहा कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत के पास पवन ऊर्जा क्षेत्र में एक भरोसेमंद विनिर्माण और आपूर्ति साझेदार के रूप में उभरने का सुनहरा अवसर है, खासकर ऐसे समय में जब कई देश अपनी सप्लाई चेन में विविधता लाने की कोशिश कर रहे हैं।
अंत में प्रह्लाद जोशी ने जोर दिया कि आने वाले दशक में 156 गीगावाट के महत्वाकांक्षी लक्ष्य को हासिल करना पूरी तरह संभव है, बशर्ते स्पष्ट नीतिगत दिशा, मजबूत संस्थागत सहयोग और उद्योग की सक्रिय भागीदारी बनी रहे. उन्होंने पवन, सौर और ऊर्जा भंडारण को मिलाकर एकीकृत हाइब्रिड प्रणालियों पर अधिक ध्यान देने की अपील की, ताकि देश को एक विश्वसनीय, टिकाऊ और हरित ऊर्जा भविष्य की ओर अग्रसर किया जा सके।
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मुंबई ईरान जंग की शुरुआत के साथ ही पूरी दुनिया नई समस्या से रूबरू होने लगी. ईरान ने एनर्जी कॉरिडोर होर्मुज स्ट्रेट को बार्गेनिंग चिप की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया. इससे यूरोप से लेकर एशिया तक में एनर्जी क्राइसिस का दौर शुरू हो गया. प्रभावित देशों को अपने ऊर्जा स्रोतों के बारे में…

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