मुंबई
यूनाइटेड अरब अमीरात (UAE) के फैसले से दुनिया भर में तेल की कीमतों में तेजी देखने को मिल रही है. ब्रेंट क्रूड करीब 2.8% बढ़कर 111 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया, जबकि WTI भी लगभग 100 डॉलर के आसपास है. इसी बीच UAE ने 1 मई से OPEC और OPEC+ छोड़ने का बड़ा फैसला लिया है.इससे पूरी दुनिया के तेल बाजार, कीमतों और सप्लाई सिस्टम पर असर पड़ सकता है।
OPEC और OPEC+ क्या है?
ओपेक यानी ऑर्गनाइजेशन ऑफ पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज (OPEC) एक ऐसा ग्रुप है जिसमें बड़े तेल उत्पादक देश शामिल हैं. इसमें सऊदी अरब, इराक, ईरान, कुवैत जैसे देश शामिल हैं और हाल तक यूएई भी इसका हिस्सा था.इसका मुख्य काम तेल उत्पादन को कंट्रोल करके कीमतों को मैनेज करना है।
OPEC कैसे काम करता है?
ओपेक तरराष्ट्रीय तेल बाजार में बैलेंस बनाए रखने की कोशिश करता है.जब वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें गिरने लगती हैं, तो ओपेक देश मिलकर तेल की सप्लाई (उत्पादन) में कटौती कर देते हैं, ताकि मांग के मुकाबले आपूर्ति कम होने से कीमतें फिर से स्थिर हो सकें.इसके विपरीत, जब तेल की कीमतें बहुत ज्यादा बढ़ जाती हैं और दुनिया भर में ऊर्जा संकट का खतरा मंडराने लगता है, तो ओपेक उत्पादन बढ़ाकर बाजार में तेल की उपलब्धता बढ़ा देता है.इससे सदस्य देशों की कमाई सुरक्षित बनी रहती है और और ग्लोबल मार्केट में कीमतों में ज्यादा उतार-चढ़ाव नहीं होता।
OPEC क्या है और क्यों इतना ताकतवर है?
ओपेक+ में ओपेक के साथ कुछ और देश भी जुड़े हैं, जैसे रूस.यह 2016 में तब बना जब तेल की कीमतें गिर गई थीं और ओपेक अकेले बाजार को संभाल नहीं पा रहा था.आज ओपेक+ दुनिया के करीब 40-50% तेल उत्पादन को कंट्रोल करता है।
ओपेक+ (OPEC+) की असली ताकत इस बात में छिपी है कि यह संगठन दुनिया के तेल सप्लाई के एक बहुत बड़े हिस्से को कंट्रोल करता है.जब भी ओपेक+ के सदस्य देश कोई फैसला लेते हैं, तो उसका असर तुरंत अंतरराष्ट्रीय बाजार पर दिखाई देता है और तेल की कीमतें पलक झपकते ही ऊपर-नीचे होने लगती हैं.चूंकि दुनिया की इकोनॉमी तेल पर टिकी है, इसलिए इनके फैसलों का सीधा असर हर देश की महंगाई, ट्रांसपोर्ट की लागत और पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है.यही वजह है कि ओपेक+ को इतना ताकतवर माना जाता है, क्योंकि यह पूरी दुनिया की जेब और बाजार की दिशा बदल सकती है।
यूएई ने ओपेक क्यों छोड़ा? जान लें वजह
इसके अलावा, यूएई को भविष्य की भी चिंता है क्योंकि रिन्यूएबल एनर्जी(Renewable Energy) के बढ़ते चलन के कारण आने वाले समय में तेल की मांग घट सकती है. ऐसे में यूएई की सोच यह है कि आज का तेल भविष्य की तुलना में ज्यादा कीमती हो सकता है, इसलिए वह अभी अपनी पूरी क्षमता का इस्तेमाल करके ज्यादा से ज्यादा कमाई करना चाहता है. ओपेक की पाबंदियों से बाहर निकलकर वह अपनी इकोनॉमी को और मजबूत करने और भविष्य के जोखिमों से निपटने की तैयारी कर रहा है।
घरेलू वायदा बाजार में गिरावट
जहां अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेजी दिखी, वहीं घरेलू स्तर पर मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज पर कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। क्रूड ऑयल करीब 0.88% यानी 84 रुपये गिरकर 9,401 रुपये पर कारोबार करता दिखा।
होरमुज जलडमरूमध्य बना चिंता का कारण
Strait of Hormuz को लेकर बनी अनिश्चितता भी कीमतों में तेजी की बड़ी वजह है। यह अहम समुद्री मार्ग वैश्विक तेल और LNG सप्लाई का लगभग 20% संभालता है, और यहां किसी भी तरह की बाधा का सीधा असर बाजार पर पड़ सकता है।
भारत पर पड़ सकता है असर
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें 110 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी रहती हैं, तो भारत जैसे आयात-निर्भर देशों के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण हो सकती है। इससे महंगाई और आर्थिक दबाव बढ़ने की आशंका है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक यूएई और सऊदी अरब के बीच लंबे समय से उत्पादन को लेकर मतभेद थे.इसके अलावा कोटा सिस्टम से यूएई संतुष्ट नहीं था.वह अपनी मार्केट शेयर बढ़ाना चाहता है।
यूएई के बाहर निकलने का असर क्या होगा?
यूएई के ओपेक से बाहर निकलने का असर काफी गहरा हो सकता है, जिससे सबसे पहले ओपेक की वैश्विक ताकत कमजोर पड़ सकती है.यूएई उन गिने-चुने देशों में शामिल था जिसके पास जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त तेल उत्पादन करने की बड़ी क्षमता थी, और उसके जाने से संगठन का दबदबा कम होना तय है.दूसरा बड़ा असर तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव के रूप में दिख सकता है. चूंकि अब सप्लाई को एक सुर में कंट्रोल करना मुश्किल होगा, इसलिए बाजार पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा वोलाटाइल हो सकता है. अंत में, इससे तेल बाजार पूरी तरह बिखर सकता है. जब हर देश संगठन की एकजुटता के बजाय अपने निजी फायदे और रणनीति के हिसाब से फैसले लेने लगेगा, तो इससे एकजुटता कम होगी और भविष्य में ग्लोबल मार्केट को संतुलित करना एक बड़ी चुनौती बन जाएगा।
क्यों बढ़ रही हैं तेल की कीमतें? क्या आगे भी जारी रहेगी तेजी
इस समय सबसे बड़ा कारण है स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का बंद होना, जहां से दुनिया का करीब 20% तेल गुजरता है.ईरान युद्ध के कारण सप्लाई बाधित है और निर्यात कम हो गया है.इसी वजह से कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं.अगर हालात सामान्य होते हैं और यूएई ज्यादा उत्पादन शुरू करता है:सप्लाई बढ़ सकती है कीमतें फिर नीचे आ सकती हैं.लेकिन अभी बाजार अनिश्चित है कीमतें ऊंची बनी रह सकती हैं।
भारत पर क्या असर पड़ेगा? क्या पेट्रोल-डीजल होगा महंगा?
ग्लोबल ऑयल मार्केट में होने वाली इस हलचल का भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश पर सीधा और बड़ा असर पड़ता है. कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से न केवल पेट्रोल-डीजल महंगा होने का डर रहता है, बल्कि इससे माल ढुलाई की लागत बढ़ती है, जिससे सीधे तौर पर महंगाई में इजाफा होता है और देश का व्यापार घाटा भी बढ़ सकता है।
हालांकि, आम जनता के लिए राहत की बात यह है कि केंद्र सरकार ने फिलहाल कीमतों में बढ़ोतरी की किसी भी संभावना से इनकार किया है. पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने साफ किया है कि पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाने का अभी कोई प्रस्ताव नहीं है. सरकार पश्चिम एशिया के तनाव और अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति पर करीब से नजर रख रही है. उन्होंने भरोसा दिलाया कि देश में एलपीजी, पेट्रोल और डीजल का पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है, इसलिए घबराने की जरूरत नहीं है और कीमतें फिलहाल स्थिर बनी रहेंगी।
क्रूड ऑयल के दाम 111 डॉलर के पार, पेट्रोल की कीमत 393 रुपये तक पहुंची, कई देशों में हाहाकार
मुंबई यूनाइटेड अरब अमीरात (UAE) के फैसले से दुनिया भर में तेल की कीमतों में तेजी देखने को मिल रही है. ब्रेंट क्रूड करीब 2.8% बढ़कर 111 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया, जबकि WTI भी लगभग 100 डॉलर के आसपास है. इसी बीच UAE ने 1 मई से OPEC और OPEC+ छोड़ने का…

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