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नस्ल के खत्म होने का खतरा, वैज्ञानिकों ने दी साइलेंट फर्टिलिटी क्राइसिस की चेतावनी

 नई दिल्ली दुनिया में आज हजारों तरह के सिंथेटिक रसायन (मानव-निर्मित केमिकल) फैले हुए हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि इनमें से कई पेस्टिसाइड, प्लास्टिक,..

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नस्ल के खत्म होने का खतरा, वैज्ञानिकों ने दी साइलेंट फर्टिलिटी क्राइसिस की चेतावनी

 नई दिल्ली
दुनिया में आज हजारों तरह के सिंथेटिक रसायन (मानव-निर्मित केमिकल) फैले हुए हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि इनमें से कई पेस्टिसाइड, प्लास्टिक, पॉल्यूटेंट और फॉरएवर केमिकल प्रजनन क्षमता यानी फर्टिलिटी को चुपचाप नुकसान पहुंचा रहे हैं. एक नई स्टडी में वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि रसायन और जलवायु परिवर्तन मिलकर मानव और जानवरों दोनों की प्रजनन क्षमता, जैव विविधता और स्वास्थ्य को गंभीर खतरे में डाल रहे हैं। 
पिछले 50 सालों में पृथ्वी पर वन्यजीवों की आबादी दो-तिहाई से ज्यादा घट चुकी है. इसमें प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन बड़ी वजह माने जा रहे हैं. इंसानों में भी पुरुष और महिला दोनों में बांझपन की समस्या बढ़ रही है। 
वैज्ञानिकों का मानना है कि हार्मोन बिगाड़ने वाले रसायन (Endocrine Disrupting Chemicals – EDCs) इसके मुख्य कारण हो सकते हैं. आज बाजार में 1000 से ज्यादा ऐसे केमिकल मौजूद हैं जो हमारे शरीर के प्राकृतिक हार्मोन को नकल करते या रोकते हैं। 
विभिन्न जीवों पर पड़ने वाले प्रभाव
एक टेबल में वैज्ञानिकों ने दिखाया है कि अलग-अलग जीवों पर कौन-कौन से रसायन और तनाव कैसे असर कर रहे हैं… 
    कीड़े-मकोड़े: Tributyltin, Phthalates, Microplastics आदि से लिंग परिवर्तन, प्रजनन क्षमता घटना.
    मछलियां: Pyrethroids, Microplastics से अंडे कम बनना, जनसंख्या घटना.
    पक्षी: PFAS, Organoclorines से अंडे से बच्चा निकलने में समस्या.
    सरीसृप: धातु और तापमान से लिंग अनुपात बिगड़ना.
    मेंढक: Phthalates से प्रजनन सफलता घटना.
    समुद्री स्तनधारी: गर्भपात, समय से पहले जन्म.
    इंसान: PFAS, Microplastics से स्पर्म की संख्या और गति कम होना, पुरुष जननांगों में समस्या.
रसायन पर्यावरण में लंबे समय तक बने रहते हैं और कम मात्रा में भी बड़ा नुकसान पहुंचा सकते हैं.।
जलवायु परिवर्तन कैसे बढ़ा रहा है खतरा?
ग्लोबल वार्मिंग से तापमान बढ़ रहा है, जिससे जानवरों पर अतिरिक्त तनाव पड़ रहा है. गर्मी, ऑक्सीजन की कमी और रसायन मिलकर प्रजनन के तनाव को और बढ़ा देते हैं. स्टडी में कहा गया है कि इंसानों की फर्टिलिटी ट्रेंड वन्यजीवों जैसी ही है. दोनों ही अनजाने में हानिकारक रसायनों के संपर्क में आ रहे हैं। 
दुनिया में 1,40,000 से ज्यादा सिंथेटिक केमिकल हैं, लेकिन सिर्फ 1% की पूरी सुरक्षा जांच हुई है. DDT, PFAS (Forever Chemicals) जैसे कई केमिकल पहले इस्तेमाल होते रहे और बाद में इनके नुकसान पता चले। 
DDT के कारण पक्षियों के अंडे पतले हो गए. समुद्री जानवरों की प्रजनन क्षमता घटी. PFAS महिलाओं में फर्टिलिटी 40% तक कम कर सकता है. माइक्रोप्लास्टिक भी जनन अंगों में जमा हो रहे हैं, लेकिन उनके पूरे प्रभाव अभी पता नहीं हैं.
वैज्ञानिक सुसान ब्रैंडर के नेतृत्व में की गई स्टडी में कहा गया है कि पारिस्थितिकी तंत्र और मानव स्वास्थ्य एक-दूसरे से जुड़े हैं. अगर वन्यजीवों की प्रजनन क्षमता खत्म हुई तो पूरा फूड चेन प्रभावित होगा, जिसका असर अंत में इंसानों पर पड़ेगा। 
क्या है इस समस्या का समाधान 
वैज्ञानिकों का कहना है कि Global Plastics Treaty जैसे अंतरराष्ट्रीय समझौते जरूरी हैं. हमें रसायनों की सुरक्षा जांच तेज करनी होगी. प्लास्टिक प्रदूषण कम करना होगा और क्लाइमेट चेंज रोकने के प्रयास बढ़ाने होंगे। 
यह छिपा प्रजनन संकट कोई दूर की बात नहीं है. यह आज हमारे आसपास हो रहा है. अगर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाली पीढ़ियां गंभीर स्वास्थ्य और जैव विविधता संकट का सामना करेंगी. रसायनों और जलवायु दोनों पर एक साथ नियंत्रण जरूरी है, वरना साइलेंट फर्टिलिटी क्राइसिस धीरे-धीरे बड़े संकट में बदल सकता है। 

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