रूस दौरे के बीच बड़ा भू-राजनीतिक घटनाक्रम, पुतिन-तालिबान समझौते से बढ़ी हलचल

नई दिल्ली अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कभी-कभी एक ही दिन की घटनाएं आने वाले कई वर्षों की रूपरेखा तैयार कर देती हैं. गुरुवार को कुछ ऐसा ही हुआ. इस्लामाबाद में बैठकर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ तालिबान और भारत के खिलाफ जहर उगल रहे थे. उसी समय रूस में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल…

रूस दौरे के बीच बड़ा भू-राजनीतिक घटनाक्रम, पुतिन-तालिबान समझौते से बढ़ी हलचल

नई दिल्ली

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कभी-कभी एक ही दिन की घटनाएं आने वाले कई वर्षों की रूपरेखा तैयार कर देती हैं. गुरुवार को कुछ ऐसा ही हुआ. इस्लामाबाद में बैठकर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ तालिबान और भारत के खिलाफ जहर उगल रहे थे. उसी समय रूस में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और तालिबान एक साथ पाकिस्तान की फील्डिंग सेट कर रह थे. हालांकि दोनों के तरीके अलग-अलग थे, लेकिन जो कदम उठाए वह पाकिस्तान खिलाफ था. रूस में पहला इंटरनेशनल सिक्योरिटी फोरम आयोजित किया गया, जिसमें 120 से ज्यादा देशों के प्रतिनिधि पहुंचे थे. भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के प्रतिनिधि भी यहां थे. भारत के NSA अजीत डोभाल ने कहा कि आतंकवाद पर ‘दोहरा मापदंड नहीं चलेगा’. वहीं दूसरी तरफ रूस और तालिबान के बीच सैन्य सहयोग समझौते पर मुहर लग रही थी. रिपोर्ट के मुताबिक इस दौरान अफगानिस्तान ने एयर डिफेंस सिस्टम भी मांगे. तीनों घटनाओं को अलग-अलग देखने पर तस्वीर अधूरी लग सकती है. लेकिन इन्हें एक साथ जोड़ें तो पाकिस्तान के लिए उभरती नई रणनीतिक चुनौती साफ दिखाई देती हैं। 

शहबाज शरीफ ने क्या कहा?
पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम की वर्षगांठ पर दिए संदेश में शहबाज शरीफ ने आरोप लगाया कि तालिबान सरकार भारत के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने में मदद कर रही है. यह बयान ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान और तालिबान के रिश्ते लगातार खराब हो रहे हैं. डूरंड लाइन पर झड़पें बढ़ी हैं और पाकिस्तान की एयरफोर्स कई बार अफगानिस्तान के अंदर हवाई और सैन्य कार्रवाई कर चुकी है. लेकिन जब शहबाज शरीफ जहर उगल रहे थे, तब रूस में कुछ और ही हो रहा था। 

रूस में क्या हो रहा था?
रूस में आयोजित इंटरनेशनल सिक्योरिटी फोरम में NSA अजीत डोभाल ने आतंकवाद पर सख्त रुख अपनाया. डोभाल ने कहा कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में दोहरा मापदंड नहीं हो सकता. जिम्मेदार देशों को तय करना होगा कि वे आतंकवाद के प्रायोजकों का समर्थन करेंगे या उनके खिलाफ निर्णायक कार्रवाई. डोभाल ने किसी देश का नाम नहीं लिया, लेकिन आतंकवाद को लेकर भारत का रुख लंबे समय से पाकिस्तान के खिलाफ रहा है. यानी जिस दिन शहबाज भारत और तालिबान पर आरोप लगा रहे थे, उसी दिन भारत रूस के मंच से आतंकवाद पर अपनी लाइन दुनिया के सामने रख रहा था. लेकिन पाकिस्तान को इसकी आदत है. इसीलिए पाकिस्तान के लिए असली बुरी खबर अफगानिस्तान से आई। 

असली कहानी रूस-तालिबान डील में छिपी है
द इंडिपेंडेंट की रिपोर्ट के मुताबिक सबसे बड़ा घटनाक्रम रूस और तालिबान के बीच हुआ सैन्य सहयोग समझौता है. रूस पहले ही जुलाई 2025 में तालिबान सरकार को मान्यता देने वाला दुनिया का पहला देश बन चुका है. अब उसने रक्षा सहयोग को भी आगे बढ़ा दिया है. हालांकि समझौते की पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है, लेकिन अफगानिस्तान की प्राथमिकताओं को देखकर कई सवाल उठ रहे हैं. तालिबान की सबसे बड़ी सैन्य चिंता पाकिस्तान की सीमा पार कार्रवाई है. पाकिस्तान ने पिछले कई महीनों में कई बार आतंकवाद विरोधी अभियान के नाम पर अफगान क्षेत्र में हवाई हमले किए हैं. अफगानिस्तान की नजर में यह उसकी संप्रभुता का उल्लंघन है. यही वजह है कि अफगानिस्तान अब रूस से आधुनिक एयर डिफेंस क्षमता विकसित करना चाहता है ताकि भविष्य में अगर कोई उसकी हवाई सीमा का उल्लंघन करे तो जवाब दिया जा सके। 

पाकिस्तान की टेंशन क्यों बढ़ सकती है?
अभी तक पाकिस्तान के पास एक बड़ा रणनीतिक फायदा था. अफगानिस्तान के पास आधुनिक एयर डिफेंस नेटवर्क नहीं है. लेकिन अगर रूस किसी स्तर पर एयर डिफेंस, रडार, सैन्य प्रशिक्षण, उपकरणों की मरम्मत या पुराने लेकिन प्रभावी रक्षा सिस्टम उपलब्ध कराता है, तो स्थिति बदल सकती है. तालिबानी रक्षा मंत्री मोहम्मद याकूब ने एयर डिफेंस मांगा है. हो सकता है कि भविष्य में रूस उसे S-400 या पैंटसिर एयर डिफेंस सिस्टम दे. यह भी हो सकता है कि अपने पुराने मिग या सुखोई जेट भी अफगानिस्तान को दे. इसका मतलब यह नहीं कि कल ही अफगानिस्तान को मिग या सुखोई विमान मिल जाएंगे. लेकिन यह जरूर है कि तालिबान पहली बार किसी बड़ी सैन्य शक्ति के साथ औपचारिक रक्षा साझेदारी बना रहा है. और यह बात पाकिस्तान के साथ-साथ अमेरिका को परेशान कर सकती है। 

हिंदू-सिख पर क्या बोला तालिबान?
मॉस्को में तालिबान के रक्षा मंत्री मोहम्मद याकूब ने हिंदू और सिख समुदायों को अफगानिस्तान लौटने का खुला निमंत्रण भी दिया. उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान उनका भी देश है और तालिबान उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करेगा. यह सिर्फ सामाजिक बयान नहीं था. इसे तालिबान की उस कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है जिसमें वह दुनिया के सामने खुद को सिर्फ एक उग्रवादी संगठन नहीं बल्कि एक ‘सामान्य सरकार’ के रूप में पेश करना चाहता है। 

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