₹2.25 लाख करोड़ की निकासी के बाद सरकार का बड़ा दांव, क्या फिर लौटेंगे विदेशी निवेशक?

 नई दिल्ली भारतीय शेयर बाजार से विदेशी निवेशकों के निकलने का सिलसिला लगातार जारी है और FPIs की भारी बिकवाली का दबाव शेयर मार्केट में साफ नजर आ रहा है. इस साल सिर्फ फरवरी महीने को छोड़ दें, तो हर महीने एफपीआई ने बाजार से पैसे निकाले हैं. अब इन निवेशकों की वापसी के लिए…

₹2.25 लाख करोड़ की निकासी के बाद सरकार का बड़ा दांव, क्या फिर लौटेंगे विदेशी निवेशक?

 नई दिल्ली

भारतीय शेयर बाजार से विदेशी निवेशकों के निकलने का सिलसिला लगातार जारी है और FPIs की भारी बिकवाली का दबाव शेयर मार्केट में साफ नजर आ रहा है. इस साल सिर्फ फरवरी महीने को छोड़ दें, तो हर महीने एफपीआई ने बाजार से पैसे निकाले हैं. अब इन निवेशकों की वापसी के लिए मोदी सरकार ने बड़ा फैसला लिया है, जिससे इन निवेशकों के यू-टर्न (FPIs U-Turn) की उम्मीद जागी है। 

दरअसल, विदेशी निवेश को आकर्षित करने के उद्देश्य से उठाए गए एक महत्वपूर्ण कदम के तहत मोदी सरकार (Modi Govt) ने भारतीय सरकारी बांडों में निवेश करने वाले विदेशी निवेशकों पर पूंजीगत लाभ कर यानी कैपिटल गेन टैक्स को हटाने का निर्णय लिया है। 

मोदी कैबिनेट ने दी मंजूरी
सूत्रों के हवाले से ये बात सामने आई है कि कैश फ्लो को बढ़ावा देने, भारतीय करेंसी रुपये (Indian Rupee) को सपोर्ट करने और ईरान संघर्ष के चलते कच्चे तेल की हाई कीमतों के प्रभाव से इकोनॉमी को बचाने के लिए उठाए जाने वाले कदमों के तहत मोदी कैबिनट ने बुधवार को इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। 

इसे सरकार की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है. इसका सीधा उद्देश्य विदेशी निवेशकों के लिए टैक्स के जटिल जंजाल को कम करना है ताकि वे अपनी पूंजी भारत से बाहर ले जाने के बजाय यहीं निवेश करने के लिए प्रोत्साहित हों. एक्सपर्ट्स का मानना है कि विदेशी निवेशकों को मिलने वाली इस प्रस्तावित टैक्स राहत से न सिर्फ घरेलू शेयर बाजार में लिक्विडिटी (नकदी) बढ़ेगी, बल्कि रुपये पर बना भारी दबाव भी काफी हद तक कम हो जाएगा। 

रिजर्व बैंक भी कर सकता है महत्‍वपूर्ण घोषणा
सरकार का यह अध्यादेश भारतीय रिजर्व बैंक के साथ बनाई गई एक संयुक्त और समन्वित रणनीति का हिस्सा है. रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की तीन दिवसीय बैठक बुधवार से शुरू हो चुकी है. शुक्रवार को एमपीसी के फैसलों की घोषणा होगी. ऐसा माना जा रहा है कि केंद्रीय बैंक इस अध्यादेश को सपोर्ट करने वाले कुछ और बड़े और महत्वपूर्ण वित्तीय बदलावों का ऐलान भी कर सकता है। 

अर्थव्यवस्था को झटकों से बचाने की तैयारी
विदेशी निवेशकों को लुभाने और रुपये को मजबूत करने के साथ ही सरकार विभिन्न क्षेत्रों द्वारा उठाई गई चिंताओं को दूर करने के लिए अन्य नीतिगत कदमों पर भी काम कर रही है. विभिन्न उद्योगों और कारोबारों को मंदी से बचाने के लिए सरकार समर्थित क्रेडिट लाइन दी जा सकती है. वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित होने के कारण संकट से जूझ रहे भारतीय निर्यातकों (Exporters) के लिए विशेष राहत पैकेज लाया जा रहा है.

कैबिनेट ने आयकर अधिनियम में संशोधन करने के लिए एक अध्यादेश को भी मंजूरी दे दी है, जिससे इन बदलावों को लागू किया जा सके. बता दें कि राष्ट्रपति से अप्रूवल मिलने के बाद यह निर्णय प्रभावी हो जाएगा। 

सरकार ने क्यों लिया फैसला? 
मोदी सरकार की ओर से यह कदम ऐसे समय में उठाया जा रहा है, जबकि देश वेस्ट एशिया संघर्ष से विदेशी निवेशकों की रिकॉर्ड बिकवाली से जूझ रहा है. इसके साथ अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये में गिरावट से लेकर बढ़ती ऊर्जा लागत की मार भी पड़ रही है। 

सूत्रों के अनुसार, इन सबके बीच सरकार का उद्देश्य भारतीय ऋण बाजारों में अधिक विदेशी निवेश को प्रोत्साहित करना है, जिससे Iran War के चलते पैदा हुए चुनौतियों का कुछ समाधान किया जा सके. इस कदम के तहत सरकार विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) द्वारा भारतीय सरकारी प्रतिभूतियों (G-secs) में किए गए निवेश पर कैपिटल गेन्स टैक्स को पूरी तरह समाप्त करेगी। 

अभी कितना लगता है टैक्स? 
गौरतलब है कि फिलहाल विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों को 12 महीने से अधिक समय तक रखे गए बॉन्ड और लिस्टेड शेयरों पर 12.5% का लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स (LTCG) टैक्स देना होता है. इसके अलावा, उन्हें सरकारी बॉन्ड से मिले ब्याज पर 20% का विदहोल्डिंग टैक्स भी चुकाना पड़ता है. इस पर पहले मिलने वाली 5% की रियायत को सरकार ने 2023 में समाप्त कर दिया था। 

2026 में अब तक ₹2.50 लाख करोड़ निकाले
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों यानी FPIs का बीते लंबे समय से भारतीय शेयर बाजार को लेकर मूड खराब है. इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि 2026 में फरवरी महीने को छोड़कर हर महीने बिकवाली हुई है और अब तक करीब 2.5 लाख करोड़ रुपये निकाले हैं. इस हिसाब ये साल विदेशी निवेश जाने के मामले में अब तक के सबसे खराब सालों में से एक बन गया है। 

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