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क्यों अहम है मालवा की 69 सीटों की लड़ाई? पंजाब की राजनीति का सबसे बड़ा रणक्षेत्र

अमृतसर  पंजाब की सियासत में सबसे अहम क्षेत्र है मालवा, केवल इसलिए नहीं कि कुल 117 विधानसभा सीटों में से 69 इसी क्षेत्र में हैं बल्कि इसलिए भी कि इस इलाके से उठी सियासी लहर पूरे पंजाब में सियासत के रुख को बदल देती है। राजनीति हो या किसानी आंदोलन यहां के नेता और बाशिंदों…

क्यों अहम है मालवा की 69 सीटों की लड़ाई? पंजाब की राजनीति का सबसे बड़ा रणक्षेत्र

अमृतसर 

पंजाब की सियासत में सबसे अहम क्षेत्र है मालवा, केवल इसलिए नहीं कि कुल 117 विधानसभा सीटों में से 69 इसी क्षेत्र में हैं बल्कि इसलिए भी कि इस इलाके से उठी सियासी लहर पूरे पंजाब में सियासत के रुख को बदल देती है। राजनीति हो या किसानी आंदोलन यहां के नेता और बाशिंदों ने बखूबी अपना दम दिखाया है। कद्दावर नेताओं के साथ-साथ बड़ी किसान जत्थेबंदियां का मालवा से संबंध है।  

पंजाब के सभी राजनीतिक दल इस क्षेत्र का सियासी महत्व जानते हैं लिहाजा साल 2027 के मद्देनजर नेताओं ने इस क्षेत्र पर अपना फोकस और सक्रियता बढ़ा दी है। इसके इतर मालवा के मतदाताओं की खास बात यह है कि यहां के लोगों ने सभी दलों को परखा, समझा और फिर अपनी सेवा का मौका दिया। पिछले पांच विधानसभा चुनावों का ट्रेंड इसी बात को साबित करता है। यही वजह है कि भाजपा को छोड़कर कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल (शिअद) और आम आदमी पार्टी इस क्षेत्र को अपना-अपना गढ़ मानते रहे हैं मगर यहां मतदाताओं का मिजाज पढ़ना आसान नहीं है।

साल 2002 के विधानसभा चुनाव का परिणाम देखें तो कांग्रेस को यहां सबसे ज्यादा 29 सीटें मिली थीं जबकि 27 सीटों के साथ शिअद दूसरे नंबर पर थी। साल 2007 में मालवा की 37 सीटें कांग्रेस जीती थी जबकि अकालियों के खाते में 19 सीटें आई थीं। साल 2012 में शिअद ने 34 सीटों पर कब्जा किया जबकि कांग्रेस 31 सीटों पर जीत दर्ज कर पाई। 

साल 2017 में कांग्रेस ने 40 सीटें जीतकर मालवा में दोबारा जलवा दिखाया जबकि अकाली 8 सीटों पर सिमट गए। इसी चुनाव में सूबे में नया दल आम आदमी पार्टी (आप) ने पहली बार इस इलाके से 18 सीटें जीती। साल 2022 के चुनाव में मालवा के मतदाताओं ने आप पर इतना प्यार लुटाया कि पार्टी ने इस क्षेत्र की 69 में से 66 सीटों पर कब्जा किया। कांग्रेस 2 और अकाली 1 सीट पर सीमित रह गए।

मतदाताओं का यह रुझान बताता है कि यहां के बाशिंदे लहर के साथ चलते हैं। पंजाब के बरनाला, बठिंडा, फरीदकोट, फतेहगढ़ साहिब, फाजिल्का (अबोहर तहसील को छोड़कर), फिरोजपुर, लुधियाना, मलेरकोटला, मानसा, मोगा, पटियाला, मुक्तसर साहिब, रूपनगर व संगरूर मालवा का हिस्सा हैं।

पार्टियों के अध्यक्ष यही सें, डेरा फैक्टर असरदार
बरनाला से राजनीतिक मामलों के माहिर बघेल सिंह धालीवाल बताते हैं कि मालवा के लोग सरल मगर क्रांतिकारी प्रवृत्ति के हैं। यही वजह है कि नेताओं की घोषणाओं, उनके भाषणों, उनकी गतिविधियों और वादों का यहां के मतदाताओं पर बड़ा असर पड़ता है। पेंडू (ग्रामीण) कल्चर का भी यहां सियासत में काफी प्रभाव रहता है। अधिकतर बड़े नेता इसी संस्कृति की देन है। डेरा (सिरसा व ब्याास) फैक्टर भी अच्छी पकड़ रखता है। हालांकि सभी जातियों के लोग यहां बसते हैं मगर जट सिख बिरादरी की सियासत यहां ज्यादा अहम दिखती है।

मोगा से सियासी मामलों के जानकार मलकीत सिंह कहते हैं कि पंथक मसलों का इस बेल्ट में बहुत असर रहता है। बरगाड़ी, बहबलकलां, कोटकपूरा में बेअदबी कांड हो या फिर हाथ में गुटका साहिब रखकर सूबे से नशा खत्म करने की बात हो, पंथ के हर मसले से जुड़ी बात यहां से उठकर पूरे पंजाब में सियासी असर डालती है।

राजनीतिक विषयों के विशेषज्ञ जगतार सिंह भुल्लर कहते हैं मालवा की महत्ता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आप, कांग्रेस, शिअद और अब भाजपा ने अपने-अपने प्रदेशाध्यक्ष इसी क्षेत्र से चुने है। कांग्रेस, शिअद और आप तो यहां की सियासत में अपना जलवा दिखा चुके हैं, अब भाजपा यहां ज्यादा फोकस कर रही है। इस इलाके में विकास की बात भी होती है लेकिन लोक लुभावनी घोषणाओं की मतदाताओं पर गहरी छाप दिखती है।

मिशन 2027 के लिए अहम क्यों?
इन दिनों मालवा की सियासी महत्ता फिर बढ़ी हुई है क्योंकि 2027 के विधानसभा चुनाव सिर पर हैं। सभी दल इन इलाकों में अपना-अपना पार्टी सर्वे करवा रहे हैं। कांग्रेस करवा चुकी है। बठिंडा, मानसा, सरदूलगढ़, मोड़ मंडी, रामपुरफूला, तलवंडी साबो इत्यादि क्षेत्रों में किसान वर्ग निर्णायक बनता है। साल 2022 के परिणामों में यहां दबदबा तो आप का है मगर कांग्रेस और अकाली यहां दोबारा अपना प्रभाव जमाना चाहते हैं जबकि भाजपा के लिए यहां खाेने के लिए कुछ नहीं है। लिहाजा सभी दलों ने यहां ताकत झोंकनी शुरू कर दी है।

 

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