TMC-Congress विलय की चर्चा पर बड़ा खुलासा, जानिए क्यों ममता बनर्जी के लिए आसान नहीं है यह फैसला

कोलकाता  तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी और कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी की मुलाकात के बाद टीएमसी महासचिव अभिषेक बनर्जी और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की मुलाकात के बाद दोनों पार्टियों का आपस में विलय की अटकलें शुरू हो गई. इन मुलाकातों के बाद कांग्रेस की ओर से अपने तमाम प्रदेश अध्यक्ष…

TMC-Congress विलय की चर्चा पर बड़ा खुलासा, जानिए क्यों ममता बनर्जी के लिए आसान नहीं है यह फैसला

कोलकाता
 तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी और कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी की मुलाकात के बाद टीएमसी महासचिव अभिषेक बनर्जी और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की मुलाकात के बाद दोनों पार्टियों का आपस में विलय की अटकलें शुरू हो गई. इन मुलाकातों के बाद कांग्रेस की ओर से अपने तमाम प्रदेश अध्यक्ष को मीटिंग के लिए बुलावा भेजे जाने के बाद टीएमसी का कांग्रेस में विलय की अटकलें और तेज हो गई. हालांकि टीएमसी की तरफ से इन अटकलों को खारिज कर दिया गया है और कांग्रेस ने भी प्रदेश अध्यक्षों के साथ अपनी बैठक को टाल दिया है. अब राजनीतिक गलियारों में चर्चा हो रही है कि कांग्रेस और टीएमसी के बीच विलय को लेकर बातचीत में किसी बिंदु पर गतिरोध है. इन चर्चाओं के बीच विशेषज्ञों ने अपनी बात सामने रखी है. संविधान विशेषज्ञ का कहना है कि ममता बनर्जी के चाहने के बावजूद वह अपनी पार्टी का विलय कांग्रेस में नहीं कर पाएंगी। 

सुप्रीम कोर्ट के वकील ने समझाया पार्टियों के विलय का पूरा समीकरण
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी दुबे ने कहा कि राजनीतिक दलों का विलेय दो तरह से होता है. एक विधायी विलय, जिसको हम लेजिस्लेटिव मर्जर कहते हैं. दूसरा होता है ऑर्गेनाइजेशनल मर्जर, जिसको हम सांगठनिक विलय कहते हैं. दोनों परिस्थितियों में दो तिहाई बहुमत होना जरूरी है. जब आप विधायी विलय करते हैं तो लोकसभा, राज्य सभा और विधानसभा के दो तिहाई सदस्यों का सहमति पत्र होना चाहिए. वहीं सांगठनिक विलय में भी तमाम राष्ट्रीय, राज्य स्तरीय और जिला स्तरीय पार्टी पदाधिकारियों का दो तिहाई समर्थन चाहिए। 

उन्होंने कहा की तारीख में ममता बनर्जी पार्टी प्रमुख होने के नाते अगर टीएमसी का विलय करना भी चाहती हैं तो उन्हें सबसे पहले इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया को यह आश्वस्त करना होगा कि उनके इस फैसले के साथ पार्टी पदाधिकारी या सांसद-विधायकों में दो तिहाई समर्थन प्राप्त है। 

वरिष्ठ अधिवक्ता इसके अलावा विलय के लिए दोनों दलों के मुख्य संगठन माने पार्टी हाईकमान आपस में औपचारिक विलय का प्रस्ताव पारित करते हैं. मूल पार्टी के कम से कम दो तिहाई सदस्यों की सहमति से विलय होता है. तभी एंटी डिफेक्शन लॉ (दल-बदल विरोधी कानून) और मर्जर क्लॉज कॉन्स्टिट्यूशनल वैलिडिटी (विलय की संवैधानिक वैधता) कार्यान्वयन में मदद करेगा. इसके बिना लेजिसलेटिव मर्जर कर देते हैं और दो तिहाई सदस्य नहीं है तो वह भी नहीं माना जाएगा. संगठन का विलय कर देते हैं तो भी नहीं माना जाएगा। 

उन्होंने समझाया कि विलय में यह भी देखना होगा कि जिन लोगों ने खुद को अलग गुट घोषित कर दिया है, वह कहां हैं. चुनाव आयोग को आश्वस्त होना पड़ेगा कि विलय के समय ब्लॉक से लेकर केंद्रीय स्तर के संगठन और उसके जो ऑफिस बियरर्स हैं वो किसके साथ है. क्योंकि वो रिप्रेजेंट करते हैं कितनी मेंबरशिप है. तभी यह ऐसा हो सकता है और हमने हाल ही में महाराष्ट्र के केस में दोनों पॉलिटिकल पार्टीज के केस में इलेक्शन कमीशन का फैसला देखा भी है. क्योंकि संगठन और विधायिका दोनों के मर्जर के बाद इलेक्शन कमिशन ने जो निर्णय लिया था। 

अश्विनी दुबे ने बताया कि अयोग्यता केवल लोकसभा, राज्य सभा और विधानसभा सदस्यों का कहा सकता है. लेकिन संगठन के लोगों का डिसक्वालीफिकेशन नहीं हो सकता है. दूसरी पार्टी की मान्यता तब मिलेगी जब उसमें भी दो तिहाई सदस्य जो पार्टी के सदस्य हैं वो वो तैयार हो जाएं करें। 

उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र में शिवसेना की टूट और एनसीपी की टूट सुप्रीम कोर्ट ने साफ-साफ कह दिया था कि सिर्फ अगर विधायक चाहे और सांसद चाहें तो वो अपने हिसाब से पार्टी को ले जाकर मर्ज नहीं कर सकते. अलग पार्टी नहीं बना सकते तो वो विलय भी नहीं कर सकते। 

कहा कि चाहे लोकसभा हो, चाहे राज्यसभा हो, चाहे विधानसभा हो, इनसाइड द हाउस तो बागी गुट अपना नेता चुन सकता है अपने फैसले ले सकता है, लेकिन पार्टी का वो रिप्रेजेंटेटिव नहीं माना जाएगा. ये नहीं माना जाएगा कि बाहर भी वो पार्टी का रिप्रेजेंटेटिव है. लेकिन जैसे लोकसभा के अंदर विधानसभा के अंदर जो तो तिहाई बहुमत वो बहुमत अगर पार्टी जो मूल पार्टी है मूल पार्टी पर दावा करते हैं कि हम ही यहां विधानसभा या लोकसभा में रिप्रेजेंट करते हैं. कहेंगे कि ये हमारे चुनाव में जीते हुए लोगों के नंबर हैं, तो वहां उनकी वैद्यता मानी जाएगी. लेकिन बाहर संगठन में वो रिप्रेजेंट नहीं कर सकते. संगठन के रिप्रेजेंटेशन के लिए संगठनिक विलय और संगठनिक विलय के लिए ऑर्गेनाइजेशनल मर्जर के लिए वह जो सदस्यों की संख्या है वो इंश्योर करना जरूरी है रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपल्स एक्ट के मुताबिक तो अंदर वो कर सकते हैं बाहर नहीं और यही सुप्रीम कोर्ट में अभी मामला पेंडिंग है। 
.
कहां से शुरू हुई टीएमसी और कांग्रेस के विलय की खबरें
बता दें कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के महज 80 सीटों पर सिमटने के बाद पार्टी में भगदड़ मच गई है. ऋतब्रत बनर्जी की अगुवाई में 58 विधायकों ने बागी गुट बना लिया और पश्चिम बंगाल विधानसभा में अपनी अलग मान्यता प्राप्त कर ली है. उनका दावा है कि उनके बागी गुट में अब तक तृणमूल कांग्रेस 65 विधायक आ चुके हैं. लोकसभा में काकोली घोष दस्तीदार की अगुवाई में 20 सांसदों की सूची स्पीकर ओम बिरला को सौंपे जाने का दावा किया गया है. दावा किया जा रहा है कि टीएमसी के इन बागी सांसदों ने एनडीए सरकार का सपोर्ट करने की बात कही है. उधर, राज्य सभा में अब तक टीएमसी के तीन सांसदों सुखेंदु शेखर राय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बराइक अपने पद से इस्तीफा दे चुके हैं। 

इन राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच विपक्षी दलों के संगठन इंडिया ब्लॉक की बैठक में शामिल होने के लिए दिल्ली पहुंची ममता बनर्जी ने कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात कीं. इसके अलावा टीएमसी महासचिव अभिषेक बनर्जी ने भी नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से मुलाकात की, जिसके बाद खबरें उड़ने लगी कि तृणमूल कांग्रेस का कांग्रेस में विलय होने जा रहा है. हालांकि करीब 24 घंटे बाद कांग्रेस की तरफ से जयराम रमेश और तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ताओं ने ऐसे किसी विलय से इनकार कर दिया है। 

 

About the Author

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

About the Author

GoodDoo News

Your trusted source for unbiased, timely news. We cover national and global updates, politics, business, social issues, and inspiring stories. Stay informed with accurate reporting and impactful stories that matter.

Search the Archives

Access over the years of investigative journalism and breaking reports