,

डॉक्टरों की कमी पर सवाल, CG के मेडिकल कॉलेजों में खाली पद भरने की मांग तेज

रायपुर. छत्तीसगढ़ सिविल सोसाइटी ने मुख्य सचिव को 16 पन्नों का पत्र लिखा है। इस पत्र में प्रदेश के शासकीय मेडिकल कॉलेजों और स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों तथा शैक्षणिक स्टाफ के रिक्त पदों को तत्काल नियमित भर्ती से भरने एवं लड़खड़ाती चिकित्सा व्यवस्था को सुदद करने की मांग की गई है। पत्र के अनुसार, छत्तीसगढ़…

डॉक्टरों की कमी पर सवाल, CG के मेडिकल कॉलेजों में खाली पद भरने की मांग तेज

रायपुर.

छत्तीसगढ़ सिविल सोसाइटी ने मुख्य सचिव को 16 पन्नों का पत्र लिखा है। इस पत्र में प्रदेश के शासकीय मेडिकल कॉलेजों और स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों तथा शैक्षणिक स्टाफ के रिक्त पदों को तत्काल नियमित भर्ती से भरने एवं लड़खड़ाती चिकित्सा व्यवस्था को सुदद करने की मांग की गई है।

पत्र के अनुसार, छत्तीसगढ़ के प्रतिष्ठित सरकारी मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों में डॉक्टरों व शैक्षणिक स्टाफ की भारी कमी ने प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था को वेंटिलेटर पर ला खड़ा किया है। हाल ही में सामने आए आंकड़े न केवल चौंकाने वाले हैं, बल्कि सरकारी दावों की पोल खोलने के लिए काफी हैं। ये आंकड़े साफ बयां करते हैं कि करोड़ों मरीजों का बोझ उठाने वाले प्रदेश के मुख्य चिकित्सा संस्थान खुद स्टाफ की किल्लत से बुरी तरह हांफ रहे हैं। विडंबना यह है कि एक तरफ सरकारें ‘डॉक्टरों की कमी’ का रोना रोती हैं, वहीं दूसरी तरफ राज्य में हजारों योग्य डॉक्टर होने के बावजूद सालों से नियमित भर्ती प्रक्रिया ठप पड़ी है।

चिकित्सा शिक्षा विभाग के अंतर्गत आने वाले संस्थानों में स्वीकृत पदों के मुकाबले आधे से अधिक पद खाली पड़े हैं। इस प्रशासनिक उदासीनता का सीधा असर मरीजों के इलाज पर तो पड़ ही रहा है, साथ ही सूबे के भावी डॉक्टरों (मेडिकल छात्रों) की पढ़ाई और भविष्य भी भगवान भरोसे चल रहा है। आलम ये है कि प्रदेश से हर साल लगभग 2250 एमबीबीएस निकल रहे हैं। इसके एवज में पीजी में बमुश्किल 399 ही सीट हैं। इसके अलावा अन्य विशेषज्ञों की तो सीट भी नहीं है। रायपुर-बिलासपुर को छोड़ दें तो राज्य के अन्य कालेजों में 80 प्रतिशत डाक्टरों के पद खाली हैं।

एमबीबीएस के बाद इंटर्नशिप करने वाले डॉक्टारों को महज 530 प्रतिदिन रुपये मानदेय मिलता है, जबकि अन्य राज्यों में स्थिति बेहतर है। बांड की शर्तों के अनुरूप काम करने वाले डाक्टरों को भी केवल 49 हजार ही मानदेय मिलता है। दो साल तक उन्हें गांव में सेवा देनी पड़ती है। यही वजह है कि ज्यादातर युवा डॉक्टर स्वेच्छा से बांड शर्तों से मुक्त होकर 25 लाख रुपये जमा करके प्रदेश से ही मुक्ति पाने की कोशिश में लगे रहते हैं।

चिकित्सा व्यवस्था की दुर्दशा इसी से समझ सकते हैं कि प्रदेश में आज तक प्रदेश के सरकारी क्षेत्र में एक भी किडनी, लीवर या हार्ट ट्रांसप्लांट सर्जरी नहीं हो सकी है। उच्च चिकित्सा के लिए राज्य के बाहर जाने की स्थिति बनी हुई है।
रिक्त पदों का गणित: रीढ़ विहीन ढांचा

सरकारी आंकड़ों का बारीकी से विश्लेषण करें, तो इस बदहाली का सबसे स्याह और डरावना चेहरा सीनियर रेजिडेंट्स (SR) के पदों पर देखने को मिलता है। किसी भी मेडिकल कॉलेज अस्पताल के भीतर व्यावहारिक चिकित्सा और चौबीस घंटे मुस्तैद रहने वाली व्यवस्था की रीढ़ सीनियर रेजिडेंट्स ही होते हैं। राज्य में इनके कुल 518 स्वीकृत पद हैं, जिनमें से 375 पद खाली पड़े हैं। यानी करीब 72.3 प्रतिशत पदों पर डॉक्टरों की तैनाती ही नहीं हुई है। यही वजह है कि ओपीडी से लेकर इमरजेंसी वार्डों तक में मरीजों को इलाज के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता है और गिने-चुने डॉक्टरों पर काम का मानसिक दबाव लगातार बढ़ रहा है

पद का नाम रिक्तता (प्रतिशत में) स्थिति का आकलन
सीनियर रेजिडेंट 72.3% सर्वाधिक गंभीर
असिस्टेंट प्रोफेसर 51.6% चिंताजनक

एसोसिएट प्रोफेसर 49.1% गंभीर संकट
प्रोफेसर 48.5% शैक्षणिक ढांचा प्रभावित
जूनियर रेजिडेंट 41.6% जमीनी स्तर पर स्टाफ की कमी

चिंता की बात यह भी है कि मेडिकल कॉलेजों में सिर्फ जूनियर डॉक्टरों की ही कमी नहीं है, बल्कि देश के भविष्य (डॉक्टरों) को तैयार करने वाले प्रोफेसरों की कुर्सियां भी सूनी हैं। चिकित्सा शिक्षकों की कमी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और असिस्टेंट प्रोफेसर तीनों श्रेणियों में लगभग 50 प्रतिशत पद खाली हैं। जानकारों का स्पष्ट कहना है कि अगर समय रहते इन पदों को नियमित भर्ती के जरिए नहीं भरा गया, तो चिकित्सा सेवाओं का पूरी तरह चरमराना तय है।
चिकित्सा विशेषज्ञ के 80 प्रतिशत तक पद खाली

चिकित्सा विशेषज्ञ: प्रदेश में कुल स्वीकृत 1773 पदों में से केवल 355 कार्यरत हैं (नियमित: 320, तदर्थ: 2, संविदा: 33)। इसके चलते रिकार्ड 1418 पद खाली हैं, यानी लगभग 80% पद रिक्त हैं। चिंताजनक बात यह है कि मोहला-मानपुर और सुकमा जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में विशेषज्ञों की संख्या शून्य है, जिससे ग्रामीण अंचलों में गंभीर स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित हो रही हैं।

चिकित्सा अधिकारी : इसी तरह चिकित्सा अधिकारियों के कुल 2296 स्वीकृत पद हैं, जिनमें से 1174 पदों पर डॉक्टर कार्यरत हैं और 305 पद रिक्त पड़े हैं। हालांकि, कार्यरत अमले में नियमित डॉक्टरों की संख्या (सिर्फ 37) बेहद कम है, जबकि तदर्थ (780) और संविदा (1991) कर्मियों की संख्या कहीं अधिक है। यह स्वास्थ्य ढांचे की संविदा और तदर्थ व्यवस्था पर अत्यधिक निर्भरता को दर्शाता है।
विरोधाभास: 17 हजार से अधिक डॉक्टर उपलब्ध, फिर भी नियुक्तियां बंद

स्वास्थ्य सेवाओं की इस दुर्दशा के पीछे डॉक्टरों की अनुपलब्धता नहीं, बल्कि सरकारी और प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी है। छत्तीसगढ़ मेडिकल काउंसिल में पंजीकृत डॉक्टरों के ताजा आंकड़े इस विरोधाभास को पूरी तरह स्पष्ट करते हैं। राज्य में वर्तमान में कुल 17,142 डॉक्टर पंजीकृत हैं, जो चिकित्सा ढांचे को मजबूत बनाने के लिए पर्याप्त हैं।

काउंसिल के आंकड़ों के अनुसार:
एमबीबीएस डॉक्टर: 11,132
एमडी (विशेषज्ञ): 2,850
एमएस (सर्जन): 2,740
सुपर स्पेशलिस्ट (DM): 190
सुपर स्पेशलिस्ट (MCh): 230

नियमित डॉक्टरों के अलावा, राज्य में करीब 5,000 अस्थायी डॉक्टर भी पंजीकृत हैं, जो समय-समय पर संविदा या अन्य माध्यमों से चिकित्सा कार्यों में महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान करते हैं। इतने बड़े पूल के बावजूद राज्य में साल 2020 के बाद से छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (CGPSC) के माध्यम से कोई नियमित भर्ती प्रक्रिया आयोजित नहीं की गई है। योग्य डॉक्टरों की फौज सड़क पर है या निजी अस्पतालों की ओर रुख कर रही है, और सरकारी अस्पताल खाली पड़े हैं।

About the Author

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

About the Author

GoodDoo News

Your trusted source for unbiased, timely news. We cover national and global updates, politics, business, social issues, and inspiring stories. Stay informed with accurate reporting and impactful stories that matter.

Search the Archives

Access over the years of investigative journalism and breaking reports