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दैनिक वेतनभोगियों को राहत, हाईकोर्ट ने ग्रेच्युटी का अधिकार माना; राज्य सरकार को झटका

बिलासपुर  छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय से दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों के पक्ष में एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला आया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि दैनिक वेतन भोगी के रूप में दी गई सेवाओं के लिए भी कर्मचारी ग्रेच्युटी पाने के हकदार हैं। जस्टिस राकेश मोहन पांडेय की एकल पीठ ने इस संबंध में राज्य सरकार…

दैनिक वेतनभोगियों को राहत, हाईकोर्ट ने ग्रेच्युटी का अधिकार माना; राज्य सरकार को झटका

बिलासपुर
 छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय से दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों के पक्ष में एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला आया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि दैनिक वेतन भोगी के रूप में दी गई सेवाओं के लिए भी कर्मचारी ग्रेच्युटी पाने के हकदार हैं। जस्टिस राकेश मोहन पांडेय की एकल पीठ ने इस संबंध में राज्य सरकार द्वारा दायर की गई याचिकाओं के पूरे बैच को खारिज कर दिया है।

विवाद जल संसाधन विभाग छत्तीसगढ़ के विभिन्न संभागों में कार्यरत रहे कर्मचारियों सदानंद मानिकपुरी, बाबूलाल साहू, नैन सिंह क्षत्रिय, शैलेंद्र तिवारी व अन्य से जुड़ा है। इन कर्मचारियों ने दैनिक वेतन भोगी के रूप में लंबी सेवाएं दी थीं, जिसके बाद उन्हें नियमित किया गया था। ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम, 1972 के तहत सक्षम प्राधिकारी और अपीलीय प्राधिकारी ने कर्मचारियों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उन्हें दैनिक वेतन भोगी अवधि की भी ग्रेच्युटी देने का आदेश दिया था। इस आदेश को चुनौती देते हुए राज्य सरकार ने हाई कोर्ट में याचिकाएं दायर की थीं।

राज्य सरकार का पक्ष: शासकीय अधिवक्ता विनय पांडे ने तर्क दिया कि इसी तरह के एक मामले धनसाई साहू बनाम छत्तीसगढ़ राज्य में सुप्रीम कोर्ट ने इस कानूनी बिंदु को तीन जजों की बड़ी बेंच को रेफर किया है। चूंकि मामला देश की सर्वोच्च अदालत के समक्ष लंबित है, इसलिए हाई कोर्ट को इस मामले की सुनवाई तब तक टाल देनी चाहिए। कर्मचारियों की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता विनोद देशमुख ने सुप्रीम कोर्ट के ही ''''नेत्राम साहू बनाम छत्तीसगढ़ राज्य 2018 फैसले का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही यह तय कर चुका है कि कल्याणकारी राज्य में वर्षों तक कम वेतन पर काम लेने के बाद कर्मचारियों को ग्रेच्युटी से वंचित करना न्याय का मज़ाक होगा।

हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण निष्कर्ष
हाई कोर्ट ने कर्मचारियों के पक्ष को सही ठहराते हुए राज्य सरकार की दलीलों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने अपने आदेश में मुख्य रूप से दो बातें साफ कीं। सुप्रीम कोर्ट के अशोक सदारंगानी 2012 मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि सिर्फ इस आधार पर मामले को अनिश्चितकाल के लिए नहीं टाला जा सकता कि कोई संदर्भ बड़ी बेंच के पास लंबित है। जब तक कोई बड़ी बेंच पुराना फैसला बदल नहीं देती, तब तक पुराना कानून ही लागू रहेगा।

कोर्ट ने पूर्व के फैसलों को दोहराते हुए कहा कि यदि किसी कर्मचारी ने 22-25 साल तक दैनिक वेतन भोगी के रूप में निरंतर सेवा दी है और बाद में उसे नियमित किया गया है, तो विभाग को स्वेच्छा से उसे ग्रेच्युटी का भुगतान करना चाहिए, न कि उसे अदालतों के चक्कर काटने पर मजबूर करना चाहिए।

भविष्य का रास्ता
हाई कोर्ट ने राज्य सरकार की सभी 9 रिट याचिकाएं खारिज कर दी हैं। हालांकि, कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि भविष्य में सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच द्वारा जो भी अंतिम फैसला आएगा, वह दोनों पक्षों पर बाध्यकारी होगा। यदि भविष्य में स्थिति बदलती है, तो राज्य सरकार के पास नए सिरे से कानूनी विकल्प चुनने की स्वतंत्रता होगी। इस फैसले से प्रदेश के हजारों ऐसे कर्मचारियों को बड़ी राहत मिली है जो अपने सेवाकाल का एक लंबा हिस्सा दैनिक वेतन भोगी के रूप में बिता चुके हैं।

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