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हाईकोर्ट का बड़ा आदेश! DGP को सर्कुलर जारी करने के निर्देश, पुलिस अधिकारियों पर की कड़ी टिप्पणी

ग्वालियर मध्य प्रदेश में अपराधियों को कानूनी लूपहोल (कमियों) का फायदा पहुंचाकर कोर्ट से छुड़ाने वाले और अपनी ड्यूटी में घोर लापरवाही बरतने वाले पुलिस अफसरों पर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने बड़ा और कड़ा प्रहार किया है। हाई कोर्ट की डबल बेंच ने तल्ख लहजे में टिप्पणी करते हुए कहा है…

हाईकोर्ट का बड़ा आदेश! DGP को सर्कुलर जारी करने के निर्देश, पुलिस अधिकारियों पर की कड़ी टिप्पणी

ग्वालियर
मध्य प्रदेश में अपराधियों को कानूनी लूपहोल (कमियों) का फायदा पहुंचाकर कोर्ट से छुड़ाने वाले और अपनी ड्यूटी में घोर लापरवाही बरतने वाले पुलिस अफसरों पर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने बड़ा और कड़ा प्रहार किया है।

हाई कोर्ट की डबल बेंच ने तल्ख लहजे में टिप्पणी करते हुए कहा है कि "कुछ पुलिस अधिकारी वर्दी तो कानून की पहनते हैं, लेकिन उनका दिल अपराधियों के साथ धड़कता है।"

न्यायालय ने साफ कर दिया है कि अगर कोई पुलिस अधिकारी किसी आरोपी को गिरफ्तार करते समय उसकी गिरफ्तारी का लिखित आधार नहीं सौंपता है, तो यह माना जाएगा कि उसने आरोपी को कोर्ट से रिहा कराने के उद्देश्य से 'जानबूझकर' ऐसा किया है।

कोर्ट ने प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) को एक महीने के भीतर सभी थाना प्रभारियों और जांच अधिकारियों के लिए 'सख्त चेतावनी सर्कुलर' जारी करने का अल्टीमेटम दिया है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश को ठेंगा दिखा रहे मैदानी अफसर
हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पुलिस मुख्यालय (PHQ) भोपाल की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर नाराजगी जताई। कोर्ट ने आदेश में कहा कि सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्देशों (मिहिर राजेश शाह मामला) के पालन में पुलिस मुख्यालय भोपाल द्वारा इसी साल 13 फरवरी 2026 को एक सर्कुलर जारी किया जा चुका है।

इस सर्कुलर के बावजूद जमीनी स्तर पर थानों में पदस्थ जांच अधिकारी नियमों को सरेआम ठेंगा दिखा रहे हैं और आरोपियों को बिना लिखित कारण बताए गिरफ्तार कर रहे हैं, जिससे शातिर अपराधी तकनीकी आधार पर कोर्ट से बच निकलते हैं।

कोर्ट ने कहा कि यह स्थिति समाज के लिए बेहद खतरनाक है। पुलिस विभाग का काम अपराधियों पर मुकदमा चलाना और निर्दोषों की रक्षा करना है, न कि अपराधियों को कानूनी चोर रास्तों से बचाना।

गांजा तस्करी के आरोपी भाई को बचाने लगाई थी याचिका
जस्टिस जीएस अहलूवालिया और जस्टिस अनुराधा शुक्ला की युगलपीठ ने यह तल्ख आदेश धर्मेंद्र लोधी द्वारा दायर एक बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया।

याचिकाकर्ता धर्मेंद्र ने दतिया जिले के बसई थाने में दर्ज एनडीपीएस (NDPS) एक्ट के एक मामले में अपने भाई की गिरफ्तारी को इस आधार पर चुनौती दी थी कि पुलिस ने उसे गिरफ्तारी के कारण लिखित में नहीं दिए थे, इसलिए उसकी गिरफ्तारी अवैध है।

हालांकि, जब कोर्ट ने रिकॉर्ड खंगाला तो पाया कि पुलिस ने आरोपी को एनडीपीएस एक्ट की धारा 50 का लिखित नोटिस दिया था और उसके पास से 86.850 किलोग्राम गांजा जब्त हुआ था। कोर्ट ने इसे कानूनी रूप से पर्याप्त मानते हुए तस्कर भाई को राहत देने से इनकार कर दिया और याचिका खारिज कर दी, लेकिन पुलिस की इस आम ढर्रे वाली कार्यप्रणाली पर गहरा रोष जताया।

हाईकोर्ट के आदेश की मुख्य बातें

· नियम: किसी भी आरोपी को कस्टडी में लेते समय उसे उसकी गिरफ्तारी के पुख्ता कारण लिखित में देना अनिवार्य है।

· लापरवाही का मतलब: लिखित आधार न देना अब सिर्फ 'लापरवाही' नहीं, बल्कि अपराधी को फायदा पहुंचाने की 'जानबूझकर की गई साजिश' माना जाएगा।

· निशाना: वर्दी की आड़ में अपराधियों से साठगांठ करने वाले पुलिसकर्मियों को विभाग से बाहर का रास्ता दिखाया जाए।

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