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नाबालिग के लिव-इन केस में HC सख्त, चाइल्ड वेलफेयर कमेटी तय करेगी लड़की की कस्टडी

चंडीगढ़  पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने 16 वर्ष 11 माह की नाबालिग लड़की और 20 वर्षीय युवक की ओर से दायर जीवन एवं स्वतंत्रता की सुरक्षा संबंधी याचिका का निपटारा करते हुए महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने कहा कि नाबालिग लड़की किशोर न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण) अधिनियम, 2015 की धारा…

नाबालिग के लिव-इन केस में HC सख्त, चाइल्ड वेलफेयर कमेटी तय करेगी लड़की की कस्टडी

चंडीगढ़
 पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने 16 वर्ष 11 माह की नाबालिग लड़की और 20 वर्षीय युवक की ओर से दायर जीवन एवं स्वतंत्रता की सुरक्षा संबंधी याचिका का निपटारा करते हुए महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं।

अदालत ने कहा कि नाबालिग लड़की किशोर न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण) अधिनियम, 2015 की धारा 2(14) के तहत 'देखरेख एवं संरक्षण की आवश्यकता वाले बच्चे' की श्रेणी में आती है। इसलिए उसकी अभिरक्षा का निर्णय कानून के अनुसार चाइल्ड वेलफेयर कमेटी करेगी।जस्टिस शालिनी सिंह नागपाल की पीठ के समक्ष दायर याचिका में कहा गया था कि दोनों याचिकाकर्ता लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे हैं।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, नाबालिग लड़की के माता-पिता इस संबंध के विरोध में हैं और उन्होंने दोनों को जान से मारने की धमकी दी है। इसी कारण लड़की युवक के साथ रहने लगी। दोनों ने 8 जुलाई 2026 को कैथल के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक और थाना सिवान के एसएचओ (नोडल अधिकारी) को अपनी जान-माल की सुरक्षा के लिए प्रार्थना-पत्र दिए थे, लेकिन उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।

सुनवाई के दौरान हरियाणा सरकार की ओर से उपस्थित अतिरिक्त महाधिवक्ता ने नोटिस स्वीकार किया। मामले पर विचार करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता लड़की नाबालिग है और उसकी आयु 16 वर्ष 11 माह है। इसलिए वह किशोर न्याय अधिनियम के तहत संरक्षण की पात्र है।

अदालत ने निर्देश दिया कि आधिकारिक प्रतिवादी यह सुनिश्चित करें कि कैथल का चाइल्ड वेलफेयर अधिकारी एक सप्ताह के भीतर नाबालिग लड़की को चाइल्ड वेलफेयर कमेटी, कैथल के समक्ष पेश करे। कमेटी कानून के अनुसार उसकी अभिरक्षा के संबंध में निर्णय लेगी और अनुपालन रिपोर्ट हाई कोर्ट में प्रस्तुत करेगी।

इसके साथ ही हाई कोर्ट ने पुलिस अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं द्वारा 8 जुलाई 2026 को दिए गए सुरक्षा संबंधी अभ्यावेदनों पर एक माह के भीतर निर्णय लिया जाए। यदि जांच में यह पाया जाता है कि दोनों की जान और स्वतंत्रता को वास्तविक खतरा है, तो कानून के अनुसार तत्काल आवश्यक सुरक्षा उपाय किए जाएं ताकि उन्हें किसी प्रकार की क्षति न पहुंचे।

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