तेहरान
2026 के ईरान युद्ध में एक नया मोड़ आया है. बहरीन और कुवैत ने सीक्रेट रूप से अपने जेट विमानों को ईरान के अंदर भेजकर सैन्य ठिकानों पर हमले किए. यह खाड़ी देशों की तरफ से ईरान के खिलाफ पहली सामने से जवाबी कार्रवाई मानी जा रही है. संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने इन हमलों में खुफिया जानकारी मुहैया कराई और एयर कवर दिया. यह घटना दिखाती है कि लंबे युद्ध ने अरब देशों को कितनी मुश्किल स्थिति में डाल दिया है।
पहले वे अप्रत्यक्ष रूप से शामिल थे, लेकिन अब उन्हें सीधे ईरान का सामना करना पड़ रहा है. यह हमले इस महीने की शुरुआत में हुए. इनमें ड्रोन और मिसाइल स्टोरेज डिपो समेत कई सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया. यह अरब देशों की नई रणनीति का संकेत है।
ईरान के साथ युद्ध लंबा खिंचने के कारण खाड़ी देश चिंतित हैं. ईरान ने पहले बहरीन और कुवैत पर ड्रोन-मिसाइल हमले किए थे. इन हमलों में अमेरिकी ठिकानों और तेल सुविधाओं को निशाना बनाया गया. अब बहरीन और कुवैत ने जवाब दिया. लोगों के अनुसार, हमले सीक्रेट रूप से किए गए।
बहरीन और कुवैत के जेट विमानों ने ईरान के अंदर घुसकर ड्रोन और मिसाइल रखने वाले गोदामों तथा अन्य सैन्य स्थानों पर बमबारी की. UAE ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई – उसने टारगेट की जानकारी दी और हमलावर विमानों को सुरक्षा कवर प्रदान किया. यह UAE की तरफ से युद्ध की शुरुआत में किए गए हमलों के बाद एक बार फिर सक्रिय भूमिका है।
यह घटना अरब देशों के बीच सहयोग की नई शुरुआत लग रही है. पहले प्रत्येक देश अलग-अलग अमेरिका का साथ देता था, लेकिन अब वे ईरान के खिलाफ मिलकर काम कर रहे हैं।
अरब देशों की मजबूरी और बदलती रणनीति
खाड़ी देश लंबे समय से ईरान से खतरा महसूस करते रहे हैं. ईरान समर्थित मिलिशिया, हूती विद्रोही और सीधे हमले उनके तेल निर्यात, सुरक्षा और अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा रहे हैं. 2026 का युद्ध शुरू होने के बाद ईरान ने खाड़ी देशों को भी निशाना बनाया. बहरीन में अमेरिकी नौसेना ठिकाने हैं. कुवैत में बड़े सैन्य बेस हैं. UAE भी अमेरिका का प्रमुख सहयोगी है।
अब अरब देशों ने सोचा है कि चुप रहने से काम नहीं चलेगा. अगर वे ईरान को जवाब नहीं देते, तो ईरान और आक्रामक होता जाएगा. बहरीन-कुवैत के हमले इसी सोच का नतीजा हैं. यह अरब रेकनिंग कहा जा रहा है. यानी अरब देश अब युद्ध की वास्तविकता को समझकर सक्रिय हो रहे हैं।
UAE का सहयोग महत्वपूर्ण है क्योंकि उसके पास बेहतर खुफिया तंत्र और एयर फोर्स है. इससे भविष्य में अरब देशों का एक अनौपचारिक गठबंधन बन सकता है, जो ईरान का मुकाबला करे. हमलों में मुख्य रूप से ईरान के ड्रोन और मिसाइल भंडारण केंद्रों को निशाना बनाया गया।
ये केंद्र ईरान की हमलावर क्षमता के लिए जरूरी हैं. इन्हें नष्ट करने से ईरान की खाड़ी देशों पर हमले की क्षमता कम हो सकती है. हालांकि हमले सीमित थे, लेकिन उनका संदेश साफ है – खाड़ी देश अब चुप नहीं बैठेंगे. ईरान ने इन हमलों की निंदा की है. जवाबी कार्रवाई की धमकी दी है. इससे युद्ध और बढ़ सकता है।
विशेषज्ञ कहते हैं कि ऐसे हमले ईरान की आर्थिक और सैन्य क्षमता पर दबाव डालते हैं. ईरान पहले से ही अमेरिका-इजराइल हमलों से जूझ रहा है. अब अगर खाड़ी देश भी शामिल हो गए, तो ईरान चारों तरफ से घिर जाएगा।
क्षेत्रीय सहयोग और भविष्य की चुनौतियां
यह घटना खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) देशों के बीच बढ़ते समन्वय को दिखाती है. सऊदी अरब, यूएई, बहरीन और कुवैत ईरान के विस्तारवाद से चिंतित हैं. युद्ध लंबा चलने से उनका तेल व्यापार प्रभावित हो रहा है, शिपिंग रूट असुरक्षित हो गए हैं और पर्यटन व निवेश पर असर पड़ रहा है।
UAE द्वारा खुफिया सहयोग और एयर कवर देना बडिंग अरब कॉपोरेशन का उदाहरण है. भविष्य में संयुक्त अभियान या साझा एयर डिफेंस सिस्टम बन सकते हैं. लेकिन चुनौतियां भी हैं – ईरान प्रॉक्सी के जरिए जवाब दे सकता है, जैसे इराक या यमन से हमले।
अमेरिका इन देशों का समर्थन कर रहा है, लेकिन खाड़ी देश अब खुद को मजबूत दिखाना चाहते हैं. वे नहीं चाहते कि युद्ध उनके देशों में फैल जाए. पहले मुख्य लड़ाई ईरान बनाम अमेरिका-इजरायल थी, अब अरब देश सीधे शामिल हो गए हैं. इससे ईरान पर दबाव बढ़ेगा, लेकिन क्षेत्रीय अस्थिरता भी बढ़ सकती है।
अरब देशों की यह कार्रवाई दिखाती है कि वे लंबे युद्ध के लिए तैयार हो रहे हैं. वे ईरान को कमजोर करने के लिए हर रास्ता आजमा रहे हैं. हालांकि, पूरी तरह से जंग से बचने की कोशिश भी जारी है, क्योंकि इससे पूरा खाड़ी क्षेत्र तबाह हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ऐसे हमले जारी रहे, तो ईरान को बातचीत की मेज पर आने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है. लेकिन फिलहाल दोनों पक्ष आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं।
















