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झारखंड की बंद खदानों में छिपा है ऊर्जा का खजाना, मीथेन गैस के उपयोग पर जोर

रांची  ग्लोबल वार्मिंग में कमी आ सकती है यदि हम मीथेन गैस का उपयोग करें। हमारे पास भी इसका भंडार है। हमारे पास भी इसका भंडार है, जिसका हम उपयोग नहीं कर पा रहे। हम बंद खदानों या खनन से पहले मीथेन गैस निकाल सकते हैं। इसका उपयोग वाहन, बिजली या अन्य जगहों पर इस्तेमाल…

झारखंड की बंद खदानों में छिपा है ऊर्जा का खजाना, मीथेन गैस के उपयोग पर जोर

रांची
 ग्लोबल वार्मिंग में कमी आ सकती है यदि हम मीथेन गैस का उपयोग करें। हमारे पास भी इसका भंडार है। हमारे पास भी इसका भंडार है, जिसका हम उपयोग नहीं कर पा रहे।

हम बंद खदानों या खनन से पहले मीथेन गैस निकाल सकते हैं। इसका उपयोग वाहन, बिजली या अन्य जगहों पर इस्तेमाल कर सकते हैं।

ये बातें आईआईटी बांबे के विजिटिंग प्रोफेसर डॉ. एके सिंह ने कही। वे शुक्रवार को होटल बीएनआर चाणक्या में राउंड टेबल कार्यक्रम में बोल रहे थे। कार्यक्रम में संयुक्त रूप से अशोका सेंटर फार ए पीपल-सेंट्रिक एनर्जी ट्रांजिशन (एसपेट), अशोका यूनिवर्सिटी और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी बांबे (आईआईटी बांबे) के अर्थ साइंसेज डिपार्टमेंट की सहभागिता रही।

हम माइनिंग से पहले भी मीथेन गैस निकाल सकते हैं और बंद खदानों से भी। इससे वायुमंडल की भी रक्षा हो सकेगी। धनबाद जिले में मुनीडीह खदान में कोल बेड मीथेन (सीबीएम) और कोल माइन मीथेन (सीएमएम) गैस के दोहन और व्यावसायिक उत्पादन पर कार्य चल रहा है।

एसपेट के डायरेक्टर वैभव चौधरी ने स्वागत करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नेट जीरों की बात कह रहे हैं। हमें इस दिशा में शोध करने की जरूरत है। कोयले का हम मल्टीपल उपयोग कर रहे हैं।

कोयले के अंदर मिल रहे मीथेन का हम उपयोग कर सकते हैं। हमें इस दिशा में शोध करने की जरूरत है। चीन, पोलैंड, यूएस इसका उपयोग कर रहे हैं। उनके सामने भी चुनौतियां थीं। उसे उन्होंने दूर किया और हमारे सामने भी है और हम भी इसे दूर कर सकते हैं।

इस दिशा में उन देशों के अनुभव और ज्ञान का लाभ हम ले सकते हैं। इसलिए, इस आयोजन में वैज्ञानिक-शोधार्थी, कोल इंडिया के अधिकारी शामिल हैं। आईआईटी बांबे के प्रोफेसर विक्रम विशाल ऑनलाइन जुड़े थे।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के एसोसिएट हेड-साइंटिस्ट डॉ नीलिमा आलम ने संबोधित किया। इसके बाद एक तकनीकी सत्र का संचालन रिसर्च मैनेजर डॉ. ऐश्वर्या रामचंद्रन ने किया। इस सत्र में उद्योग, अनुसंधान और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के प्रतिनिधियों ने अपने विचार साझा किए और फिर व्यापक चर्चा के लिए मंच खोला गया।

चर्चा में शामिल होने वालों में प्रभा एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड के अधिकारी, सोसाइटी आफ जियो साइंटिस्ट्स, झारखंड के डॉ अनल सिन्हा, सीएमपीडीआई के विनोद कुमार पांडे और बीके पांडे, यूएनइपी के इंटरनेशनल मीथेन एमिशन आब्जर्वेटरी के डॉ. कुशल टिबरेवाल, एंबर एनर्जी के राजशेखर मोदादुगु, ग्लोबल मीथेन हब की विद्वत्ता शर्मा और यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो के डॉ. उदयन सिंह ने भी विचार रखे।

मीथेन का उपयोग ही बेहतर: डॉ. अनल
कोल बेड मीथेन कोयले के किसी नए खनन में पाया जा सकता है जबकि कोल माइंस मीथेन किसी भी बंद माइंस में पाया जा सकता है। जो माइंस आज की तारीख में चल रहे हैं वहां भी मीथेन का रिसाव पाया जाता है।

झारखंड में उच्च रैंक का कोयला पाया जाता है, जिसके साथ में कोल बेड मीथेन गैस का जमाव रहता है। अगर इस गैस को समय और तकनीक से निकाल लिया जाए और इसे इस्तेमाल किया जाए तो ठीक है, अन्यथा यह हमारे वातावरण में जाकर वातावरण को अंशत: या पूर्णत: दूषित कर देता है।

इससे बचने का सर्वोत्तम उपाय यही है कि समय के साथ इस गैस के दोहन का भी इंतजाम कोयले के खनन से पूर्व कर लिया जाए।

धनबाद के बंद कोयल खदानों में नए तरीके से भारत सरकार ने कोयले के खनन की घोषणा की तथा इन कोयले के साथ अगर मीथेन गैस का भी दोहन किया जाए तो सरकार संबंधित एजेंसियों को कोयला मंत्रालय को दिए जाने वाले रेवेन्यू में 50 प्रतिशत छूट देगी।
डॉ. अनल सिन्हा, अध्यक्ष, झारखंड आई आई टी एलुमनी सोसाइटी।

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