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हरियाणा में फ्रीहोल्ड नीति पर मतभेद, आर्थिक बोझ के खिलाफ डटे मंत्री अनिल विज

अंबाला. अंबाला छावनी की 1065 एकड़ एक्साइज भूमि को फ्रीहोल्ड करने की पॉलिसी हरियाणा मंत्रिमंडल की बैठक में आई, लेकिन अंबाला छावनी से विधायक एवं परिवहन मंत्री अनिल विज के कड़े विरोध के बाद इसे मंजूरी नहीं मिल पाई। दशकों से इस जमीन पर काबिज हजारों परिवारों पर पड़ने वाले मोटे अतिरिक्त बोझ का विज…

हरियाणा में फ्रीहोल्ड नीति पर मतभेद, आर्थिक बोझ के खिलाफ डटे मंत्री अनिल विज

अंबाला.

अंबाला छावनी की 1065 एकड़ एक्साइज भूमि को फ्रीहोल्ड करने की पॉलिसी हरियाणा मंत्रिमंडल की बैठक में आई, लेकिन अंबाला छावनी से विधायक एवं परिवहन मंत्री अनिल विज के कड़े विरोध के बाद इसे मंजूरी नहीं मिल पाई।

दशकों से इस जमीन पर काबिज हजारों परिवारों पर पड़ने वाले मोटे अतिरिक्त बोझ का विज ने विरोध किया और तर्क दिया कि पॉलिसी बनाने वाले अधिकारी, मुख्यमंत्री और वे स्वयं इस बनाई गई नीति पर विचार विमर्श करें। उसके बाद इस नीति को लागू किया जाए। इस पर प्रदेश के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने भी सहमति जताई जिसके चलते यह पॉलिसी को हरी झंडी नहीं मिल पाई। अब इस पॉलिसी को लेकर विचार विमर्श किया जाएगा ताकि सौ प्रतिशत जनता इस पॉलिसी का लाभ उठा सके। लंबे समय से अंबाला छावनी को फ्रीहोल्ड करने की मांग उठ रही है। इस मांग पर जनता पर अतिरिक्त बोझ न पड़ जाए जिसका विरोध हो, इसलिए इस पर अध्ययन करने की मांग विज ने उठाई।

1065 एकड़ एक्साइज्ड एरिया का वर्षों पुराना मामला
अंबाला छावनी के 1065 एकड़ एक्साइज्ड एरिया की ओल्ड-ग्रांट और लीजहोल्ड संपत्तियों के स्वामित्व का मामला कई दशकों से लटका हुआ है। साल 1977 में कैंटोनमेंट बोर्ड से हटाकर जमीन नगर परिषद के अधीन कर दी गई थी। इस जमीन पर सरकारी कार्यालय भी बने हुए हैं। इस जमीन की खरीद फरोख्त जब भी होगी, उसका पचास प्रतिशत हिस्सा नगर परिषद विकास पर लगाएगा, जबकि बाकी पचास प्रतिशत बोर्ड के खाते में जाएगा। हजारों परिवारों को मालिकाना हक नहीं मिल सका। लोगों के पास रजिस्ट्रियां भी हैं, लेकिन जमीन की मालिक आज भी सरकार है। लोगों के पास जो रजिस्ट्रियां हैं वे मलबे की हैं। लोगों को जमीन का मालिकाना हक भी मिले, इसके लिए फ्रीहोल्ड को लेकर लंबे समय से मांग चली आ रही है।

कांग्रेस सरकार में भी मंत्रिमंडल बैठक से आगे नहीं बढ़ी पॉलिसी
अंबाला छावनी को फ्रीहोल्ड करवाने का अब का नहीं बल्कि लंबे समय से विचाराधीन है। कांग्रेस सरकार के दौरान भी फ्रीहोल्ड करने का मामला तूल पकड़ा था। बाकायदा इसकी पॉलिसी बनाई गई और मंत्रिमंडल की बैठक तक पहुंची। बताते हैं कि उस समय इस जमीन पर काबिज लोगों का कलेक्टर रेट इतना लगा दिया कि सरकार इसे लागू ही नहीं कर पाई। यानी कि कांग्रेस सरकार ने पॉलिसी तो बनाई, लेकिन लोगों के विरोध के डर के चलते लागू नहीं कर पाई। बताते हैं कि उस समय के कलेक्टर रेट सिर्फ बीस से पच्चीस प्रतिशत की राहत मिल रही थी। ऐसे में उस पॉलिसी का फायदा छावनी के महज पांच से दस प्रतिशत लोगों को हो रहा था, जिसके चलते यह लागू नहीं हो पाई। अब छावनी केा फ्रीहोल्ड करने की पॉलिसी फिर से बनाई है, जिसको लेकर अब अध्ययन किया जाएगा कि जनता पर बोझ ज्यादा न पड़े।

मुख्यमंत्री ने दिए पुनरीक्षण के निर्देश
मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने भी विज की आपत्तियों को गंभीरता से लिया। उन्होंने मुख्यमंत्री कार्यालय, शहरी स्थानीय निकाय विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों और मंत्री अनिल विज की संयुक्त बैठक बुलाकर पूरे मसौदे की समीक्षा करने के निर्देश दिए हैं। पॉलिसी में जो कलेक्टर रेट, शुल्क निर्धारण, पेनल्टी और अन्य तकनीकी प्रावधानों का जिक्र किया गया है, उस पर अध्ययन हैं कि जनता के हक में कितने हैं।

मालिकाना हक में कैंट को बाहर करने पर भी विराेध में आए थे विज
प्रदेश में दुकानों के किरायेदारों को मालिकाना हक देने की पॉलिसी लाकर राज्य सरकार ने बेहतरीन कार्य किया था। लेकिन अंबाला छावनी का इस पॉलिसी में जिक्र नहीं था। ऐसे में अंबाला छावनी से सात बार के विधायक अनिल विज इसके विरोध में आए और कहा कि अंबाला छावनी को भी इस पॉलिसी का हिस्सा बनाया जाए। उस समय के मुख्यमंत्री मनोहर लाल भी विज के समर्थन में आए थे और बाद में अंबाला छावनी के दुकानदारों को मालिकाना हक मिला था।

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