मेटा की एल्गोरिद्म गलती पर सवाल, अब चाहिए टेक कंपनियों से जवाबदेही

साल 2016 था. तारीख 8 सितंबर. नॉर्वे के बड़े अखबार Aftenposten के पहले पन्ने पर एक खुला खत छपा. यह खत Meta के CEO मार्क जुकरबर्ग के नाम था. इसमें अखबार के एडिटर ने लिखा था कि उन्हें डर है कि दुनिया का सबसे बड़ा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म अभिव्यक्ति की आजादी बढ़ाने के बजाय उसे…

मेटा की एल्गोरिद्म गलती पर सवाल, अब चाहिए टेक कंपनियों से जवाबदेही

साल 2016 था. तारीख 8 सितंबर. नॉर्वे के बड़े अखबार Aftenposten के पहले पन्ने पर एक खुला खत छपा. यह खत Meta के CEO मार्क जुकरबर्ग के नाम था. इसमें अखबार के एडिटर ने लिखा था कि उन्हें डर है कि दुनिया का सबसे बड़ा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म अभिव्यक्ति की आजादी बढ़ाने के बजाय उसे खत्म कर रहा है. और कई बार यह काम ऐसे तरीके से हो रहा है, जो किसी लोकतांत्रिक समाज के लिए ठीक नहीं है.

इस खत की वजह फेसबुक की एक बड़ी गलती थी. प्लेटफॉर्म ने वियतनाम युद्ध की एक मशहूर तस्वीर हटा दी थी. यह वही तस्वीर थी, जिसे पुलित्जर पुरस्कार मिला था. लेकिन फेसबुक के एल्गोरिद्म और ऑटोमैटिक फिल्टर ने उसे न्यूडिटी पॉलिसी का उल्लंघन मान लिया और पोस्ट डिलीट कर दी. जब इस फैसले पर दुनिया भर में सवाल उठे, तब फेसबुक ने माना कि उससे गलती हुई है. कंपनी ने कहा कि यह सब एक तकनीकी गड़बड़ी की वजह से हुआ.

अब साल 2026 है. तारीख 28 जुलाई. इस बार फेसबुक ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक वीडियो हटा दिया. वीडियो में ऐसा कुछ भी नहीं था, जिसे आपत्तिजनक कहा जा सके. लेकिन मेटा ने फिर वही जवाब दिया. कंपनी ने कहा कि यह एक तकनीकी गलती थी. दस साल का फर्क है. दोनों बार पोस्ट हटाई गई. दोनों बार बाद में वापस भी आ गई. और दोनों बार वजह बताई गई – तकनीकी गड़बड़ी.

यही मेटा का तरीका बन चुका है. कंपनी की ओर से जब भी कोई बड़ी गलती होती है, उसके पीछे एल्गोरिद्म या तकनीकी गड़बड़ी का बहाना सामने आ जाता है. सवाल यह है कि क्या हर बार यही जवाब काफी है? क्या दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियां सिर्फ सॉरी बोलकर अपनी जिम्मेदारी खत्म कर सकती हैं?

असल समस्या एल्गोरिद्म नहीं हैं. असली समस्या जवाबदेही की है. टेक कंपनियां लंबे समय से अपने प्रोडक्ट और सर्विस की जिम्मेदारी लेने से बचती रही हैं. वे नियमों के दायरे में काम करना कम पसंद करती हैं और अपने सिस्टम को एक ऐसे ब्लैक बॉक्स की तरह पेश करती हैं, जिसे कोई समझ नहीं सकता.

मार्क जुकरबर्ग ने फेसबुक के शुरुआती दिनों में एक मशहूर लाइन कही थी – 'Move fast and break things' यानी तेजी से आगे बढ़ो, चाहे रास्ते में कुछ टूटता ही क्यों न हो. सिलिकॉन वैली की सोच लंबे समय तक इसी लाइन के आसपास घूमती रही. पहले प्रोडक्ट लॉन्च करो, बाद में अगर गलती होगी तो देख लेंगे. लेकिन अब सवाल यह है कि जब इन प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल अरबों लोग कर रहे हैं, सरकारें कर रही हैं और दुनिया के बड़े नेता भी इन्हीं पर मौजूद हैं, तब क्या यही सोच सही मानी जा सकती है?

भारत के लिए प्रधानमंत्री मोदी के वीडियो वाला मामला एक मौका भी है. यह सिर्फ एक पोस्ट हटने का मामला नहीं है. यह इस बात पर बहस शुरू करने का मौका है कि क्या बड़ी टेक कंपनियों को अपने एल्गोरिद्म और ऑटोमैटिक सिस्टम के लिए भी जवाबदेह बनाया जाना चाहिए. पिछले कुछ सालों में टेक कंपनियों ने एल्गोरिद्म को एक ऐसे ब्लैक बॉक्स में बदल दिया है, जिसके अंदर क्या हो रहा है, इसकी जानकारी किसी को नहीं होती. एल्गोरिद्म इंसानों ने बनाए हैं, इंसान ही उन्हें ट्रेन करते हैं और लगातार बदलते भी हैं. लेकिन जब कोई सवाल पूछा जाता है, तो जवाब मिलता है कि यह तो एल्गोरिद्म का फैसला था.

ऐसे उदाहरण हर दिन देखने को मिलते हैं. ई-कॉमर्स वेबसाइट एक ही प्रोडक्ट अलग-अलग लोगों को अलग कीमत पर दिखाती हैं. वजह बताई जाती है – एल्गोरिद्म. Uber, Ola और Rapido कभी किराया बढ़ा देते हैं, कभी घटा देते हैं. इसके पीछे भी एल्गोरिद्म का हवाला दिया जाता है. इंस्टाग्राम पर कई लोगों के अकाउंट बिना किसी साफ वजह के सस्पेंड हो जाते हैं. जवाब मिलता है कि सिस्टम ने ऐसा किया. कई बार किसी अपमानजनक पोस्ट पर लाखों व्यूज आते रहते हैं और कोई कार्रवाई नहीं होती. वहीं दूसरी तरफ कोई सामान्य सवाल पूछने वाला यूजर भी अचानक बैन हो जाता है. वजह फिर वही – एल्गोरिद्म.

यानी एल्गोरिद्म अब सिर्फ यह तय नहीं कर रहे कि आपको कौन-सी पोस्ट दिखेगी. वे यह भी तय कर रहे हैं कि आपकी आवाज कितने लोगों तक पहुंचेगी, कौन दिखेगा, कौन नहीं दिखेगा और किसका अकाउंट चलता रहेगा. अब 2026 है. और ऐसा लगता है कि एल्गोरिद्म की इस दुनिया से किसी को छूट नहीं है. यहां तक कि किसी देश के प्रधानमंत्री का वीडियो भी इससे नहीं बच पाया.

इसीलिए अब सिर्फ माफी काफी नहीं है. Meta ने वीडियो वापस बहाल कर दिया है और माफी भी मांग ली है. आने वाले दिनों में यह भी हो सकता है कि खुद मार्क जुकरबर्ग भी माफी मांग लें. लेकिन भारत को बात सिर्फ माफी तक सीमित नहीं रखनी चाहिए.

भारत को जवाबदेही मांगनी चाहिए. यह पूछना चाहिए कि आखिर ऐसा हुआ कैसे? एल्गोरिद्म किस आधार पर फैसला लेते हैं? तकनीकी गड़बड़ी कितनी बार हो सकती है? और जब ऐसी गलती होती है, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी? अगर हर बार एल्गोरिद्म और टेक्निकल ग्लिच ही बचने का रास्ता बन जाएंगे, तो जवाबदेही का कोई मतलब नहीं बचेगा.

 

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