Farakka Treaty: सिंधु जल संधि के बाद अब गंगा जल बंटवारे पर बांग्लादेश की नजर, दिसंबर 2026 में खत्म होगा समझौता

नई दिल्ली बीते साल पहलगाम में आतंकवादी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान से साथ सिंधु जल संधि से दूरी बना ली. एक तरह से भारत ने इस संधि को अपनी तरफ से सस्पेंड कर दिया. इस कारण पाकिस्तान गर्मियों में प्यासे रहने को मजबूर हो गया है. वह तिलमिलाया हुआ है और अंतरराष्ट्रीय मंचों…

Farakka Treaty: सिंधु जल संधि के बाद अब गंगा जल बंटवारे पर बांग्लादेश की नजर, दिसंबर 2026 में खत्म होगा समझौता

नई दिल्ली

बीते साल पहलगाम में आतंकवादी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान से साथ सिंधु जल संधि से दूरी बना ली. एक तरह से भारत ने इस संधि को अपनी तरफ से सस्पेंड कर दिया. इस कारण पाकिस्तान गर्मियों में प्यासे रहने को मजबूर हो गया है. वह तिलमिलाया हुआ है और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के खिलाफ प्रोपेगेंडा में लगा हुआ है. इस बीच कुछ ऐसा ही डर अब बांग्लादेश को सताने लगा है. वैसे भी अगस्त 2024 में बांग्लादेश से शेख हसीना सरकार के हटने के बाद यह पड़ोसी कुछ ज्यादा ही फड़फड़ा रहा है. वहां की मौजूदा सरकार और इससे पहले अंतरिम सरकार के मुखिया रहे मोहम्मद यूनिस ने भारत से नफरत की सारी हदें पार कर दी. यह मुल्क इस वक्त चीन और पाकिस्तान की गोद में बैठकर भारत के लिए मोहरा बन रहा है. लेकिन, इस वक्त वह एक कड़वी सच्चाई का सामना कर रहा है. यह सच्चाई है गंगा नदी जल बंटवारे को लेकर हुई फरक्का संधि. इस संधि की मियाद इसी साल दिसंबर में पूरी हो रही है. भारत ने इस संधि में एक पड़ोसी होने के नाते बांग्लादेश को कई तरह की रियायत दी थी. लेकिन, अगर भारत इस मौजूदा संधि के प्रावधानों को कड़ाई से लागू कर दे तो गर्मियों के सीजन में बांग्लादेश को छठी का दूध याद आ जाएगा. इसी कारण वहां के हुक्मरान अब पाकिस्तान की तरह ही तिलमिलाए हुए हैं। 

दिसंबर में खत्म हो रही है 30 साल पुरानी संधि
भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल बंटवारे को लेकर 12 दिसंबर 1996 को समझौता हुआ था. इसे आम तौर पर गंगा जल बंटवारा संधि या फरक्का संधि कहा जाता है. यह 30 साल के लिए हुई थी और दिसंबर 2026 में इसकी अवधि खत्म हो रही है. यही वजह है कि इस समय दोनों देशों के बीच इस समझौते को लेकर बातचीत बेहद अहम हो गई है. इस संधि के तहत फरक्का पर जनवरी से मई के बीच गंगा के पानी का बंटवारा किया जाता है. यानी वह समय जब नदी का प्राकृतिक बहाव कम हो जाता है और पानी की सबसे ज्यादा जरूरत होती है. भारत और बांग्लादेश दोनों के लिए यह महज पानी का समझौता नहीं है. यह खेती, पीने के पानी, मछली पालन, नदी परिवहन और पर्यावरण से जुड़ा मामला है 

असली डर पानी कम होना
बांग्लादेश की सबसे बड़ी चिंता यह है कि अगर गंगा का बहाव ही कम हो गया तो उसे मिलने वाला पानी भी कम हो सकता है. 1996 की संधि में पानी के बंटवारे के लिए एक फॉर्मूला बनाया गया है. अगर फरक्का पर पानी का बहाव 70 हजार क्यूसेक या उससे कम है तो दोनों देशों के बीच पानी बराबर बांटा जाता है. 70 हजार से 75 हजार क्यूसेक के बीच होने पर बांग्लादेश को 35 हजार क्यूसेक मिलता है. वहीं 75 हजार क्यूसेक से ज्यादा बहाव होने पर भारत को 40 हजार क्यूसेक मिलता है और बाकी पानी बांग्लादेश को जाता है. लेकिन यहां एक पेंच है. इस समझौते में बांग्लादेश के लिए किसी स्थायी न्यूनतम जल-गारंटी का प्रावधान नहीं है. यही बात आज ढाका को सबसे ज्यादा परेशान कर रही है. बांग्लादेश के जल संसाधन मंत्री भी कह चुके हैं कि नई संधि में गारंटी क्लॉज की जरूरत है और उनका देश ज्यादा पानी हासिल करना चाहता है। 

1977 की संधि में था गारंटी क्लॉज
यही वह बात है जो बांग्लादेश को पुराने समझौते की याद दिला रही है. 1977 में भारत और बांग्लादेश के बीच पांच साल के लिए पानी बांटने का समझौता हुआ था. उसमें बांग्लादेश के लिए एक न्यूनतम गारंटी क्लॉज था. इस प्रावधान के तहत कम बहाव की स्थिति में भी एक न्यूनतम मात्रा सुनिश्चित करने की व्यवस्था थी. लेकिन 1996 की 30 साल वाली संधि में ऐसा कोई स्थायी न्यूनतम गारंटी क्लॉज नहीं रखा गया. अब बांग्लादेश चाहता है कि नई संधि में उसकी इस मांग को शामिल किया जाए. वहां के जल संसाधन मंत्री ने अगस्त 2026 में साफ कहा कि ढाका मौजूदा समझौते को फिर से बातचीत के जरिए बदलना चाहता है और जरूरत पड़ने पर अंतरराष्ट्रीय मंचों का रुख भी कर सकता है। 

भारत के लिए फरक्का क्यों महत्वपूर्ण है?
अब सवाल है कि आखिर फरक्का को लेकर इतना विवाद क्यों है? भारत ने पश्चिम बंगाल में फरक्का बैराज का निर्माण किया था. इसका मकसद गंगा के पानी का एक हिस्सा हुगली नदी की ओर मोड़ना था. इससे कोलकाता बंदरगाह में जमा गाद को हटाने और नदी की नौवहन क्षमता बनाए रखने में मदद मिलने की उम्मीद थी. लेकिन गंगा भारत से निकलकर बांग्लादेश भी जाती है. वहां यही नदी पद्मा के नाम से जानी जाती है. इसलिए फरक्का से पानी मोड़े जाने का असर नीचे की ओर बांग्लादेश तक पहुंचता है. यही वजह है कि ढाका लंबे समय से फरक्का को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर करता रहा है। 

भारत ने खुद को सिंधु जल संधि से अलग कर लिया है. इस कारण पाकिस्तान तिलमिलाया हुआ है। 

बांग्लादेश को गर्मियों में क्यों लगता है सबसे ज्यादा डर?
गर्मी और सूखे के महीनों में गंगा का प्राकृतिक बहाव पहले ही कम हो जाता है. ऐसे में पानी की मांग बढ़ती है. बांग्लादेश के लिए इसका असर सिर्फ नदियों तक सीमित नहीं है. कम पानी का मतलब सिंचाई पर असर, मछलियों और जलीय जीवों पर असर और दक्षिण-पश्चिमी हिस्सों में समुद्री खारे पानी के ऊपर आने का खतरा भी बढ़ना है. बांग्लादेशी विशेषज्ञों का कहना है कि गंगा के कम प्रवाह का असर देश के बड़े हिस्से की कृषि और पर्यावरण पर पड़ रहा है. वहां की राजनीति में भी फरक्का लंबे समय से बेहद संवेदनशील मुद्दा रहा है. यानी ढाका को डर सिर्फ इस बात का नहीं है कि उसे कुछ हजार क्यूसेक पानी कम मिलेगा. डर यह है कि अगर आने वाले वर्षों में नदी का बहाव लगातार घटा तो मौजूदा फॉर्मूला उसके लिए और मुश्किल पैदा कर सकता है। 

अब बांग्लादेश क्यों बेचैन है?
यही वह सवाल है जो मौजूदा भारत-बांग्लादेश रिश्तों के बीच बेहद अहम हो जाता है. 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद दोनों देशों के संबंधों में तनाव बढ़ा. ऐसे माहौल में दिसंबर 2026 में गंगा जल संधि की मियाद खत्म होना ढाका के लिए बड़ी चिंता है. बांग्लादेश ने जून 2026 में नई संधि पर बातचीत के लिए भारत को प्रस्ताव भेजा था. अगस्त तक ढाका भारत के जवाब का इंतजार कर रहा था. दोनों देशों के बीच तकनीकी स्तर पर पानी की निगरानी और माप का काम जरूर हुआ है, लेकिन नई संधि का अंतिम स्वरूप अभी तय नहीं हुआ है. यानी असली बेचैनी यह है कि पुरानी संधि खत्म होने के बाद क्या होगा?

भारत के पास क्या विकल्प हैं?
भारत के सामने भी आसान स्थिति नहीं है. गंगा का पानी सिर्फ अंतरराष्ट्रीय मामला नहीं है. इसका सीधा संबंध उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों से भी है. ऊपरी इलाकों में पानी की अपनी जरूरतें हैं. सिंचाई, पीने के पानी और बाढ़ प्रबंधन से लेकर नदी के पर्यावरण तक कई मुद्दे जुड़े हैं. इसलिए नई संधि में भारत को अपने राज्यों की जरूरतों का भी ध्यान रखना होगा. बांग्लादेश ज्यादा पानी और न्यूनतम गारंटी चाहता है. भारत के लिए चुनौती यह है कि वह अपनी घरेलू जरूरतों और पड़ोसी देश की मांग के बीच संतुलन कैसे बनाए। 

पाकिस्तान से बांग्लादेश की तुलना कितनी सही?
यहां एक फर्क समझना जरूरी है. पाकिस्तान के मामले में भारत ने पहलगाम आतंकी हमले के बाद सिंधु जल संधि को एक तरह निलंबित (abeyance) में रखने का फैसला किया. यानी भारत-पाकिस्तान के बीच पहले से मौजूद जल समझौते पर राजनीतिक और कानूनी टकराव अलग स्तर का है. बांग्लादेश के मामले में फिलहाल ऐसी स्थिति नहीं है. भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल संधि अभी लागू है और उसके नवीनीकरण को लेकर प्रक्रिया चल रही है. लेकिन दोनों मामलों में एक समानता जरूर है. पानी अब सिर्फ पानी नहीं रहा. यह कूटनीति, सुरक्षा और राष्ट्रीय हित का हथियार बन चुका है. पाकिस्तान ने इसका असर महसूस किया है। 

भारत अगर कड़ा रुख अपनाए तो क्या होगा?
यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि भारत नई संधि में बांग्लादेश को कम पानी देगा. बल्कि दोनों देशों के बीच बातचीत का रास्ता खुला है और तकनीकी स्तर पर काम भी हो रहा है. लेकिन इतना जरूर है कि अगर नई संधि पर सहमति नहीं बनती और मौजूदा व्यवस्था दिसंबर में खत्म हो जाती है तो दोनों देशों के सामने एक नई स्थिति पैदा होगी. बांग्लादेश के लिए यह ज्यादा मुश्किल इसलिए होगी क्योंकि गंगा उसके लिए बेहद महत्वपूर्ण नदी है. वहां के अधिकारियों ने खुद माना है कि मौजूदा संधि खत्म होने से पहले नया समझौता होना जरूरी है। 

About the Author

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

About the Author

GoodDoo News

Your trusted source for unbiased, timely news. We cover national and global updates, politics, business, social issues, and inspiring stories. Stay informed with accurate reporting and impactful stories that matter.

Search the Archives

Access over the years of investigative journalism and breaking reports