पटना
बाढ़ में पूरी फसल बर्बाद हो जाने के बाद क्राप कटिंग एक्सपेरिमेंट (सीसीई) नहीं होने का हवाला दे प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का दावा रोकना बीमा कंपनी को महंगा पड़ा। जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने इसे सेवा में कमी व अनुचित व्यापार व्यवहार माना है।
आयोग ने एग्रीकल्चर इंश्योरेंस कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड को किसान राजेंद्र शर्मा को 88,788 रुपये फसल क्षतिपूर्ति, आठ प्रतिशत के बजाय 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज, मानसिक प्रताड़ना के लिए 40 हजार और मुकदमे के खर्च के लिए 20 हजार रुपये देने का आदेश दिया है।
तीन माह में भुगतान नहीं करने पर पूरी राशि पर 15 प्रतिशत वार्षिक दंडात्मक ब्याज के साथ 10 हजार रुपये अतिरिक्त निष्पादन खर्च भी देना होगा। 8 सितंबर 2026 को अध्यक्ष प्रेम रंजन मिश्रा और सदस्य राजनिश कुमार की पीठ ने फैसला सुनाया।
पुनपुन थाना क्षेत्र के पुनाढ़ी गांव निवासी वरिष्ठ नागरिक किसान राजेंद्र शर्मा ने खरीफ 2016 में धान की फसल का प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत बीमा कराया था। किसान क्रेडिट कार्ड से 887.88 रुपये प्रीमियम जमा किया था। बाढ़ में पुनाढ़ी व सबलपुर पंचायत की पूरी फसल नष्ट हो गई।
जिला कृषि पदाधिकारी समेत संबंधित विभागों की रिपोर्ट में भी बाढ़ से फसल बर्बाद होने की पुष्टि की गई थी। बावजूद इसके बीमा कंपनी ने यह कहते हुए भुगतान करने से मना कर दिया कि संबंधित क्षेत्र का वैध क्राप कटिंग डाटा उपलब्ध नहीं है।
किसान ने 19 नवंबर 2018 को जिला उपभोक्ता आयोग में शिकायत दाखिल की थी। उन्होंने 4.79 लाख रुपये फसल नुकसान का दावा किया था। सुनवाई में बीमा कंपनी ने सीसीई के आधार पर दावा निस्तारित करने की शर्त का हवाला दिया।
इस पर आयोग ने स्पष्ट किया कि जब फसल पूरी तरह पानी में डूबकर नष्ट हो गई हो तो क्राप कटिंग करना व्यावहारिक ही नहीं है। ऐसी स्थिति में केवल सीसीई डाटा नहीं होने से किसान का दावा रोकना फसल बीमा योजना के उद्देश्य को ही निष्फल कर देगा।
आयोग ने किसान द्वारा जमा 887.88 रुपये प्रीमियम के 100 गुना यानी 88,788 रुपये को फसल क्षतिपूर्ति के रूप में निर्धारित किया।
डूबी फसल की क्राप कटिंग संभव नहीं
आयोग ने कहा कि किसान की फसल बाढ़ में पूरी तरह नष्ट हो गई थी। सरकारी अधिकारियों की रिपोर्ट से भी इसकी पुष्टि हुई। ऐसे में खेत में फसल बची ही नहीं थी तो क्राप कटिंग कराकर नुकसान का आकलन करना संभव नहीं था।
















