विजय माल्या की मुश्किलें बरकरार, ₹10,270 करोड़ की वसूली के बाद भी ₹8,752 करोड़ बाकी

नई दिल्ली भगोड़ा कारोबारी विजय माल्या (Vijay Malya) फिर से एक बार चर्चा में हैं। इस बार भी वो अपनी कर्ज के बकाया राशि को लेकर सुर्खियों में हैं। इकनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की अगुवाई वाले कंसोर्टियम ने बॉम्बे हाईकोर्ट में जानकारी दी है कि अगस्त तक विजय माल्या…

विजय माल्या की मुश्किलें बरकरार, ₹10,270 करोड़ की वसूली के बाद भी ₹8,752 करोड़ बाकी

नई दिल्ली
भगोड़ा कारोबारी विजय माल्या (Vijay Malya) फिर से एक बार चर्चा में हैं। इस बार भी वो अपनी कर्ज के बकाया राशि को लेकर सुर्खियों में हैं। इकनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की अगुवाई वाले कंसोर्टियम ने बॉम्बे हाईकोर्ट में जानकारी दी है कि अगस्त तक विजय माल्या के ऊपर ₹8,752 का भुगतान बाकि था। इससे पहले माल्या ने दावा किया था कि देश की वित्तीय संस्थाओं ने उनसे सभी बकाया राशि वसूल कर ली है। बता दें, विजय माल्या इस समय भारत में नहीं है।

कैसे आया यह मामला सामने
बंद हो चुकी एयरलाइन और यूनाइटेड ब्रुअरीज ग्रुप के चेयरमैन रह चुके विजय माल्या ने 2020 में बॉम्बे हाई कोर्ट में एक अर्जी डाली। इसमें उन्होंने कोर्ट से अपने खिलाफ चल रहे आपराधिक मामलों को खत्म करने की अपील की थी। अपने बचाव में विजय माल्या की तरफ से कहा गया था कि उनके और लोन देने वाले संस्थाओं के बीच एसेट रिकवरी के बाद विवाद खत्म हो गया है। इसी मामले में कोर्ट में बकाया राशि से जुड़ी जानकारी सामने आई।

कोर्ट की तरफ से मिले निर्देश के बाद बैंकों ने जो डॉक्यूमेंट्स जमा करवाए हैं, उसके अनुसार डेट रिकवरी ऑफिसर ने 10,270 करोड़ रुपये अस्थायी वसूले हैं। ट्रिब्यूनल में कार्यवाही शुरू होने से पहले 544.58 करोड़ रुपये वसूले गए थे। इस रिकवरी के बाद भी अब भी बड़ी राशि का भुगतान होना बाकी है।

डॉक्यूमेंट्स के अनुसार जनवरी 2026 तक माल्या के ऊपर 8135.63 करोड़ रुपये की राशि बकाया थी। इसमें लीगल फीस और अन्य खर्चों को अगर जोड़ दिया जाए तो राशि 8756.86 करोड़ रुपये अगस्त के अंततक पहुंच जाती है।

ईडी का क्या कहना है?
प्रवर्तन निदेशालय ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 14132 करोड़ रुपये की कुल रिकवरी हो चुकी है। लेकि ईडी ने हाई कोर्ट से कहा है कि सिविल रिकवरी से PMLA एक्ट खत्म नहीं होते हैं। वहीं, विजय माल्या की दलील है कि अगर रिकवरी मूल कर्ज से ज्यादा हो जाए तो मामले को बंद कर देना चाहिए।

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