बालाघाट
मध्य प्रदेश का लांजी क्षेत्र अब महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ से आने वाले वन्यजीवों के लिए महत्वपूर्ण प्राकृतिक रास्ता बनता जा रहा है। पश्चिम लांजी सामान्य वन क्षेत्र के जंगलों से होकर वन्यजीव नवेगांव-नगझीरा अभयारण्य और कान्हा टाइगर रिजर्व के बीच आवाजाही कर रहे हैं। महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ की सीमा से लगे कट्टीपार के जंगल इस प्राकृतिक वन्यजीव गलियारे की अहम कड़ी बनकर उभरे हैं।
लांजी से पश्चिम दिशा में नवेगांव-नगझीरा अभयारण्य करीब 80 किलोमीटर और पूर्व में कान्हा टाइगर रिजर्व करीब 100 किलोमीटर दूर है। दोनों बड़े वन क्षेत्रों के बीच मौजूद लगातार फैला जंगल वन्यजीवों को सुरक्षित आवाजाही का प्राकृतिक रास्ता उपलब्ध कराता है।
हाथी ने 15 दिन तक किया विचरण
अप्रैल 2026 में छत्तीसगढ़ की ओर से आया एक हाथी कट्टीपार के रास्ते बालाघाट पहुंचा था। हाथी ने किरनापुर और हट्टा क्षेत्र के जंगलों में करीब 15 दिन तक विचरण किया। इसके बाद वह उकवा के जंगलों से होते हुए कान्हा की दिशा में चला गया।यह इस गलियारे से हाथियों की आवाजाही का पहला मामला नहीं है। वर्ष 2022 में भी इसी रास्ते से तीन हाथियों के गुजरने की जानकारी सामने आई थी।
नवेगांव-नगझीरा की बाघिन भी पहुंची थी लांजी
वन्यजीवों की आवाजाही का एक और उदाहरण वर्ष 2025 में सामने आया, जब नवेगांव-नगझीरा अभयारण्य की एक बाघिन लांजी-किरनापुर क्षेत्र में पहुंची। बाघिन करीब एक महीने तक इस इलाके के जंगलों में विचरण करती रही और इसके बाद वापस लौट गई।इन घटनाओं से संकेत मिलता है कि यह क्षेत्र अलग-अलग वन क्षेत्रों के बीच वन्यजीवों के प्राकृतिक आवागमन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
23 बीटों में बाघ से लेकर बायसन तक मौजूद
दक्षिण सामान्य वन मंडल बालाघाट के पश्चिम लांजी सामान्य वन क्षेत्र का विस्तार करीब 23 हजार हेक्टेयर में है। यहां 23 बीट हैं, जिनमें बाघ, तेंदुआ, बायसन और भालू समेत कई वन्यजीवों की मौजूदगी दर्ज की जाती है।
लांजी और महाराष्ट्र की सीमा के बीच से बाघ नदी बहती हुई किरनापुर क्षेत्र की ओर आती है। नदी के दोनों तरफ जंगल होने के कारण गर्मी के मौसम में जब पानी के स्रोत सीमित होते हैं, तब नवेगांव-नगझीरा क्षेत्र के वन्यजीव नदी पार कर इस ओर आ जाते हैं।
कुछ यहीं बना लेते हैं ठिकाना
वन विभाग के अनुसार, दूसरे वन क्षेत्रों से आने वाले वन्यजीव इस इलाके में कई दिनों तक विचरण करते हैं। इनमें से कुछ वापस अपने पुराने क्षेत्र में लौट जाते हैं, जबकि कुछ लंबे समय तक इसी क्षेत्र में बने रहते हैं।
पश्चिम लांजी सामान्य के वन परिक्षेत्र अधिकारी सपन ताम्रकार के मुताबिक, कान्हा और नवेगांव-नगझीरा के बीच पश्चिम लांजी सामान्य का जंगल प्राकृतिक गलियारे की तरह काम कर रहा है। दोनों वन क्षेत्रों से वन्यजीवों की आवाजाही लगातार बनी रहती है।
बालाघाट बना बाघों का नया ठिकाना, बढ़ती संख्या से वन विभाग अलर्ट, 200 से ज्यादा टाइगर
मध्य प्रदेश को टाइगर स्टेट का दर्जा प्राप्त है. देश भर में साल 2014 से 2022 के बीच 65 प्रतिशत आबादी बढ़ी है. इसमें सिर्फ एमपी में 155 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई थी. ऐसे में एमपी टाइगर की संख्या एक हजार से ज्यादा हो गई है. इसमें अकेले में बालाघाट में अकेले 200 से ज्यादा बाघ होने की संभावना है. इसी बीच बालाघाट में बाघों की संख्या में इजाफा हुआ है।
दरअसल, बालाघाट के कान्हा पेंच कॉरिडोर यानी दक्षिण सामान्य वन मंडल में 18 बाघ और 27 तेंदुए दर्ज हुए है. ऐसे में एमपी को टाइगर स्टेट का दर्जा मिला हुआ है. लेकिन जितनी तेजी से बाघों की संख्या बढ़ रही है उतनी ही तेजी से बाघों और मानव के बीच संघर्ष भी बढ़ रहा है।
दक्षिण बालाघाट बना बाघों का आशियाना
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया और मध्य प्रदेश वन विभाग की नई रिपोर्ट में एक जानकारी सामने आई है. इस रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तर और दक्षिण बालाघाट के वन मंडलों में बड़े मांसाहारी वन्य जीवों की संख्या में इजाफा हुआ है. ऐसे में जिस इलाके को कान्हा नेशनल पार्क और पेंच नेशनल पार्क के बीच बाघों के गूजरने का गलियारा नहीं माना जाता है. वह अब सिर्फ एक रास्ता नहीं बल्कि बाघ, तेंदुआ और दूसरे वन्य प्राणियों का अहम इलाका भी बन गया है. दूसरी तरफ बाघों की बढ़ती आबादी और सिकुड़ता जंगल कई चिंताएं पैदा कर रहा है. इसमें सड़क निर्माण, माइनिंग, मानव-वन्य संघर्ष और बाघों की टेरिटोरियल फाइट भी शामिल है।
जानिए कितने बाघ और कितने तेंदुआ
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया और मध्य प्रदेश वन विभाग की नवंबर 2021 में दक्षिण बालाघाट के लालबर्रा और कटंगी वन क्षेत्रों में 71 कैमरा ट्रैप लगाए गए. इसमें कैमरों की मदद से 215 वर्ग किलोमीटर इलाके में 25 दिनों तक निगरानी रखी गई. इस दौरान बाघों के 262 और 154 फोटो मिले. इसी के आधार पर 18 अलग-अलग बाघ और 27 तेंदुए की पहचान हुई. इसके अलावा कैमरे ने 24 स्तनधारी प्रजातियों को भी कैद किया. इसमें भेड़िया, सियार, रीछ या स्लॉथ बेयर, गौर, सांभर, चीतल, नीलगाय, बार्किंग डियर और साही जैसी कई प्रजातियां शामिल है।
क्यों भा रहा बाघों को यह ठिकाना
बालाघाट को दो नेशनल पार्कों (कान्हा और पेंच) का कॉरिडोर कहा जाता है. दरअसल, जब बाघों की आबादी कम हुआ करती थी तब यहीं से बाघ गुजरते थे. बालाघाट सीसीएफ गौरव चौधरी ने बताया कि यह इलाका बाघों के प्रजनन के लिए अनुकूल वातारण मिलता गया. ऐसे में यहाँ पर आबादी भी बढ़ती गई. दूसरी तरफ यह पर बाघों के लिए शिकार और आराम की भी पर्याप्त व्यवस्था है. इसके अलावा जंगल और गांव पास-पास ही है. ऐसे में बाघों को आसान शिकार मिलते हैं. ऐसे में कॉरिडोर ही अब बाघों का ठिकाना बनता गया।
















