कुल्लू दशहरा की तैयारियां तेज, 347 देवी-देवताओं का होगा आगमन; आयोजन से पहले विवाद भी

कुल्लू। हिमाचल प्रदेश का प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा इस साल 21 से 27 अक्टूबर तक आयोजित किया जाएगा। सात दिवसीय उत्सव में 347 देवी-देवताओं और 20 देशों के कलाकारों को आमंत्रित किया गया है। आयोजन में पारंपरिक देव संस्कृति, लोक नृत्य और संगीत के साथ ड्रोन शो, लेजर शो तथा ग्लोबल डांस कार्यक्रम भी आकर्षण…

कुल्लू दशहरा की तैयारियां तेज, 347 देवी-देवताओं का होगा आगमन; आयोजन से पहले विवाद भी

कुल्लू।

हिमाचल प्रदेश का प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा इस साल 21 से 27 अक्टूबर तक आयोजित किया जाएगा। सात दिवसीय उत्सव में 347 देवी-देवताओं और 20 देशों के कलाकारों को आमंत्रित किया गया है। आयोजन में पारंपरिक देव संस्कृति, लोक नृत्य और संगीत के साथ ड्रोन शो, लेजर शो तथा ग्लोबल डांस कार्यक्रम भी आकर्षण का केंद्र रहेंगे। हालांकि, उत्सव शुरू होने से पहले देवताओं की प्रामाणिकता, कारदारों की भूमिका और बजंतरियों के नजराने के भुगतान को लेकर विवाद सामने आया है। देवताओं और कारदारों की प्रामाणिकता पर उठे सवाल देव संस्कृति चैरिटेबल संस्था के अध्यक्ष ओम प्रकाश शर्मा ने करीब 136 कारदारों और उनसे संबंधित देवी-देवताओं की प्रामाणिकता पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने दशहरा आयोजन समिति की कार्यप्रणाली पर भी आपत्ति जताई। उनका कहना है कि मौजूदा कार्यकारिणी का कार्यकाल 30 नवंबर 2024 को समाप्त हो चुका था, इसलिए इसके बाद लिए गए फैसलों की समीक्षा की जानी चाहिए।

दूसरी ओर, जिला देवी-देवता कारदार संघ के अध्यक्ष दोत राम ठाकुर ने इन आरोपों को खारिज किया है। उनके अनुसार, संघ में जिले के सभी 13 खंडों के कारदार शामिल हैं। गैर-माफीदार देवी-देवताओं को भी संविधान के तहत सदस्यता का अधिकार प्राप्त है।
दोत राम ठाकुर ने बताया कि 25 सितंबर 2026 को आयोजित जनरल हाउस में जिला और खंड कार्यकारिणियों का कार्यकाल सर्वसम्मति से 31 मार्च 2027 तक बढ़ाया गया। साथ ही, चुनाव 30 अप्रैल 2027 तक कराने का निर्णय लिया गया है।

बजंतरियों के नजराने के भुगतान पर भी मतभेद
कुल्लू दशहरे में देवी-देवताओं के साथ पारंपरिक वाद्य यंत्र बजाने वाले बजंतरियों को दिए जाने वाले नजराने को लेकर भी अलग-अलग मांगें सामने आई हैं। देव संस्कृति चैरिटेबल संस्था और बजंतरी संघ चाहते हैं कि उत्सव में हिस्सा लेने वाले प्रत्येक बजंतरी के बैंक खाते में पहले ही दिन भुगतान कर दिया जाए।

दोनों पक्षों का तर्क है कि बजंतरी लगातार सात दिनों तक अपनी सेवाएं देते हैं। इनमें कई लोग आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आते हैं। ऐसे में उत्सव समाप्त होने तक भुगतान का इंतजार करना उनके लिए परेशानी का कारण बन सकता है।
वहीं, कारदार संघ के अध्यक्ष दोत राम ठाकुर के मुताबिक, दशहरा उत्सव समिति के अध्यक्ष और विधायक सुंदर सिंह ठाकुर की मौजूदगी में कारदार संघ तथा बजंतरी संघ के बीच सहमति बनी है कि नजराने का भुगतान उत्सव के समापन पर किया जाएगा। संबंधित फार्म का सत्यापन कारदार करेंगे। भुगतान की प्रक्रिया को लेकर विभिन्न पक्षों के बीच सामने आए मतभेदों के मद्देनजर अंतिम नियमों और बैठक की कार्यवाही की पुष्टि महत्वपूर्ण होगी।

कुल्लू दशहरे में नहीं जलाए जाते रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले
कुल्लू दशहरा देश के अन्य हिस्सों में मनाए जाने वाले दशहरे से अलग परंपरा के लिए जाना जाता है। यहां विजयादशमी पर रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन नहीं किया जाता। इसके बजाय घाटी के देवी-देवता भगवान रघुनाथ जी के दर्शन और हाजिरी लगाने के लिए ढालपुर मैदान पहुंचते हैं।

इस साल उत्सव की शुरुआत 21 अक्टूबर को भगवान रघुनाथ जी की भव्य रथयात्रा से होगी। पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुनों के बीच देवी-देवताओं की शोभायात्रा निकाली जाएगी। इसके बाद देव मिलन, पारंपरिक जलेब और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होगा। उत्सव के अंतिम दिन ब्यास नदी के किनारे प्रतीकात्मक लंका दहन किया जाएगा।

इस बार पारंपरिक आयोजनों के साथ ड्रोन शो, लेजर शो और ग्लोबल डांस कार्यक्रम भी आयोजित किए जाने की तैयारी है।
विदेशी कलाकारों के साथ दिखेगी कुल्लवी संस्कृति की झलक
उत्सव समिति के अध्यक्ष एवं विधायक सुंदर सिंह ठाकुर के अनुसार, इस बार कुल्लू दशहरे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोक कला और संस्कृति के बड़े मंच के रूप में प्रस्तुत करने की योजना है।

कार्यक्रमों में पारंपरिक कुल्लवी नाटी, लालड़ी, लोक संगीत और पारंपरिक वेशभूषा को प्रमुखता दी जाएगी। इसके साथ कुल्लवी शॉल, हस्तशिल्प और स्थानीय कला को भी प्रदर्शित किया जाएगा। 20 देशों के कलाकारों की भागीदारी से सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
1660 के आसपास शुरू हुई थी दशहरे की परंपरा
कुल्लू दशहरे का इतिहास 17वीं शताब्दी में राजा जगत सिंह के शासनकाल से जुड़ा माना जाता है। लोकमान्यता के अनुसार, वर्ष 1651 में भगवान रघुनाथ जी की मूर्ति अयोध्या से कुल्लू लाई गई थी। इसके बाद भगवान रघुनाथ जी को कुल्लू रियासत का प्रमुख आराध्य मानते हुए दशहरा उत्सव की परंपरा विकसित हुई। इस आयोजन की शुरुआत सामान्यतः 1660 के आसपास मानी जाती है।
उत्सव में राजपरिवार के छड़ीबरदार की भूमिका और माता हिडिंबा की उपस्थिति भी विशेष महत्व रखती है। यहां की देव परंपरा, धार्मिक मान्यताएं और पारंपरिक रीति-रिवाज इस उत्सव को देश के अन्य दशहरा आयोजनों से अलग पहचान देते हैं।
ड्रोन, पैराग्लाइडिंग और हॉट एयर बैलून पर प्रतिबंध
कुल्लू दशहरे के दौरान सुरक्षा व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए उत्सव क्षेत्र और आसपास ड्रोन उड़ाने, पैराग्लाइडिंग करने तथा हॉट एयर बैलून जैसी हवाई गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाया गया है। इन गतिविधियों के संचालन के लिए पुलिस अधीक्षक कुल्लू से पहले लिखित अनुमति लेना अनिवार्य बताया गया है।
प्रशासन की ओर से सुरक्षा नियमों का पालन सुनिश्चित करने पर जोर दिया जा रहा है, ताकि धार्मिक आयोजन और सांस्कृतिक कार्यक्रम शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हो सकें।

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