850 लोकसभा सीटों के प्रस्ताव पर क्यों फंसा पेंच? समझें पूरा सियासी गणित

नई दिल्ली लोकसभा की सीटें बढ़ाने और महिला आरक्षण लागू करने के लिए लाए गए विधेयकों को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच टकराव एक बार फिर चर्चा में है। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने सोमवार को कहा कि सरकार संविधान संशोधन विधेयक और परिसीमन विधेयक को पारित कराने के लिए विपक्ष के साथ…

850 लोकसभा सीटों के प्रस्ताव पर क्यों फंसा पेंच? समझें पूरा सियासी गणित

नई दिल्ली

लोकसभा की सीटें बढ़ाने और महिला आरक्षण लागू करने के लिए लाए गए विधेयकों को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच टकराव एक बार फिर चर्चा में है। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने सोमवार को कहा कि सरकार संविधान संशोधन विधेयक और परिसीमन विधेयक को पारित कराने के लिए विपक्ष के साथ लगातार बातचीत करती रही है। उन्होंने सभी दलों से रचनात्मक सहयोग की अपील की। हालांकि, लोकसभा में सांसदों की संख्या बढ़ाने और निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं में बदलाव को लेकर विपक्षी दलों के रुख अलग-अलग हैं।

लोकसभा में सीटें बढ़ाने का प्रस्ताव क्यों अटका?
इस साल 17 अप्रैल को संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 लोकसभा में पारित नहीं हो सका था। इस विधेयक में लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या बढ़ाकर 850 करने और 2029 के आम चुनाव से पहले महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण लागू करने का प्रस्ताव था।

विधेयक के पक्ष में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े। हालांकि, संविधान संशोधन विधेयक पारित करने के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत नहीं मिलने के कारण यह गिर गया।

इसके बाद सरकार ने इससे जुड़े दो अन्य विधेयक भी वापस ले लिए। इनमें से एक में 2011 की जनगणना के उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर परिसीमन करने और दूसरे में केंद्र शासित प्रदेशों से संबंधित बदलाव करने का प्रस्ताव था।

गौरतलब है कि संसद ने 2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित किया था। हालांकि, इस कानून के तहत महिला आरक्षण लागू करने को नए परिसीमन की प्रक्रिया से जोड़ा गया है।

विपक्षी दलों से बातचीत का सरकार का दावा
किरेन रिजिजू ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को लिखे पत्र में उन आरोपों को खारिज किया कि सरकार ने विपक्ष की अनदेखी की या महत्वपूर्ण मुद्दों पर सहमति बनाने की कोशिश छोड़ दी।

उन्होंने कहा कि सरकार ने व्यापक सहमति बनाने और विधेयकों पर चर्चा के लिए कई विपक्षी दलों के प्रतिनिधियों से बातचीत की है। इनमें द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके), समाजवादी पार्टी, वाईएसआर कांग्रेस पार्टी, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, शिवसेना (यूबीटी), ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन और बीजू जनता दल शामिल हैं।

हालांकि, लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों को बरकरार रखने, महिलाओं के लिए आरक्षण लागू करने और परिसीमन के तरीके को लेकर इन दलों की चिंताएं अलग-अलग हैं।

कांग्रेस: मौजूदा 543 सीटों में ही मिले महिला आरक्षण
कांग्रेस का कहना है कि महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों में से ही दिया जाना चाहिए। पार्टी नेता राहुल गांधी का तर्क है कि संसद 2023 में ही महिला आरक्षण कानून पारित कर चुकी है, इसलिए इसे बिना देरी लागू किया जाना चाहिए।

चेन्नई में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम के दौरान राहुल गांधी ने लोकसभा की सीटें बढ़ाने के प्रस्ताव को तमिलनाडु पर हमला बताया था। उन्होंने कहा था कि कांग्रेस तमिलनाडु को लेकर मोदी सरकार को मनमानी नहीं करने देगी।

कांग्रेस ने लोकसभा की मौजूदा सीटों की संख्या पर 25 साल के लिए एक और रोक लगाने की मांग भी की है। इससे पहले इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में भी सीटों की संख्या में बढ़ोतरी रोकने के लिए ऐसे कदम उठाए गए थे।

समाजवादी पार्टी: जातिगत और आबादी के आंकड़ों के बिना परिसीमन पर सवाल
लोकसभा में 37 सांसदों वाली समाजवादी पार्टी ने इस साल परिसीमन से जुड़े विधेयक को गिराने में अहम भूमिका निभाई थी। भाजपा ने पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव से संपर्क किया है, लेकिन अप्रैल के बाद से उनके रुख में बदलाव के संकेत नहीं मिले हैं।

विपक्षी नेताओं का मानना है कि अगले साल की शुरुआत में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में समाजवादी पार्टी के भाजपा के प्रस्तावित विधेयक का समर्थन करने की संभावना कम है।

सपा का कहना है कि पर्याप्त आबादी और जातिगत आंकड़ों के बिना निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं बदलने से राजनीतिक प्रतिनिधित्व का संतुलन अनुचित तरीके से प्रभावित हो सकता है

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अखिलेश यादव ने सरकार के प्रस्ताव को जल्दबाजी में लाने पर भी सवाल उठाए हैं। उन्हें आशंका है कि इससे उत्तर प्रदेश का राजनीतिक नक्शा प्रभावित हो सकता है।

डीएमके: कांग्रेस और भाजपा, दोनों की नजर समर्थन पर
तमिलनाडु की सत्तारूढ़ राजनीति में अहम भूमिका निभाने वाली डीएमके ने अप्रैल में संविधान संशोधन विधेयक के खिलाफ मतदान किया था। हालांकि, तमिलनाडु में विजय के नेतृत्व वाली टीवीके सरकार को समर्थन देने के कांग्रेस के फैसले के बाद डीएमके ने कांग्रेस से संबंध तोड़ लिए। इसके बाद पार्टी के रुख को लेकर असमंजस बना हुआ है। लोकसभा में डीएमके के 22 सांसद हैं। भाजपा और कांग्रेस, दोनों की नजर पार्टी प्रमुख एमके स्टालिन के समर्थन पर है।

कांग्रेस नेताओं का कहना है कि डीएमके ने 12 अगस्त को तमिलनाडु विधानसभा में एक प्रस्ताव का समर्थन किया था। इसमें मोदी सरकार से लोकसभा की मौजूदा 543 सीटें बरकरार रखने और परिसीमन से जोड़े बिना महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण लागू करने की मांग की गई थी। वहीं, भाजपा के रणनीतिकारों का मानना है कि यदि डीएमके मतदान से दूर रहती है, तो सरकार और विपक्ष के बीच मतों का अंतर कम हो सकता है।

तृणमूल कांग्रेस: विधेयक का विरोध जारी, लेकिन पार्टी को झटका
अप्रैल में संविधान संशोधन विधेयक को गिराने में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी
) ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। कांग्रेस नेता राहुल गांधी के अंतिम समय में किए गए अनुरोध के बाद अभिषेक बनर्जी ने पार्टी के 28 में से 21 सांसदों को मतदान के लिए दिल्ली भेजने पर सहमति दी थी। इससे पहले विधानसभा चुनावों में व्यस्तता के कारण पार्टी ने केवल 10 सांसदों को भेजने की योजना बनाई थी।

हालांकि, राज्य विधानसभा चुनाव हारने के बाद टीएमसी को बड़ा झटका लगा। पार्टी के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसदों ने नेतृत्व के खिलाफ बगावत कर दी। इसके अलावा, पार्टी के अधिकतर विधायकों के भी बागी होने की बात सामने आई। इस घटनाक्रम से ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी की लोकसभा में ताकत और राजनीतिक प्रभाव काफी कम हुआ है। इसके बावजूद ममता बनर्जी संविधान संशोधन विधेयक का विरोध कर रही हैं और उन्होंने सभी विपक्षी दलों से इसे हराने की अपील की है।

शिवसेना (यूबीटी): विरोध कायम, लेकिन सांसदों की संख्या घटी
महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) भी विधेयक के विरोध में है। हालांकि, पार्टी के पास अब लोकसभा में केवल तीन सांसद हैं। पार्टी के छह सांसद अलग होकर एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल हो गए थे। शिंदे की पार्टी के पास लोकसभा में 13 सांसद हैं।

शरद पवार की एनसीपी: सभी राज्यों में समान अनुपात में बढ़ें सीटें
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी-शरदचंद्र पवार (एनसीपी-एसपी) ने विधेयक को समर्थन देने के संकेत दिए हैं। पार्टी का कहना है कि लोकसभा की सीटों में बढ़ोतरी सभी राज्यों में 50 फीसदी के अनुपात में होनी चाहिए।

पार्टी को आशंका है कि केवल आबादी के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण करने से उन राज्यों को नुकसान हो सकता है, जिन्होंने जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने में सफलता हासिल की है। इनमें खास तौर पर दक्षिण भारत के राज्य शामिल हैं। एनसीपी-एसपी नेता सुप्रिया सुले ने कहा है कि पार्टी अपना अंतिम रुख तय करने से पहले विपक्षी सहयोगियों के साथ इस प्रस्ताव पर चर्चा करेगी।

वाम दल: लोकसभा की मौजूदा संख्या पर रोक जारी रखने के पक्ष में
लोकसभा में आठ सांसदों वाले वाम दल संविधान संशोधन विधेयक का पूरी तरह विरोध कर रहे हैं। इनमें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के दो, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के चार और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन के दो सांसद शामिल हैं। वाम दल चाहते हैं कि लोकसभा की मौजूदा सदस्य संख्या पर लगी रोक जारी रहे।

सीटों के पुनर्वितरण पर विपक्ष की चिंताएं अलग-अलग
लोकसभा की सदस्य संख्या बढ़ाने और परिसीमन को लेकर विपक्षी दलों के बीच मतभेद साफ नजर आते हैं। कांग्रेस और वाम दल मौजूदा सीटों की संख्या बरकरार रखने के पक्ष में हैं, जबकि समाजवादी पार्टी पर्याप्त आबादी और जातिगत आंकड़ों के बिना परिसीमन पर सवाल उठा रही है।

डीएमके ने भी मौजूदा सीटों में बदलाव किए बिना महिला आरक्षण लागू करने का समर्थन किया है। दूसरी ओर, एनसीपी-एसपी ने सभी राज्यों में सीटों की संख्या 50 फीसदी बढ़ाने का सुझाव दिया है। ऐसे में महिला आरक्षण लागू करने, लोकसभा की सदस्य संख्या बढ़ाने और परिसीमन के तरीके पर व्यापक राजनीतिक सहमति बनाना सरकार के सामने बड़ी चुनौती बनी हुई है।

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