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35 साल तक बिना अटेंडेंस रिकॉर्ड के मिलता रहा वेतन, B.U. में 275 करोड़ का मामला

भोपाल. बरकतउल्ला विश्वविद्यालय में कर्मचारियों की उपस्थिति के रिकॉर्ड को लेकर गंभीर लापरवाही सामने आई है। विश्वविद्यालय ने वर्ष 1988 से 2023 के बीच करीब 35 वर्षों तक शिक्षकों और गैर-शिक्षकीय कर्मचारियों की उपस्थिति का आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं रखा। इस अवधि में वेतन के रूप में करीब 275 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया। सूचना…

35 साल तक बिना अटेंडेंस रिकॉर्ड के मिलता रहा वेतन, B.U. में 275 करोड़ का मामला

भोपाल.

बरकतउल्ला विश्वविद्यालय में कर्मचारियों की उपस्थिति के रिकॉर्ड को लेकर गंभीर लापरवाही सामने आई है। विश्वविद्यालय ने वर्ष 1988 से 2023 के बीच करीब 35 वर्षों तक शिक्षकों और गैर-शिक्षकीय कर्मचारियों की उपस्थिति का आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं रखा।

इस अवधि में वेतन के रूप में करीब 275 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया। सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत मांगी गई जानकारी में यह खुलासा हुआ है। अब सवाल उठ रहे हैं कि जब कर्मचारियों की उपस्थिति का रिकॉर्ड ही उपलब्ध नहीं था, तो उनके काम पर आने और वेतन भुगतान को प्रमाणित करने का आधार क्या था। यह मामला विश्वविद्यालय के पूर्व विद्यार्थी धर्मेंद्र सिंह की ओर से लगाई गई आरटीआई के जवाब में सामने आया है। उन्होंने इस पूरे मामले में व्यवस्थागत गड़बड़ी की आशंका जताते हुए जांच की मांग की है। उनका सवाल है कि जब कर्मचारियों की उपस्थिति का रिकॉर्ड नहीं था, तो वेतन बिलों को किस आधार पर स्वीकृति दी। उन्होंने पूछा है कि क्या शिक्षकों की कक्षाओं में उपस्थिति, पढ़ाने का समय, अवकाश आवेदन और विभागीय रिपोर्टों की जांच की जाती थी या नहीं।

35 साल में पांच से बढ़कर 40 हुए शिक्षक
विश्वविद्यालय की स्थापना वर्ष 1970 में भोपाल विश्वविद्यालय के नाम से हुई थी। वर्ष 1988 में स्वतंत्रता सेनानी मोहम्मद बरकतुल्ला भोपाली के नाम पर इसका नाम बरकतुल्ला विश्वविद्यालय रखा गया। वर्ष 1988 में यहां पांच शिक्षकों का स्टाफ था, जबकि अब 20 विभागों में कुल 40 शिक्षक कार्यरत हैं। इसके अलावा 21 संविदा शिक्षक और करीब 250 अतिथि विद्वान भी सेवाएं दे रहे हैं। विश्वविद्यालय का सालाना व्यय लगभग 13 करोड़ रुपये बताया गया है।

वेतन बिलों को किसने किया प्रमाणित, इसकी भी होगी जांच
आरटीआई से मिली जानकारी के बाद मामला सामने आने पर विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार एसबी सिंह ने जांच कराने की बात कही है। उनका कहना है कि संबंधित अवधि उनके कार्यकाल से पहले की है, लेकिन मामला गंभीर है। इसकी अनदेखी नहीं की जाएगी और सभी पहलुओं की निष्पक्ष एवं पारदर्शी जांच कराई जाएगी। जांच में यह भी देखा जाएगा कि उपस्थिति रिकॉर्ड नहीं होने की स्थिति में वेतन बिलों को किस अधिकारी ने प्रमाणित किया और भुगतान के लिए कौन-सी प्रक्रिया अपनाई गई। वैकल्पिक रिकॉर्ड उपलब्ध थे या नहीं और नियमों का पालन हुआ या नहीं, इसकी भी पड़ताल की जाएगी। उल्लेखनीय है कि आरटीआइ से मिली जानकारी के बाद उठे सवालों के बीच विश्वविद्यालय ने पिछले वर्ष उपस्थिति दर्ज करने की व्यवस्था शुरू की थी।

वेतन भुगतान के आंकड़ों के मिलान की मांग
आरटीआई आवेदक ने करीब 275 करोड़ रुपये के वेतन भुगतान का पूरा हिसाब सार्वजनिक करने और संबंधित दस्तावेजों का मिलान कराने की मांग की है। उनका कहना है कि उपस्थिति का रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होने के बावजूद इतने वर्षों तक वेतन भुगतान की प्रक्रिया कैसे चलती रही, इसकी गहराई से जांच होनी चाहिए। अब विश्वविद्यालय प्रशासन की जांच से यह स्पष्ट होगा कि रिकॉर्ड नहीं रखने के लिए कौन जिम्मेदार था और भुगतान की प्रक्रिया में किन नियमों का पालन किया गया।

रिकॉर्ड की जांच करवाएंगे –
बीयू के नवनियुक्त कुलगुरु प्रोफेसर दीनदयाल बेदिया का इस मामले में कहना है कि उपस्थिति पंजी के रिकॉर्ड की जांच कराएंगे। वर्तमान में आनलाइन उपस्थिति दर्ज हो रही है इसकी भी मानिटरिंग करेंगे।

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