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देवा से नौचंदी तक, जानिए यूपी के उन मेलों की कहानी जो जोड़ते हैं सांझी संस्कृति के तार

लखनऊ उत्तर प्रदेश के पारंपरिक मेले किसी एक कालखंड या धर्म की उपज नहीं हैं। ये उस साझा इतिहास के जीवित दस्तावेज हैं, जिसे अवध की नफासत, ब्रज के अध्यात्म, पूर्वांचल के विमर्श और पश्चिमी यूपी की जिंदादिली ने सदियों तक अपने पसीने से सींचा है। बाजार और सोशल मीडिया की वर्चुअल दुनिया चाहे जितनी…

देवा से नौचंदी तक, जानिए यूपी के उन मेलों की कहानी जो जोड़ते हैं सांझी संस्कृति के तार

लखनऊ
उत्तर प्रदेश के पारंपरिक मेले किसी एक कालखंड या धर्म की उपज नहीं हैं। ये उस साझा इतिहास के जीवित दस्तावेज हैं, जिसे अवध की नफासत, ब्रज के अध्यात्म, पूर्वांचल के विमर्श और पश्चिमी यूपी की जिंदादिली ने सदियों तक अपने पसीने से सींचा है। बाजार और सोशल मीडिया की वर्चुअल दुनिया चाहे जितनी बड़ी हो जाए, ज़मीन से जुड़े इन मेलों में मिलने वाली आत्मीयता, विविधता और साझी विरासत का विकल्प आज भी किसी तकनीक के पास नहीं है।

साझी विरासत की जीवंत धुरी: उत्तर प्रदेश के पारंपरिक मेले
धूल उड़ाती पगडंडियां, आसमान छूते झूले, जलेबी की सोंधी खुशबू और लाउडस्पीकर पर गूंजती रागिनी व कव्वाली—उत्तर प्रदेश के पारंपरिक मेले किसी औपचारिक उत्सव से कहीं बढ़कर लोकजीवन की धड़कन हैं। डिजिटल युग, स्क्रीन संस्कृति और मॉल के बढ़ते प्रभाव के बीच भी प्रदेश के ऐतिहासिक मेले अपनी उस पहचान को मजबूती से थामे हुए हैं, जिसने सदियों से विभिन्न समाजों, आस्थाओं और क्षेत्रों को एक सूत्र में पिरो रखा है।

अवध की सूफी सरज़मीं से लेकर ब्रज के घाटों, पूर्वांचल के वैदिक संदर्भों और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक मैदानों तक फैले ये मेले भारत के 'साझा समाज' यानी गंगा-जमुनी तहज़ीब और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सबसे मजबूत स्तंभ हैं।

अवध का देवा शरीफ: 'जो रब है वही राम हैं' का संदेश
बाराबंकी जिले में स्थित देवा शरीफ का मेला केवल एक धर्म से जुड़ा कार्यक्रम नहीं है, बल्कि मानवीय सौहार्द का खुला मंच है। 19वीं सदी के सूफी संत हाजी वारिस अली शाह की मजार पर लगने वाला यह मेला हर साल कार्तिक के महीने में आयोजित होता है। वारिस पाक का फलसफा था—जो रब है वही राम हैं"।

यही वजह है कि यहां चादर चढ़ाने वालों में जितनी संख्या मुसलमानों की होती है, उतनी ही हिंदू श्रद्धालुओं की भी। मजार के अहाते से बाहर निकलते ही मेला मैदान में मुशायरे, सूफी संगीत और पारंपरिक दंगल की गूंज सुनाई देती है। अयोध्या, गोरखपुर, हरियाणा और पंजाब तक के पहलवान यहां अखाड़े में दो-दो हाथ करते हैं। खेल और कला का यह संगम बिना किसी धार्मिक भेदभाव के लोगों को एक मैदान में लाता है।

ब्रज का बटेश्वर मेला: यमुना तट पर शिव भक्ति और पशु व्यापार की थाती
आगरा जिले में यमुना के बीहड़ों के बीच बसा बटेश्वर धाम अपने 101 शिव मंदिरों की श्रृंखला के लिए देश भर में प्रसिद्ध है। कार्तिक पूर्णिमा पर लगने वाला बटेश्वर मेला धार्मिक श्रद्धा और उत्तर भारत के सबसे बड़े पशु हाट का अद्भुत मिश्रण है। बटेश्वर मेला पारंपरिक ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आईना है।

सदियों से यहां राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा और गुजरात से व्यापारी ऊंट, घोड़े, खच्चर और उन्नत नस्ल की गाय-भैंसों की खरीद-बिक्री के लिए पहुंचते हैं। एक तरफ यमुना में दीपदान और घंट-घड़ियाल की गूंज होती है, तो दूसरी तरफ तंबुओं के शहर में लोकगीत, आल्हा-ऊदल के गायन और स्थानीय हस्तशिल्प की दुकानें सजती हैं। यह मेला बताता है कि धर्म और आजीविका हमारे समाज में कभी अलग-अलग नहीं रहे।

पूर्वांचल का ददरी मेला: महर्षि भृगु की तपोभूमि पर गंगा-घाघरा का संगम
बलिया का ऐतिहासिक ददरी मेला पूर्वांचल की सांस्कृतिक पहचान है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महर्षि भृगु के शिष्य दर्दर मुनि द्वारा यज्ञ संपन्न कराने के उपलक्ष्य में यह मेला शुरू हुआ था। सोनपुर, बिहार के बाद इसे उत्तर भारत का दूसरा सबसे बड़ा मवेशी मेला माना जाता है।

ददरी मेला दो चरणों में संपन्न होता है—पहला 'नंदी ग्राम' और दूसरा 'मीना बाजार'। कार्तिक पूर्णिमा पर गंगा स्नान के बाद शुरू होने वाला यह मेला महीनों तक चलता है। इस मेले की सबसे बड़ी खासियत इसका 'भारतेंदु मंच' रहा है। 1884 में इसी मेले के मंच से भारतेंदु हरिश्चंद्र ने अपना ऐतिहासिक भाषण "भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है?" दिया था। आज भी यह मेला सिर्फ खरीद-बिक्री का केंद्र नहीं, बल्कि पूर्वांचल के किसानों, बुद्धिजीवियों और लोक कलाकारों के मिलने का साझा मंच है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का नौचंदी मेला: चंडी देवी और बाले मियां की साझी छांव
मेरठ का नौचंदी मेला शायद साझी विरासत का सबसे स्पष्ट और ऐतिहासिक प्रतीक है। होली के दूसरे रविवार से शुरू होने वाला यह ऐतिहासिक मेला करीब एक माह तक चलता है। नौचंदी के मैदान में एक तरफ नवचंडी देवी का प्राचीन मंदिर है, तो ठीक उसके सामने हज़रत बाले मियां (सैयद सालार मसूद गाजी के सिपहसालार) की दरगाह।

मंदिर के घंटों की आवाज और दरगाह की अज़ान यहां एक साथ फिजाओं में तैरती हैं। श्रद्धालु मंदिर में माथा टेकते हैं और दरगाह पर चादर पेश करते हैं। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यह मेला क्रांतिकारियों के गुप्त संदेशों के आदान-प्रदान और जनसंपर्क का प्रमुख केंद्र रहा था। आज भी यहां लगने वाला विशाल बाजार, मेरठ की कैंची, मुरादाबाद के पीतल के बर्तन और पारंपरिक हलवा-पराठा पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जीवनशैली को दर्शाता है।

आधुनिक दौर में इन पारंपरिक मेलों का स्वरूप भी बदला है। अब मिट्टी के खिलौनों के साथ इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स, डिजिटल यूपीआई बोर्ड और सुरक्षा के लिैमरे आम बात हो गए हैं। प्रशासन द्वारा 'स्वच्छ मेला' अभियानों के जरिए बुनियादी ढांचे को बेहतर किया गया है।

परिवहन के आधुनिक साधनों और डिजिटल ट्रेडिंग के चलते पारंपरिक पशु मेलों में मवेशियों की आवक पहले से घटी है। सिनेमा और स्मार्टफोन की पहुंच के कारण पारंपरिक नौटंकी, कठपुतली और स्वांग जैसी लोक विधाओं के कलाकारों को दर्शक जुटाने में संघर्ष करना पड़ रहा है।

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