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40 देशों की करेंसी और चांदी के 52 हाथी, रतलाम के महालक्ष्मी मंदिर की सजावट देख रह जाएंगे हैरान

रतलाम दीपावली पर देशभर में जहां मंदिरों को फूलों और रोशनी से सजाया जाता है, वहीं मध्य प्रदेश के रतलाम में एक ऐसा मंदिर है, जहां माता लक्ष्मी का दरबार भक्तों के रुपयों और सोने-चांदी के जेवरों से सजता है। माणकचौक स्थित श्री महालक्ष्मी मंदिर में इस बार भी करोड़ों रुपये के नोटों और आभूषणों…

40 देशों की करेंसी और चांदी के 52 हाथी, रतलाम के महालक्ष्मी मंदिर की सजावट देख रह जाएंगे हैरान

रतलाम

दीपावली पर देशभर में जहां मंदिरों को फूलों और रोशनी से सजाया जाता है, वहीं मध्य प्रदेश के रतलाम में एक ऐसा मंदिर है, जहां माता लक्ष्मी का दरबार भक्तों के रुपयों और सोने-चांदी के जेवरों से सजता है। माणकचौक स्थित श्री महालक्ष्मी मंदिर में इस बार भी करोड़ों रुपये के नोटों और आभूषणों से आकर्षक सजावट की जा रही है। नोटों के फूल, गुलदस्ते और वंदनवार तैयार किए जा रहे हैं। धनतेरस पर सुबह पूजा के बाद श्रद्धालु इस अनूठे शृंगार के दर्शन कर सकेंगे। खास बात यह है कि भक्तों की ओर से सजावट के लिए जमा कराए गए रुपये और जेवर बाद में उन्हें वापस कर दिए जाते हैं।

शरद पूर्णिमा से शुरू हुआ नोट जमा कराने का सिलसिला
रतलाम के माणकचौक क्षेत्र में स्थित प्राचीन श्री महालक्ष्मी मंदिर में दीपावली पर रुपयों और जेवरों से सजावट की परंपरा वर्षों से चली आ रही है। इस सजावट के लिए किसी एक संस्था की बजाय सैकड़ों श्रद्धालु अपनी ओर से नोटों की गड्डियां और आभूषण जमा कराते हैं।

शरद पूर्णिमा से ही मंदिर में सजावट के लिए नोट जमा करने का सिलसिला शुरू हो गया था। अब तक दो से तीन हजार श्रद्धालु एक रुपये से लेकर 500 रुपये तक के नोटों की गड्डियां जमा करा चुके हैं। 5 नवंबर की रात तक भक्तों से रुपये स्वीकार किए जा रहे हैं। गुरुवार को भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु नोटों की गड्डियां लेकर मंदिर पहुंचे।

देश के कई राज्यों से पहुंच रहे श्रद्धालु
मंदिर में केवल रतलाम और आसपास के क्षेत्रों के लोग ही नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश के दूसरे जिलों और देश के विभिन्न राज्यों से भी श्रद्धालु सजावट के लिए रुपये लेकर पहुंच रहे हैं। इनमें गुजरात, कर्नाटक, गोवा, राजस्थान, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों के भक्त शामिल हैं। कुछ श्रद्धालुओं ने विदेशी मुद्रा भी जमा कराई है।

मंदिर में नोटों से गमले, फूल, गुलदस्ते और वंदनवार तैयार किए जा रहे हैं। सजावट का काम देर रात तक जारी रहा। मंदिर के पुजारी अश्विन पुजारी के अनुसार, इस वर्ष भी मंदिर को नोटों और सोने-चांदी के आभूषणों से सजाया जा रहा है। पहले आम श्रद्धालुओं से भी जेवर लिए जाते थे, लेकिन अब कुछ चुनिंदा दुकानदारों से ही आभूषण लिए जाते हैं।

पांच दिन तक सजेगा दरबार, बाद में लौटेंगे रुपये और जेवर
धनतेरस पर 6 नवंबर 2026 को सुबह ब्रह्म मुहूर्त में मां महालक्ष्मी की पूजा की जाएगी। इसके बाद श्रद्धालु नोटों और जेवरों से सजे मंदिर में दर्शन कर सकेंगे। मंदिर पांच दिनों तक इसी तरह सजा रहेगा।

भाईदूज के बाद श्रद्धालुओं को उनके जमा कराए गए रुपये और जेवर लौटाने की प्रक्रिया शुरू होगी। मंदिर में जमा राशि और आभूषणों का पूरा हिसाब रखा जाता है। मान्यता है कि मंदिर में पूजा के बाद वापस मिली नोटों की गड्डी को घर की तिजोरी में रखने से बरकत और सुख-समृद्धि बनी रहती है।

कलाकार बोले- लड़ियां ऐसे बनाते हैं, नोट नहीं फटेंगे
शरद पूर्णिमा से 35 लोगों की टीम मंदिर की सजावट में जुटी है। यह टीम हर साल नोटों के वंदनवार और सजावट के नए रूप तैयार करती है। कलाकार कपिल श्रोत्रिय पिछले तीन साल से मंदिर में सेवा दे रहे हैं।

कपिल के मुताबिक, नोटों की लड़ियां बनाते समय पिन का इस्तेमाल नहीं किया जाता। नोटों को एक-एक पॉलिथीन में पैक किया जाता है, ताकि वे सुरक्षित रहें। नोट मोड़ने पर भी कटते-फटते नहीं हैं। पांच दिन बाद नोटों को प्लास्टिक से निकालकर श्रद्धालुओं को लौटा दिया जाता है।

नोटों के वंदनवार बनाने के लिए पिन का इस्तेमाल इसलिए नहीं करते, ताकि नोट खराब न हों। कई भक्त वही नोटों की गड्डियां दोबारा सजावट के लिए दे जाते हैं, जो पिछले साल जमा कराई थीं।

लड़ियां बनाने में रखते हैं सावधानी
कलाकार ऐश्वर्य सोमानी ने बताया कि नोटों की लड़ियां बनाते समय काफी सावधानी रखनी पड़ती है। नोटों में सुई की नोक के बराबर छेद किया जाता है। धागे भी बहुत बारीक रखे जाते हैं। ज्यादा दबाव डालने पर नोट फट सकते हैं, इसलिए उन्हें सावधानी से पिरोया जाता है।

ऐश्वर्य के मुताबिक, नोटों की क्वालिटी अच्छी होने से वे आमतौर पर फटते नहीं हैं। कुछ भक्त इन्हें घर ले जाकर पूजा में रखते हैं, जबकि कुछ नए नोटों को दोबारा बाजार में चलन में इस्तेमाल करते हैं।

वे बताते हैं कि वे लंबे समय से मंदिर से जुड़े हैं। पहले परिवार के बड़ों को नोटों की लड़ियां बनाते देखते थे। उन्हीं से यह काम सीखा। धीरे-धीरे अभ्यास बढ़ा और अब यह काम आसानी से कर लेते हैं।

पहली बार ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन की सुविधा
सजावट के लिए भक्तों से मिलने वाली राशि और जेवरों का पूरा रिकॉर्ड रखा जाता है। इसके लिए रजिस्टर में भक्तों का नाम, पता, फोटो और मोबाइल नंबर के साथ जमा की गई राशि और जेवरों की जानकारी दर्ज की जाती है।

इस बार पहली बार ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन की सुविधा भी शुरू की गई। कई भक्तों ने घर बैठे रजिस्ट्रेशन कराया और बाद में मंदिर पहुंचकर राशि जमा की। ऑनलाइन और ऑफलाइन, दोनों तरह के रजिस्ट्रेशन पर भक्तों को टोकन दिया जाता है। इस टोकन पर सील भी लगाई जाती है।

पांच दिन बाद भक्तों को उनकी जमा की गई राशि और जेवर वापस लौटा दिए जाते हैं। मान्यता है कि मां लक्ष्मी के दरबार में धनराशि और आभूषण रखने से घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है।

24 से ज्यादा CCTV कैमरों से निगरानी, सुरक्षा गार्ड तैनात
मंदिर की सजावट प्रशासन की निगरानी में की जाती है। रोजाना जमा होने वाली नकदी और आभूषणों का हिसाब भी अधिकारी रखते हैं। सुरक्षा के लिए बंदूकधारी गार्ड तैनात किए गए हैं। गर्भगृह से लेकर मंदिर परिसर तक 24 से ज्यादा CCTV कैमरों से निगरानी की जा रही है।

गणेश जी और सरस्वती के साथ विराजमान हैं महालक्ष्मी
मंदिर के गर्भगृह में महालक्ष्मी की मूर्ति के साथ गणेश जी और माता सरस्वती की मूर्तियां भी स्थापित हैं। महालक्ष्मी की मूर्ति के हाथ में धन की थैली है, जिसे वैभव का प्रतीक माना जाता है।

महालक्ष्मी यहां आठ रूपों में विराजमान हैं। इनमें आदि लक्ष्मी, धान्य लक्ष्मी, लक्ष्मीनारायण, धन लक्ष्मी, विजय लक्ष्मी, वीर लक्ष्मी, संतान लक्ष्मी और ऐश्वर्य लक्ष्मी शामिल हैं।

सुरक्षा के लिए 24 कैमरों से निगरानी
नोटों और जेवरों की बड़ी मात्रा को देखते हुए मंदिर में सुरक्षा के विशेष इंतजाम किए गए हैं। चार सुरक्षा गार्ड आठ-आठ घंटे की शिफ्ट में ड्यूटी कर रहे हैं। इसके अलावा पुलिस अधिकारी भी समय-समय पर सुरक्षा व्यवस्था का जायजा ले रहे हैं। मंदिर परिसर में 24 घंटे निगरानी के लिए 24 सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। पास में ही माणकचौक पुलिस थाना भी स्थित है।

ऑनलाइन टोकन से जमा हो रही श्रद्धालुओं की राशि
श्रद्धालुओं को लंबी कतारों से बचाने के लिए इस बार ऑनलाइन पंजीयन की व्यवस्था की गई है। भक्तों को ऑनलाइन फॉर्म में अपना नाम, मोबाइल नंबर, ई-मेल आईडी, शहर, राज्य, पिन कोड और पता दर्ज करना होता है। रजिस्ट्रेशन के बाद मिलने वाला नंबर मंदिर में दिखाने पर ऑपरेटर श्रद्धालु की जानकारी दर्ज कर राशि जमा करता है।
इसके बाद मोबाइल पर ओटीपी आता है। ओटीपी दर्ज होने पर टोकन जनरेट हो जाता है। टोकन की दो प्रतियां बनाई जाती हैं। एक श्रद्धालु के पास और दूसरी मंदिर समिति के पास रहती है। भाईदूज के बाद रुपये वापस लेते समय श्रद्धालु को अपना टोकन जमा कराना होगा। इसी के आधार पर जमा राशि लौटाई जाएगी।

धनतेरस से मिलेगी कुबेर पोटली
मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं को धनतेरस से कुबेर पोटली भी वितरित की जाएगी। बुधवार को विधि-विधान से पोटली का पूजन किया गया। धनतेरस की सुबह पांच बजे आरती के बाद इसका वितरण शुरू होगा, जो भाईदूज तक जारी रहेगा।
लाल कपड़े में दी जाने वाली इस पोटली में कमलगट्टा, कौड़ी, चावल, सुपारी, पिस्ता और गोमती चक्र रखे जाते हैं। मान्यता है कि इन सामग्रियों को मां लक्ष्मी को अर्पित करने से व्यापार में उन्नति और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है।

17 साल से मंदिर आ रहीं श्रद्धालु, पहली बार जमा कराए रुपये
शिक्षिका प्रियंका जोशी ने बताया कि वह पिछले 17 वर्षों से मंदिर में दर्शन करने आ रही हैं। उनकी मान्यता है कि मां लक्ष्मी के दरबार में नोटों की गड्डी जमा कराने और पूजा के बाद उसे घर की तिजोरी में रखने से बरकत बनी रहती है। 

व्यवसायी लोकेश मित्तल ने बताया कि वह अपने नोटों की गड्डी जमा कराने आए हैं, ताकि दीपावली पर मंदिर में उनके रुपयों की भी पूजा हो सके। वहीं, आदर्श द्विवेदी ने बताया कि उन्होंने मंदिर की इस परंपरा के बारे में काफी सुना था। इस बार पहली बार सजावट के लिए नोटों की गड्डी जमा कराई है। उन्होंने ऑनलाइन पंजीयन व्यवस्था को भी सुविधाजनक बताया। 

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