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अरहर की इस खास किस्म से होगी तगड़ी कमाई, शहडोल की रॉयल वेरायटी की बढ़ी मांग

शहडोल   खरीफ सीजन में मध्य प्रदेश के कई जिलों में धान की खेती जमकर की जाती है पर इन दिनों किसानों का झुकाव अरहर की फसल की ओर भी बढ़ा है. इसका सबसे बड़ा कारण है अरहर दाल की डिमांड. अरहर दाल खाने में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होती है, यही वजह है कि इस दाल…

अरहर की इस खास किस्म से होगी तगड़ी कमाई, शहडोल की रॉयल वेरायटी की बढ़ी मांग

शहडोल 
 खरीफ सीजन में मध्य प्रदेश के कई जिलों में धान की खेती जमकर की जाती है पर इन दिनों किसानों का झुकाव अरहर की फसल की ओर भी बढ़ा है. इसका सबसे बड़ा कारण है अरहर दाल की डिमांड. अरहर दाल खाने में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होती है, यही वजह है कि इस दाल को नगद वाली फसल या खटाखट पैसे दिलाने वाली फसल भी कहा जाता है. इस आर्टिकल में जानें कि कैसे इस दाल को उगाकर आप भी जमकर कमाई कर सकते हैं। 

कैसे करें अरहर दाल की खेती?
शहडोल के कृषि वैज्ञानिक डॉक्टर बीके प्रजापति बताते हैं, '' अगर आप अरहर की खेती करना चाहते हैं, तो यह प्रमुख तौर पर खरीफ के सीजन में इसे बोया जाता है. अरहर की फसल ऐसे क्षेत्र में बोई जाती है, जहां उचहन वाली जमीन हो, जल निकासी की खेत में अच्छी व्यवस्था हो और जल जमाव बिल्कुल भी न हो रहा हो, क्योंकि ज्यादा जल जमाव से फसल खराब हो जाती है. सबसे खास बात यह है कि इस फसल के लिए मिट्टी का पीएच लेवल 6.5 से 7.5 तक होना चाहिए। 

वे आगे कहते हैं, '' अरहर की खेती के लिए बलुई दोमट मिट्टी उपयुक्त मानी जाती है, हालांकि, जहां जल निकासी की अच्छी व्यवस्था हो, उपजाऊ जमीन हो वहां इसकी खेती की जा सकती है. अरहर की खेती के लिए 15 जून से 15 जुलाई के बीच में उपयुक्त समय माना जाता है। 

अरहर की खेती के लिए सबसे पहले ये करें
कृषि वैज्ञानिक आगे कहते हैं, '' सबसे पहले कल्टीवेटर से अच्छी तरह से खेतों की जुताई कर लें, और फिर उसके बाद रोटावेटर चला दें, जिससे खेत में जो खरपतवार हैं पूरी तरह से कट जाएगा, नष्ट हो जाएगा, और मिट्टी एकदम समतल हो जाएगी. इसके बाद 10 से 15 किलोग्राम के लगभग प्रति हेक्टेयर बीज बुवाई के लिए जरूरत पड़ती है. बुवाई से पहले बीज को कवकनाशी से अच्छी तरह से उपचारित कर लें, और कतार से 60 से 75 सेंटीमीटर की दूरी और पौधे से पौधे की दूरी 15 से 20 सेंटीमीटर रखें, जिससे फायदा होगा। 

खाद, खरपतवार और कीट प्रबंधन
वे आगे बताते हैं कि अरहर दाल एक ऐसी किस्म की फसल है, जिसमें ज्यादा देख रेख की जरूरत नहीं पड़ती, ना ही ज्यादा रासायनिक खाद की जरूरत पड़ती है, क्योंकि दलहनी फसल होने के कारण नाइट्रोजन की कम ही जरूरत पड़ती है. इसके लिए सड़ा हुआ गोबर खाद हो तो अच्छी मात्रा में खेतों में डाल दें. इसके अलावा इसको ज्यादा सिंचाई की भी जरूरत नहीं पड़ती है। 

खरीफ के सीजन में बोई जाती है अरहर दाल की फसल 
ये कम पानी में पकने वाली फसल है, लेकिन एक बात का जरूर ध्यान रखें कि फूल आने और फली बनने के समय नमी जरूर बनाए रखें. इस फसल में खरपतवार पर भी बहुत ज्यादा नियंत्रण नहीं करना पड़ता. जहां तक कीट और रोग प्रबंधन की बात करें तो अरहर में उकठा रोग की समस्या आती है, और फली भेदक कीट की समस्या आती है, जिससे कृषि वैज्ञानिक और विशेषज्ञों से संपर्क करके जो भी रोग लगे उसके हिसाब से समाधान कर लें। 

इतनी होती है अरहर की पैदावार
कृषि वैज्ञानिक आगे कहते हैं, '' जहां तक उपज की बात करते हैं तो फसल की कटाई के बाद 10 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक इसमें पैदावार मिल सकती है. अब आप पर डिपेंड करता है कि आप किस तरह से खेती कर रहे हैं और कितना ध्यान दे रहे हैं.और उस समय मौसम का बर्ताव कैसा रहा। 

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