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देश के सात कलाकारों को मिला संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप सम्मान, रामलाल बरेठ भी शामिल

रायपुर. संस्कृति मंत्रालय ने वर्ष 2024 और 2025 के लिए संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप, अकादमी रत्न, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और उस्ताद बिस्मिल्लाह खान युवा पुरस्कारों की घोषणा की है. फेलोशिप और पुरस्कारों के लिए छत्तीसगढ़ के चार कलाकारों का चयन किया गया है. संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप के लिए जिन सात कलाकारों का चयन…

देश के सात कलाकारों को मिला संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप सम्मान, रामलाल बरेठ भी शामिल

रायपुर.

संस्कृति मंत्रालय ने वर्ष 2024 और 2025 के लिए संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप, अकादमी रत्न, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और उस्ताद बिस्मिल्लाह खान युवा पुरस्कारों की घोषणा की है. फेलोशिप और पुरस्कारों के लिए छत्तीसगढ़ के चार कलाकारों का चयन किया गया है.

संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप के लिए जिन सात कलाकारों का चयन किया गया है, उनमें से छत्तीसगढ़ के पंडित रामलाल बरेठ का नाम सबसे ऊपर है. उनका चयन कथक नृत्य के संरक्षण और संवर्धन के लिए किया गया है. इसके अलावा संगीत नाटक अकादमी की सामान्य परिषद ने संगीत, नृत्य, रंगमंच, लोक, जनजातीय कलाओं और कठपुतली सहित विभिन्न क्षेत्रों के 108 कलाकारों को अकादमी पुरस्कार के लिए चुना है. इनमें छत्तीसगढ़ के अनूप रंजन पांडेय का चयन लोक नृत्य (Folk Dance) के लिए किया गया है. वहीं 106 युवा कलाकारों का चयन उस्ताद बिस्मिल्लाह खान युवा पुरस्कार के लिए किया गया है. इन युवा कलाकारों में छत्तीसगढ़ के आनंद कुमार पांडेय का चयन अभिनय (Acting) के लिए और घनश्याम साहू का चयन कथा लेखन (Play Writing) के लिए किया गया है.

पंडित रामलाल बरेठ, कथक नर्तक
संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप के लिए चयनित रामलाल बरेठ कथक नर्तक हैं. जिन्हें रायगढ़ के महाराज चक्रधर अपने दरबार के नर्तकों में कोहिनूर हीरा मानते थे. रामलाल ने अपनी पूरी जिंदगी नृत्य को समर्पित कर दी है. पंडित रामलाल बरेठ का जन्म 6 मार्च सन 1936 को हुआ था. संगीत परिवार में जन्में पंडित रामलाल की कथक नृत्य शिक्षा 5 साल की उम्र में अपने पिता के सानिध्य में शुरू हो गई थी. 10 वर्ष की छोटी आयु में ही वे रायगढ़ दरबार में कला के शौकीन लोगों के सामने नृत्य का प्रदर्शन करने लगे. जिसे देखकर महाराजा चक्रधर सिंह बहुत खुश हुए. इसके बाद महाराजा ने जयपुर के गुरू पंडित जयलाल महाराज से उनकी नृत्य शिक्षा की व्यवस्था करवाई. राजा चक्रधर सिंह खुद गायन, वादन एवं नृत्य के विद्वान भी थे.

वाद्य यंत्र और गायन में भी महारथी
पंडित रामलाल नृत्य के अलावा तबला वादन और गायन में भी पारंगत हैं. तबला की शिक्षा अपने पिता पंडित कार्तिकराम और पंडित जयलाल महाराज से ली और गायन की शिक्षा अपने पिता और उस्ताद हाजी मोहम्मद खां बांदावाले से ली है. पंडित रामलाल सन् 1949 में लखनऊ सम्मेलन में पहली बार मंच पर आए थे. जहां से इन्हें ख्याति मिलनी शुरू हुई. इसके बाद नृत्य प्रदर्शन का अनवरत सिलसिला शुरू हो गया. भारतीय शास्त्रीय नृत्य में उनके योगदान के लिए उन्हें 2024 में पद्मश्री प्रदान गया था.

अनूप रंजन पांडेय
अकादमी द्वारा लोक नृत्य (Folk Dance) के लिए चयनित वरिष्ठ रंगकर्मी और लोक कलाकार पद्मश्री अनूप रंजन पांडेय न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे देश में अपना एक अलग स्थान है. 21 जुलाई 1965 को बिलासपुर जिले के एक किसान परिवार में जन्मे अनूप रंजन पांडेय को बचपन में अपने माता-पिता से कला और संस्कृति के संस्कार विरासत में मिली. कला के प्रति उनके जुनून का नतीजा है कि उन्होंने खैरागढ़ स्थित इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय से लोक संगीत में पीएचडी हासिल की. वर्ष 1988 में सुप्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर से मुलाकात के बाद साल 1990 में वे उनके मशहूर ‘नया थियेटर’ से जुड़े और देश-विदेश के कई बड़े मंचों पर प्रदर्शन कर छत्तीसगढ़ी लोक रंगमंच को एक नई पहचान दिलाई. रंगमंच के जरिए केवल लोगों के मनोरंजन ही नहीं बल्कि जन जागरूकता का भी काम किया. 1989 से 1992 के दौरान उन्होंने अविभाजित मध्यप्रदेश में चले ‘संयुक्त साक्षरता आंदोलन’ में भी अहम भूमिका निभाई.

बस्तर बैंड के जरिए दुर्लभ वाद्ययंत्रों का संरक्षण
छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद वे रायपुर आ गए और यहाँ साक्षरता के लिए ‘स्टेट रिसोर्स सेंटर’ (SRC) में भी कई वर्षों तक अपनी सेवाएँ दीं. अनूप रंजन पांडेय ने बस्तर के स्थानीय कलाकारों को साथ जोड़कर ‘बस्तर बैंड’ की स्थापना की, जिसके जरिए उन्होंने बस्तर के जनजातीय क्षेत्रों में संगीत के जरिए शांति और संस्कृति के संरक्षण का काम किया.

लोकगीतों-पांडुलिपियों का किया संकलन
उन्होंने करीब 60 दुर्लभ पारंपरिक वाद्ययंत्रों को विलुप्ति से बचाते हुए सहेजने का काम किया. इसके साथ छत्तीसगढ़ के 143 लोकगीतों और लोककथाओं की पांडुलिपियों का संकलन किया है. यही नहीं उन्होंने अपने व्यक्तिगत संग्रह के कई दुर्लभ वाद्ययंत्र रायपुर स्थित संग्रहालय को दान भी किए हैं.

घनश्याम साहू, कथा लेखक
छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक और रंगमंचीय परंपरा को नई पहचान देने वाले युवा रंगकर्मी घनश्याम साहू आज नाटक लेखन, निर्देशन और सांस्कृतिक नेतृत्व के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण नाम हैं. वर्ष 2007 से रंगमंच से सक्रिय रूप से जुड़े घनश्याम साहू ने अपने लेखन और निर्देशन के माध्यम से समाज, लोकजीवन और समकालीन सरोकारों को मंच पर प्रभावी रूप से प्रस्तुत किया है. रायगढ़ जिले के सारंगढ़ के कतेली के रहवासी घनश्याम साहू द्वारा लिखित एवं निर्देशित प्रमुख नाटकों में अघनिया, चैती, लाल दुपट्टा, बाबागिरी, पहटिया और बिरसा शामिल हैं, जिनका मंचन देश के विभिन्न शहरों और सांस्कृतिक केंद्रों में हुआ है. विशेष रूप से “पहटिया” का मंचन दिल्ली, बैंगलोर, भोपाल, नागपुर, बालाघाट और चंडीगढ़ जैसे महत्वपूर्ण शहरों में हुआ, जिसने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई.

फ़िल्म लेखन एवं निर्देशन में योगदान
घनश्याम साहू ने रंगमंच के साथ-साथ सिनेमा के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय कार्य किया है। उनके द्वारा लिखित एवं निर्देशित फ़ीचर फिल्मों में कुरुक्षेत्र, झन जाबे परदेस, दंतेला, मुरली, असुर प्रमुख हैं.

डॉ. आनंद कुमार पांडेय, अभिनय
डॉ. आनंद कुमार पाण्डेय ने वर्ष 2010 में इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ से नाट्यकला में एमए करने के बाद डॉ. योगेन्द्र चौबे के निर्देशन में “भारतीय रंगमंच में हबीब तनवीर के ‘नया थिएटर’ का योगदान” विषय पर पीएचडी की उपाधि प्राप्त की. रंगमंच के क्षेत्र में उनका योगदान उल्लेखनीय है. वर्ष 2007 से हिंदी रंगमंच के संवर्धन और विकास के लिए निरंतर कार्यरत आनंद कुमार अपने अभिनय, निर्देशन और सांस्कृतिक गतिविधियों से नई पीढ़ी को रंगकर्म से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं.

जशरंग राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव का आयोजन
वर्तमान में वे जशपुर में रंगमंच को आगे बढ़ाने और सांस्कृतिक चेतना को सशक्त करने के लिए निरंतर प्रयासरत हैं. बीते दो सालों से वे सफलतापूर्वक “जशरंग राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव” का आयोजन कर रहे हैं, जो क्षेत्र के कलाकारों और रंगकर्मियों के लिए एक महत्वपूर्ण मंच बन चुका है. डॉ. पाण्डेय का यह सम्मान केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि जशपुर, छत्तीसगढ़ और समूचे हिंदी रंगमंच के लिए गौरव का विषय है. यह पुरस्कार उनके समर्पण, सृजनशीलता, कला के प्रति निष्ठा और रंगमंच के विकास हेतु किए गए अथक प्रयासों का राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान है.

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