मोदी सरकार के परिसीमन बिल से पहले विपक्षी खेमे में नई रणनीति शुरू

नई दिल्ली  जब से यह चर्चा शुरू हुई है कि नरेंद्र मोदी सरकार एक बार फिर से मानसून सत्र में परिसीमन बिल लाने की कोशिश कर सकती है, विपक्षी दलों में सबसे ज्यादा कांग्रेस असहज हो रही है। कांग्रेस की असहजता यूं ही नहीं है, पिछले तीन महीने में ही देश के राजनीतिक हालात पूरी…

मोदी सरकार के परिसीमन बिल से पहले विपक्षी खेमे में नई रणनीति शुरू

नई दिल्ली
 जब से यह चर्चा शुरू हुई है कि नरेंद्र मोदी सरकार एक बार फिर से मानसून सत्र में परिसीमन बिल लाने की कोशिश कर सकती है, विपक्षी दलों में सबसे ज्यादा कांग्रेस असहज हो रही है। कांग्रेस की असहजता यूं ही नहीं है, पिछले तीन महीने में ही देश के राजनीतिक हालात पूरी तरह से पलट चुके। ऐसे में कांग्रेस इस बात पर पूरा भरोसा जता रही है, कि भले ही डीएमके विपक्षी इंडी अलायंस से अलग हो चुका हो, परिसीमन पर वह सरकार के साथ नहीं जाएगा।

बीजेपी-डीएमके कभी एक नहीं हो सकते-कांग्रेस
कांग्रेस सांसद और पार्टी प्रवक्ता जयराम रमेश ने बीजेपी और डीएमके में नजदीकी बढ़ने की अटकलों को लेकर न्यूज एजेंसी एएनआई से कहा है, 'बीजेपी और डीएमके कभी एक नहीं हो सकते..ये विचारधारा अलग है। अभी देखिए क्या होता है?'

थलपति विजय के साथ, लेकिन डीएमके से भी संपर्क में
दरअसल, मोदी सरकार इससे पहले लोकसभा में सीटों की संख्या में लगभग 50% की बढ़ोतरी वाला बिल अप्रैल में संसद के विशेष सत्र में लेकर आई थी। संविधान संशोधन की वजह से इसके लिए दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की जरूरत थी। लेकिन, तब विपक्षी एकता की वजह से लोकसभा में यह विधेयक गिर गया। इसके तुरंत बाद हुए पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों में जो नतीजे आए, उसने राजनीतिक परिस्थितियां बदल दीं और डीएमके ने इंडिया गठबंधन से किनारा कर लिया।

ये बात सही है कि (तमिलनाडु में) हम टीवीके को समर्थन दे रहे हैं। (थलपति सी जोसेफ विजय की सरकार में) हमारे दो कैबिनेट मंत्री हैं। पर हम भी डीएमके सांसदों के संपर्क में हैं। उनसे बातचीत हो रही है।

डीएमके अभी भी विपक्षी दल- कांग्रेस
कांग्रेस का दावा है कि 'डीएमके अभी भी विपक्षी दल है। वो सत्ता दल नहीं है। एनडीए का घटक दल नहीं है। ये सही है कि उन्होंने लोकसभा और राज्यसभा में अलग सीटिंग अरेंजमेंट मांगा है। ये सब चलते रहेंगे। '

मुझे पूरा विश्वास है कि जब वक्त आएगा, डीएमके भी खड़ा होकर कहेगा कि जो परिसीमन बिल लाया जा रहा है, वो राज्यों के हित में नहीं है..वो संघीय ढांचे को बिगाड़ता है। वो दक्षिण भारतीय राज्यों की आशंकाएं दूर नहीं करता।

131वां संविधान संशोधन बिल आ सकता है
    दरअसल, अटकलें लग रही हैं कि मोदी सरकार मानसून सत्र में 131वां संविधान संशोधन बिल पास कराने की फिर से कोशिश कर सकती है।
    इससे 2029 के आम चुनावों से पहले नए परिसीमन का रास्ता साफ हो जाएगा।
    इस बिल के पास होने से लोकसभा में सीटों की संख्या मौजूदा 543 से बढ़कर 850 हो जाएगी।
    इसके साथ ही महिलाओं के लिए भी लोकसभा में 33% सीटें आरक्षित करने का रास्ता साफ हो जाएगा।
    अप्रैल,2026 में संसद के विशेष सत्र में केंद्र सरकार इसके लिए लोकसभा में जरूरी दो-तिहाई बहुमत जुटाने में नाकाम रही थी।

विधानसभा चुनावों के बाद बदल गई विपक्ष की राजनीति

  • इसके फौरन बाद ही पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए और देश का सियासी समीकरण बदल गया।
  • बंगाल में टीएमसी और तमिलनाडु में डीएमके सरकारों की करारी हार हुई।
  • टीएमसी के 20 और शिवसेना (यूबीटी) के लोकसभा सांसद गुट बनाकर अलग हो गए।
  • टीएमसी के राज्यसभा सांसदों ने भी इस्तीफा देना शुरू कर दिया।
  • आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सांसदों ने राज्यसभा सभापति को अलग गुट के तौर पर मान्यता देने की मांग कर दी।
  • कहा जा रहा है कि यह बीजेपी की संसदीय रणनीति का हिस्सा है।
  • इसके तहत ये सांसद एनडीए का कुनबा बढ़ाएंगे।
  • वहीं डीएमके जैसी पार्टी के बारे में कहा जा रहा है कि उससे विधेयक पर संभावित वोटिंग के दौरान अलग रहकर उसका परोक्ष समर्थन करने के लिए मनाया जा रहा है।
  • पिछले दो दिनों में एनसीपी (एसपी) और शिवसेना (यूबीटी) के भी परिसीमन बिल को लेकर सुर बदले नजर आ रहे हैं।

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