जींद
पांडू पिंडारा(पिंडतारक तीर्थ) का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। मान्यता है, महाभारत युद्ध के बाद पांडवों ने भगवान श्री कृष्ण के कहने पर कौरवों और सैनिकों की आत्मा की शांति के लिए यहां पिंडदान किया था।
यहां सोमवती अमावस्या की प्रतीक्षा करते हुए 12 वर्ष बिताए थे और पूर्ण विधान से पिंडदान किया था। पांडवों द्वारा यहां पिंडदान (तर्पण) किए जाने के कारण इस जगह का नाम पांडू पिंडारा और यहां के मुख्य कुंड का नाम पिंडतारक तीर्थ पड़ गया।
माना जाता है, महाभारत काल से पिंडदान और श्राद्ध कर्म की परंपरा शुरू हुई। आज भी रिश्तों में चाहे कितने ही मतभेद क्यों न रहे हों, लोग मृत्यु के बाद अपने पितृों को ईश्वर से भी ऊपर का स्थान देते हैं। उनकी आत्मा की शांति के लिए पिंडदान और उनका श्राद्ध करते हैं।
पांडवों ने किया था कौरवों का पिंडदान
किंवदंती है, महाभारत युद्ध में जीत भले ही पांडवों की हुई, लेकिन उन्हें अपने ही परिवार के लोगों को खोने का गहरा दुख भी मिला। कौरव उनके शत्रु जरूर थे, लेकिन वे उनके भाई थे
इसलिए धर्म का पालन करते हुए पांडवों ने सभी दिवंगत आत्माओं की शांति के लिए पिंडदान और श्राद्ध कर्म संपन्न किया था। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पिंडारा में मौजूद इस कुंड का संबंध पितृ कर्म और मोक्ष से जोड़ा जाता है।
यहां श्रद्धा और विधि-विधान से पिंडदान करने पर पूर्वजों को शांति प्राप्त होती है। यही कारण है, सालभर, विशेष रूप से पितृ पक्ष के दौरान, बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचकर अपने पितरों का तर्पण करते हैं।
ग्रंथों में भी पांडू पिंडारा तीर्थ का जिक्र
कई हिंदू ग्रंथों जैसे महाभारत, वामन पुराण, पद्म पुरण में इस बात का विवरण मिलता है कि जींद जिले में मौजूद पांडू पिंडारा, जिसे पिंडतारक और सोम तीर्थ भी कहा गया है, वहां कौरवों द्वारा कौरवों का पिंडदान किया गया था।
यहां कुंड में लोग सोमवती अमावस्या के दिन अपने पितृों का पिंडदान करने आते हैं। मान्यता है, इस स्थल पर पिंडदान करने से पितृों को मोक्ष प्राप्त होता है। सोमवती अमावस्या के दिन यहां बहुत बड़ा मेला भी लगता है।
















