वंदे मातरम् को लेकर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र सरकार से मांगा जवाब

नई दिल्ली राष्ट्रीय गीत वंदेमातरम को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर कोई व्यक्ति धार्मिक कारणों से वंदे मातरम नहीं गाता है या फिर सारे आंतरे नहीं गाता है तो उसपर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। वहीं सुप्रीम कोर्ट नेइस मामले में केंद्र सरकार को नोटिस जारी करते हुए जवाब भी मांगा है। गायक…

वंदे मातरम् को लेकर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र सरकार से मांगा जवाब

नई दिल्ली

राष्ट्रीय गीत वंदेमातरम को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर कोई व्यक्ति धार्मिक कारणों से वंदे मातरम नहीं गाता है या फिर सारे आंतरे नहीं गाता है तो उसपर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। वहीं सुप्रीम कोर्ट नेइस मामले में केंद्र सरकार को नोटिस जारी करते हुए जवाब भी मांगा है। गायक टीएम कृष्णा की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उम्मीद जताई की वंदे मातरम् से जुड़े कानून की व्याख्या करते वक्त 1986 के 'बिजो एमैनुअल' के तय सिद्धातों को लागू किया जाएगा।

आपको बता दें कि जुलाई में संसद के मॉनसून सत्र में एक संशोधन विधेयक लाकर वंदे मातरम को इसके अंतरगत लाया गया था। 29 जुलाई को राज्यसभा में और फिर 30 जुलाई को लेकसभा में विधेयक को पास करके कानून बनाया दिया गया और वंदेमातरम गाना अनिवार्य किया गया था। इसे राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम के दायरे में ले आया गया। सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय गीत को दो अंतरे तक ही सीमित रखने पर विचार करने से इनकार कर दिया है। हालांकि इस बात पर विचार करने को तैयार है कि इसे ना गाने को दंडनीय अपराध ना बनाया जाए।

राष्ट्रगान ना गाने पर नहीं हो सकती सजा
सीजेआई सूर्यकांत जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच ने बिजो इमैनुएल मामले में सुप्रीम कोर्ट के ही फैसले का हवाला देते हुए कहा कि तय किया गया था कि राष्ट्रगान ना गाने पर किसी को सजा नहीं दी जाएगी और यह अब भी लागू होता है।

बिजो इमैनुअल केस: 3 छात्रों ने राष्ट्रगान गाने से मना कर दिया

कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि वंदे मातरम से जुड़े कानून की व्याख्या करते समय 1986 के ‘बिजो इमैनुअल’ फैसले में तय सिद्धांतों को लागू किया जाएगा।

दरअसल, 1986 के बिजो इमैनुअल बनाम केरल सरकार मामले में तीन छात्रों ने धार्मिक विश्वास के कारण राष्ट्रगान नहीं गाया था। हालांकि वे राष्ट्रगान के दौरान सम्मानपूर्वक खड़े रहते थे।

सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ कार्रवाई को रद्द करते हुए कहा था कि केवल राष्ट्रगान न गाने के आधार पर उन्हें दंडित नहीं किया जा सकता।

‘नक्सली’ शब्द पर सॉलिसिटर जनरल और मुरलीधर में बहस
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और कृष्णा के वकील सीनियर एडवोकेट डॉ एस मुरलीधर के बीच तीखी बहस भी हुई। संविधान के तहत निर्णय लेने की प्रक्रिया पर मुरलीधर की दलील के जवाब में मेहता ने ‘नक्सली’ शब्द का इस्तेमाल किया।

    मुरलीधर: अभी आपने जिस शब्द का इस्तेमाल किया है, उसे वापस लें। यह कार्यवाही लाइव चल रही है। मैं इसका कड़ा विरोध करता हूं।

    मेहता: मैंने कहा कि यही संवैधानिक तरीका है, न कि वह तरीका जो नक्सली चाहता है। और मुझे इसका कोई अफसोस नहीं है।

    मुरलीधर: “किसी बात पर विचार करना नक्सली होना नहीं है।

इसके बाद जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि किसी व्यक्ति पर आतंकवादी होने का आरोप हो, तब भी संविधान के तहत उसके अधिकार बने रहते हैं।

2026 वंदे मातरम के अपमान पर कानून बना
24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने 'वंदे मातरम' को राष्ट्रीय गीत घोषित किया था। लंबे समय तक इसके अपमान पर कोई अलग कानून नहीं था, लेकिन 2026 के मानसून सत्र में केंद्र सरकार ने 'राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम' बनाया।

इस कानून के तहत 'वंदे मातरम' के गायन को जानबूझकर रोकने, इसमें बाधा डालने या इसका सार्वजनिक अपमान करने को दंडनीय अपराध माना गया है। ऐसा करने पर 3 साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों की सजा का प्रावधान है।

इस बार 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान पहली बार लाल किले की प्राचीर से 'वंदे मातरम' के पूरे 6 छंद गाए गए।

केंद्र से मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने इस पीआईएल पर सरकार से जवाब दाखिल करने को कहा है। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत दिए गए मौलिक अधिकारियों के संबंध में कानून में दंड के प्रावधानों की समीक्षा होनी चाहिए।

आपको बता दें कि कर्नाटक संगीत के प्रसिद्ध गायक टी एम कृष्णा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका फाइल की थी और कहा था कि वंदे मातरम के सभी 6 छंद गाना अनिवार्य नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा था कि आखिरी के चार अंतरे में स्पष्ट रूप से हिंदू देवी देवताओं की आर्चना का भाव है और एक धर्मनिरपेक्ष देश में इसे अनिवार्य कर देना संविधान का उल्लंघन है। केंद्र सरकार की ओर से पेश एसजी तुषार मेहता ने इस याचिका का विरोध करते हुए कहा कि कुछ लोग संविधान और कानून के राज में विश्वास नहीं करते और उनकी सोच नक्सलवादी है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान राष्ट्रीय गीत की अहम भूमिका थी और इसे भुलाना नहीं चाहिए।

तुषार मेहता ने क्या दलील दी?
सुप्रीम कोर्ट में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट से नोटिस नहीं जारी करने की मांग की. इस पर उन्होंने दलील दी कि यह सनसेशन को बढ़ावा देने वाला होगा. इसके बाद सुनवाई के दौरान ही जस्टिस बागची ने कहा कि  इसमें कोई संदेह नहीं कि यह हमारा राष्ट्रीय गीत है। 

याचिकाकर्ता की बात से सहमत दिखा सुप्रीम कोर्ट
इस पर एसजी तुषार मेहता ने कहा कि दो पद गाए जाएं या छह पद गाए जाएं… यह सरकार से इतर कौन तय करेगा, कोई और तो नहीं कर सकता. इस पर याचिकाकर्ता के वकील ने दखल दी. उन्होंने कहा कि लोगों की राय ली जानी चाहिए थी. इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि यह सही बात है। 

2 सप्ताह में देना है जवाब
इसके बाद वंदे मातरम के छह पद गाने की अनिवार्यता के खिलाफ दायर याचिका पर केंद्र सरकार से सुप्रीम कोर्ट ने जवाब तलब किया. सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि दो सप्ताह के अंदर केंद्र को इस मामले में देना होगा जवाब. याचिकाकर्ता के वकील ने एसजी की ओर से दलील में नक्सलाइट शब्द का उपयोग करने पर भी गंभीर आपत्ति जताई। 

About the Author

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

About the Author

GoodDoo News

Your trusted source for unbiased, timely news. We cover national and global updates, politics, business, social issues, and inspiring stories. Stay informed with accurate reporting and impactful stories that matter.

Search the Archives

Access over the years of investigative journalism and breaking reports

You May Have Missed