ब्रह्म मुहूर्त में क्यों उठना चाहिए? प्रेमानंद महाराज ने बताया साधना का सही समय और नियम

 हिंदू धर्म में ब्रह्म मुहूर्त बहुत ही शुभ समय माना जाता है. ब्रह्म मुहूर्त को अमृत वेला और अक्षय मुहूर्त के नाम से भी जाना जाता है, जिसे आम भाषा में ईश्वर का समय माना जाता है. ब्रह्म मुहूर्त सूर्योदय से पहले का बेहद शुभ समय माना जाता है. आमतौर पर यह समय सुबह करीब…

ब्रह्म मुहूर्त में क्यों उठना चाहिए? प्रेमानंद महाराज ने बताया साधना का सही समय और नियम

 हिंदू धर्म में ब्रह्म मुहूर्त बहुत ही शुभ समय माना जाता है. ब्रह्म मुहूर्त को अमृत वेला और अक्षय मुहूर्त के नाम से भी जाना जाता है, जिसे आम भाषा में ईश्वर का समय माना जाता है. ब्रह्म मुहूर्त सूर्योदय से पहले का बेहद शुभ समय माना जाता है. आमतौर पर यह समय सुबह करीब 4 बजे से 5:30 बजे तक माना जाता है. इस दौरान मंत्र जाप के साथ-साथ कुछ ऐसे उपाय भी किए जा सकते हैं, जिन्हें धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शुभ और लाभकारी माना जाता है.

ब्रह्म मुहूर्त को लेकर मथुरा वृंदावन के जाने माने बाबा प्रेमानंद महाराज ने भी अपनी राय रखी. प्रेमानंद महाराज कहते हैं कि, 'कभी-कभी जब नए उपासकों से बातचीत होती है और वे अपनी दिनचर्या बताते हैं कि हम सुबह 6:30 बजे स्नान करते हैं, तब मन में सवाल आता है कि इतनी देर तक सोने के बाद साधना कैसे होगी? अगर कोई साधक सुबह 6:30 बजे तक सोता रहता है, तो उसकी साधना और ब्रह्मचर्य की दिनचर्या पर सवाल उठना स्वाभाविक है.'

आगे प्रेमानंद महाराज कहते हैं कि, 'शास्त्रों और महापुरुषों ने ब्रह्म मुहूर्त के समय को साधना के लिए बेहद महत्वपूर्ण बताया है. सामान्य रूप से साधक को सुबह 2 से 4 बजे के बीच उठकर भजन, जप और ध्यान करना चाहिए. हालांकि, अगर कोई व्यक्ति पूरी रात भजन में लगा रहा हो और किसी कारण से सुबह देर से सोया हो, तो उसकी स्थिति अलग है. लेकिन बिना किसी विशेष कारण के देर तक सोते रहना साधक की दिनचर्या के लिए उचित नहीं माना जाता है.'

केवल सत्संग सुनना पर्याप्त नहीं
प्रेमानंद महाराज कहते हैं कि, 'मान लें आप खूब सत्संग सुनते हैं, प्रवचन सुनते हैं और भगवान की चर्चा करते हैं, लेकिन आपकी दिनचर्या में कोई बदलाव नहीं आ रहा. तब यह विचार करने की जरूरत है कि आखिर साधना का प्रभाव जीवन में क्यों नहीं दिखाई दे रहा है. सत्संग सुनना अच्छी बात है, लेकिन उसके साथ अपनी दिनचर्या को भी सुधारना जरूरी है. सुबह समय पर उठना, जप करना, ध्यान लगाना और अपने नियमों का पालन करना साधना का हिस्सा है.'

फिर साधना में हमारा अभ्यास इतना कमजोर क्यों हो कि हम सुबह उठकर दोबारा सो जाएं?

आज से नई दिनचर्या बनाएं
फिर प्रेमानंद महाराज कहते हैं कि, 'अगर आपकी पुरानी दिनचर्या ठीक है तो उसे बनाए रखें. अगर उसमें कमी है तो आज से उसमें सुधार करें. अपनी दिनचर्या को लिखिए और स्वयं को उसके नियमों में बांधिए. केवल रजिस्टर में लिख देने से काम नहीं चलेगा कि आज मैं 2 बजे उठ गया या 3 बजे उठ गया. खुद को इसका साक्षी बनाना होगा और अपने नियमों का ईमानदारी से पालन करना होगा. बिना नियम के प्रेम भी स्थिर नहीं हो सकता. साधना में नियम और नियमितता बहुत महत्वपूर्ण हैं.'

' किसी भी संत के जीवन को देखिए, उनकी दिनचर्या में अनुशासन दिखाई देगा. हमें महापुरुषों की विशेष अवस्थाओं की नकल करने के बजाय उनके दिए हुए उपदेश और साधना के नियमों को अपने जीवन में उतारना चाहिए.'

शरीर स्वस्थ है, तभी साधना का अवसर है
'जीवन बहुत अनमोल है. जब तक शरीर स्वस्थ है, तब तक हमारे पास भजन करने, सत्संग सुनने और भगवान का नाम लेने का अवसर है. जब कोई गंभीर बीमारी सामने आती है, तब मनुष्य को अचानक जीवन की वास्तविकता का एहसास होने लगता है. बीमारी की रिपोर्ट हाथ में आते ही अच्छे-अच्छे लोगों का मन विचलित हो जाता है. तब संसार की दूसरी चीजों से मन हटकर केवल बीमारी और मृत्यु का चिंतन करने लगता है. इसलिए जब शरीर स्वस्थ है, तभी समय का सदुपयोग करना चाहिए. यह नहीं सोचना चाहिए कि भजन बाद में कर लेंगे. भजन कोई साधारण वस्तु नहीं है. संतों ने बार-बार समझाया है कि जब तक शरीर स्वस्थ है और बुढ़ापा दूर है, तब तक भगवान के भजन में मन लगाना चाहिए.'

भगवान का आश्रय और नाम जप
फिर, प्रेमानंद महाराज कहते हैं कि, 'साधना की दो बातें बहुत महत्वपूर्ण हैं- भीतर से भगवान का आश्रय और जिह्वा से भगवान का नाम. जब मनुष्य नियमित रूप से भगवान का नाम जपता है और उनका चिंतन करता है, तो धीरे-धीरे उसके भीतर वैराग्य बढ़ने लगता है. संसार की कई चीजों से अपने आप अरुचि होने लगती है. भजन का प्रभाव केवल बाहरी व्यवहार पर नहीं पड़ता, बल्कि मन और अंतःकरण पर भी पड़ता है. बाहरी कर्मों से बाहरी पवित्रता आती है, जबकि अंतःकरण की पवित्रता चिंतन और भजन से होती है. जब बाहरी और आंतरिक दोनों स्तरों पर साधना होने लगती है, तब धीरे-धीरे स्वभाव में परिवर्तन आता है.'

दिनचर्या मन को बांधने का साधन है
'दिनचर्या का अर्थ केवल समय बांटना नहीं है. इसका उद्देश्य मन को अनुशासित करना भी है. किस समय जप करना है, किस समय सत्संग सुनना है, किस समय परिक्रमा करनी है, किस समय मौन रहना है और किस समय भोजन करना है – इन सबका एक निश्चित नियम होना चाहिए.'

'अगर आपने तय किया है कि सुबह एक निश्चित समय पर भजन करेंगे, तो उस समय को लंबे समय तक भजन के लिए सुरक्षित रखें. शुरुआत में अगर केवल 10 मिनट संभव हैं, तो 10 मिनट से शुरू कीजिए, लेकिन उस नियम को लगातार निभाइए. धीरे-धीरे अभ्यास मजबूत होगा और समय भी बढ़ाया जा सकता है.'

About the Author

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

About the Author

GoodDoo News

Your trusted source for unbiased, timely news. We cover national and global updates, politics, business, social issues, and inspiring stories. Stay informed with accurate reporting and impactful stories that matter.

Search the Archives

Access over the years of investigative journalism and breaking reports